My expression in words and photography

रविवार, 19 दिसंबर 2010

अंतरजाल पर ब्लॉग्गिंग

हम किधर जा रहे हैं ?
आज जहाँ भी देखो कोई किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं है. लोगों में असहिष्णुता इतनी अधिक बढ़ गई है कि छोटी छोटी बातों पर झगड़ने लगते हैं. अंतरजाल पर ब्लोगिंग के प्रचार एवं प्रसार से लोग अपने अंदर छुपी हुई अनुभूतियों को शब्दों में बयान करते हुए अक्सर देखे जा सकते हैं. कई लोगों की मान्यता है कि वो जो भी लिखते हैं वही सही है. ये लोग अपना लेखन लोगों को पढ़वाना तो चाहते हैं परन्तु कोई इस पर टीका-टिप्पणी करे, यह उन्हें कबूल नहीं है. आज जो भी पढ़ने की सामग्री अंतरजाल पर उपलब्ध है वह शब्दों या स्वर के माध्यम से दी गई है. दोनों में ही अपनी अपनी मर्यादाएं हैं. यदि यह स्वर है तो सुर का ख्याल रखना होगा नहीं तो सुनने वालों को ये बेसुरा लगेगा. अगर कोई व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से करता है तो उसे भाषा एवं व्याकरण के नियमों के अनुसार तो चलना ही होगा. लेकिन वर्तमान युग के लेखकों को यह कतई स्वीकार्य नहीं है कि कोई उनके लेखन में व्याकरण सम्बंधी दोष निकाले. अगर दोषारोपण सही भी है तो भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अशुद्ध लेखन को महिमा मंडित करने से बाज़ नहीं आते. ऐसा करने से शुद्ध लेखन में विश्वास करने वाले लोग तो निरुत्साहित होते ही हैं किन्तु इस प्रक्रिया में भाषा का भी कुछ भला नही होता. प्रस्तुत लेख का उद्देश्य किसी को भी व्याकरण ज्ञान देना नहीं है. लेकिन इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि अगर आपको अपने लेख पर किसी की भी टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है तो इसे ब्लॉग पर देने की क्या आवश्यकता है? खुद पढते रहो और खुश रहो! अन्यथा ऐसे लेखक अपनी सामग्री अखबारों या रिसालों में छपवा सकते हैं जिन्हें पढ़ कर लोग रद्दी में फेंक देते हैं. अगर देखा जाए तो ब्लोगिंग किसी भी भाषा के विकास में एक महती भूमिका निभा सकती है.

तो क्या लोग ब्लॉग्गिंग का उपयोग अपने मन की भडांस निकालने के लिए अधिक करने लगे हैं? शायद यह बात किसी हद तक सही भी है. परन्तु उन्हें ऐसा करते समय तथ्यों एवं अर्थपूर्ण तर्कों का सहारा लेना चाहिए. बिना किसी तथ्य के किसी को सही या गलत बताने की प्रवृति से बचना चाहिए. ब्लॉग पर लोग आपके विचारों को जानना चाहते हैं और शायद पढ़ना भी. परन्तु अगर आपकी विचारधारा पाठकों के मानकों पर खरी न उतरे तो वे आपको तुरंत छोड़ भी सकते हैं. अतः लिखते समय यथा संभव संयम बरतें क्योंकि आपके चाहने वाले आपको बड़ी बारीकी से देख रहे होते हैं. हमारी सभ्यता शुरू से ही हमें आदर और स्नेह से बात रखने की प्रेरणा देती आई है. वाल्टेर ने कहा था कि हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत नहीं होऊं परन्तु आपके विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता की सदैव रक्षा करूँगा. दूसरों की बात को ध्यान से सुन कर उस पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए. परन्तु कभी भी ऐसी प्रतिक्रिया को व्यक्तिगत न लें. अगर कोई व्यक्ति कविता, गज़ल या दोहे लिखता है तो उसके लेखन को एक बड़ा वर्ग तभी स्वीकार कर पायेगा जब यह लेखन शुद्ध हो ....व्याकरण के नज़रिए से भी और हाँ, साहित्य की गुणवत्ता के आधार पर भी इसे खरा उतरना होगा. वरना इसके लिए प्रतिकूल टिप्पणियों का सामना करना पड सकता है. आप जब भी कोई टिप्पणी दे वह रचना के सन्दर्भ में ही होनी चाहिए. रचनाकार के सम्बन्ध में कोई भी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. कभी कभी ऐसा भी देखा गया है कि लोग टिप्पणियों पर ही अपनी अनावश्यक टिप्पणियाँ देने लगते हैं. ऐसा करने से ब्लॉग जगत में अराजकता जैसी स्थिति पनपने लगती है जिसे शालीनता से दूर किया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि ब्लॉग लेखन में सहमति या असहमति से न तो किसी की जीत होती है और न ही हार. विवाद पैदा करने से कुछ नही मिलता ...सिवाय इसके कि लोग आपकी हरकतें देख कर आपको घूरने लगते हैं. अगर आपको किसी से नफरत है तो आप ब्लॉग पर ही न आयें. क्योंकि अगर ऐसा व्यक्ति ब्लॉग पर आकर कुछ लिखता है तो इसमें उसका स्वार्थ और शायद अहम अधिक आड़े आता है.

कहते हैं नफरत का सफर एक कदम दो कदम, आप भी थक जायेंगे और हम भी. मोहब्बत का सफर कदम दर कदम, न आप थकेंगे न हम. एक और महत्वपूर्ण बात भी यहाँ कहना यथोचित रहेगा कि बा अदब, बा नसीब. बे अदब बे नसीब. अर्थात जो आदर से व्यवहार नहीं करता उसका भाग्य भी उसके साथ नही रहता. अंतरजाल पर ब्लॉग लिखना एक सरल तथा सुन्दर कला है. कोई व्यक्ति अपनी अनुभूतियों को दूसरों के समक्ष लाकर संतोष का अनुभव करता है. परन्तु इस माध्यम से अगर कोई व्यक्ति वैमनस्य या घृणा का वातावरण सृजित करने लगे तो यह निंदनीय होने लगता है. आओ हम सब मिलकर यह प्रण करें कि हम अंतरजाल पर एक स्वस्थ एवं मनोरंजक परम्परा के ही वाहक बनेगे. अगर कुछ लोग इसमें सहयोग नहीं भी करना चाहें तो भी उनपर कोई ध्यान न देकर उन्हें यथासंभव हतोत्साहित करें. ऐसा करने से ब्लॉग जगत में न केवल अच्छे साहित्य का सृजन होगा अपितु लोगों को पढ़ने के लिए अच्छी सामग्री मिल सकेगी.

3 टिप्‍पणियां:

  1. अश्विनी जी,
    आप की लेखनी वास्तव में प्रखर है !
    सच्ची बातों को आपने खुल कर लिखा है ,यही वास्तविकता भी है !
    इस तथ्यपूर्ण लेख के किये मेरी बधाई स्वीकार करें!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  2. अश्विनी जी,
    यह भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम ही है, हाँ निरंकुश है। अच्छे यहाँ भी अच्छे ही हैं और दोहरे व्यक्तित्व यहाँ भी दोहरे ही रहेंगे।

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  3. @मर्मज्ञ जी,
    @स्मार्ट इंडियन जी,
    आपकी बहुमूल्य टिप्पनियों के लिए धन्यवाद. जिस दिन भी हम सत्य को सत्य के रूप में स्वीकार करने लगेंगे, उसी दिन से इसका स्वाद कड़वा नहीं बल्कि मीठा लगने लगेगा.

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