My expression in words and photography

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बेटी बड़ी हो गई है!

देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

समझते थे जिसको सब नादान
आज हो गई है वह सबसे महान
माला की मजबूत कड़ी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

उसके कारण घर में बहार है
जैसे चलती कोई ठंडी बयार है
सावन की शीतल झड़ी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

घर में सब पर उस का रौब है
पढ़-लिख कर पाया इक ‘जॉब’ है
सबको पढाने वह खड़ी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

बेटी ने सभी को जगाया है
हमारे घर को महकाया है
ज़िंदगी की अनमोल घडी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है

अपने पैरों पर खड़ी हो गई है! –अश्विनी रॉय ‘सहर’

महाराष्ट्र का महासंग्राम!

महाराष्ट्र विधानसभा में किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण बड़ी विचित्र परिस्थितियाँ बनती जा रही हैं. जहां शिवसेना ने बी.जे.पी. का विरोध करने का मन बनाया है, वहाँ एन.सी.पी. ने हर हाल में बी.जे.पी. को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही है. यह अत्यंत चिंता का विषय है कि हमारे दल राजनीति से ऊपर उठ कर लोक भलाई के विषय में नहीं सोचते. अगर किसी दल को बहुमत न मिले तो दोबारा चुनाव करवाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता. आजकल बार-बार चुनाव करवाने से जनता को महँगाई की मार पड़ती है. सरकार जो रुपया चुनावों पर खर्च करती है वह भी जनता की गाढ़ी कमाई से ही आता है. ऐसे में मध्यावधि चुनावों से हर हाल में बचना चाहिए.
कुछ दल अपने राजनैतिक अहम के कारण एक दूसरे का विरोध करते हैं जो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता. हालांकि बी.जे.पी. ने एन. सी.पी. से कोई समर्थन नहीं माँगा, फिर भी उन्होंने राज्य के हित में वर्तमान सरकार को बिना शर्त अपना समर्थन देने का फैसला किया है जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. कुछ दलों को इस फैसले पर सख्त एतराज़ है क्योंकि चुनाव से पहले बी.जे.पी. और एन.सी.पी. एक दूसरे के घोर विरोधी रहे हैं. ज्ञातव्य है कि शिवसेना और बी.जे.पी. भी तो एक दूसरे के विरोध में अलग-अलग चुनाव लड़े थे, फिर इन दोनों का मेल भी कैसे पवित्र हो सकता है? इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है.
हमारे विधायक केवल सत्ता की राजनीति करते हैं. जब शिवसेना को उनकी इच्छानुसार मंत्रालय नहीं मिल पाए तो उनका विरोध मुखर हो कर सामने आ गया. शिवसेना को एन.सी.पी. द्वारा बी.जे.पी. को समर्थन मिलने पर भी सख्त एतराज़ है क्योंकि इसी कारण उनका बी.जे.पी. से गठजोड़ नहीं हो पाया. आजकल की दूषित राजनीति को स्वच्छ करने के लिए सरकार को एक नए संविधान संशोधन पर विचार करना चाहिए जिसके अनुसार किसी दल या गठजोड़ को बहुमत न मिले तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या गठजोड़ के नेता को सरकार बनाने के लिए कहे, चाहे यह अल्पमत सरकार ही क्यों न हो! हाँ, कोई भी क़ानून तभी पास होगा जब प्रांतीय विधायक बहुमत से इसका समर्थन करें.

हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली भी राजनैतिक विद्वेष का शिकार हुई है. यहाँ के लोगों ने चुनावों में बढ़-चढ़ कर भाग लिया, फिर भी वहाँ कोई सरकार नहीं बन पाई. जो सरकार बनी, उसने कतिपय ओछी दलीलें दे कर कुछ दिन बाद इस्तीफा दे दिया. अब यहाँ दोबारा चुनाव होंगे. यह विचारणीय है कि अगर फिर भी किसी दल को बहुमत न मिला तो क्या होगा? आखिर एक अल्पमत सरकार बनने देने में क्या हर्ज है, बशर्ते इसे जनता द्वारा चुना गया हो!  

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

आओ पेड़ लगाएं

आओ हम सब पेड़ लगाएं  
जीवन एक आदर्श बनाएँ!   

कहीं भी जाएँ, कहीं से आएं
अपने पेड़ से मिलकर जाएँ
अपनी व्यथा जिसे कह पाएं
ऐसा जीवन-साथी बनाएं.
आओ हम सब पेड़ लगाएं
जीवन एक आदर्श बनाएँ!

पेड़ों से हरियाली आए
जीवन में खुशहाली आए
वर्षा लाएं, प्रदूषण मिटाएं
पेड़ हमारे बहुत काम आएं
आओ हम सब पेड़ लगाएं
जीवन एक आदर्श बनाएँ!

पेड़ों पर निर्भर सब पक्षी
शाकाहारी हों या परभक्षी 
पेड़ों की छाया में आकर
सब अपनी थकान मिटाएं
आओ हम सब पेड़ लगाएं   
जीवन एक आदर्श बनाएँ!

                  –अश्विनी रॉय ‘सहर’

ये संवेदनहीनता है या संवेदनशीलता?

हाल ही में नोबेल शान्ति पुरस्कार की घोषणा हुई है. नोबेल पुरस्कार समिति ने इस बार यह पुरस्कार स्वात घाटी पाकिस्तान की मलाला युसुफजई तथा भारत के कैलाश सत्यार्थी को दिया है. हमारी ओर से इन्हें इस उपलब्धि पर खूब बधाई हो!
नोबेल समिति ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया है कि यह पुरस्कार एक हिन्दू व मुसलमान को संयुक्त रूप से दिया गया है. इसका क्या तात्पर्य हो सकता है? क्या शान्ति पुरस्कार देते समय भी हिन्दू और मुसलमान का ध्यान रखना आवश्यक है? क्या नोबेल समिति अधिक संवेदनशील हो गई है या फिर मानव-मानव में भेद करने पर अधिक संवेदनहीन हुई है? उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी जीवन-पर्यंत अछूतोद्धार हेतु संघर्ष करते रहे, परन्तु उन्हें कभी भी इस पुरस्कार के योग्य नहीं समझा गया. निःसंदेह आजकल किसी को भी कोई पुरस्कार मिलता है, तो वह बधाई का पात्र है. जाहिर है सभी भारतीयों को इस पर खुशी हुई होगी परन्तु इस पुरस्कार की पृष्ठ-भूमि क्या है? अगर हमारे देश में बच्चों का शोषण न हुआ होता तो क्या यह पुरस्कार किसी को मिल पाता? शायद ये लगभग असंभव ही था. इसी तरह मलाला युसुफजई पर जान-लेवा हमला न होने की स्थिति में भी यह पुरस्कार किसी भी हालत में घोषित न हुआ होता.
क्या हमारे संविधान में बाल-अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है? यदि है तो क्या यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है? ऐसा क्यों होता है कि दीवाली के अवसर पर बनाए जाने वाले अधिकतर पटाखे हमारे बच्चे अपनी जान को जोखिम में डाल कर बनाते हैं? बाल-श्रमिकों से जोखिम भरे काम लेना न केवल गैर-कानूनी है अपितु अनैतिक भी है. फिरोजाबाद में मैंने बहुत से बाल श्रमिकों को चूड़ी उद्योग में अपने हाथ खराब करते हुए देखा है. यह अत्यंत शर्म की बात है कि हम अपने बच्चों से उनका बचपन छीनते जा रहे हैं. जो काम सरकार को सख्ती से क़ानून लागू करके करना चाहिए, उसे सामाजिक संगठनो द्वारा अपने स्तर पर करवाने की चेष्टा होती है. ध्यातव्य है कि अधिकतर बच्चे आज भी देश में बंधुआ मजदूरी कर रहे हैं. यह हमारी संवेदनहीनता का ही परिचायक है.
अक्सर देखा गया है कि पहले हमारी संवेदनहीनता से गैर कानूनी कार्यों को बढ़ावा मिलता है फिर उन्हें छोड़ने व छुडवाने का प्रयास करने पर पुरस्कृत करके संवेदनशीलता का परिचय दिया जाता है. क्या कोई सरकार इस तरह मिलने वाले नोबेल पुरस्कार पर अपनी पीठ ठोक सकती है? यह कदापि सम्भव नहीं है. जब भी इतिहास में इस पुरस्कार का जिक्र होगा तो इसके साथ हमारे यहाँ बाल-श्रमिकों की दुर्दशा का भी बखान होगा! तो क्या हम इस तरह के पुरस्कार पर जश्न मना कर अपनी निंदा करवा सकते हैं? शायद हम इतने भी संवेदनहीन नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि बहुत से विकसित देशों में इस प्रकार के कार्यों पर पुरस्कार देने की नौबत ही नहीं आती. जाहिर है वहाँ इस तरह के कार्य करना सभी नागरिकों का मूलभूत कर्तव्य है.

तो क्या नोबेल शान्ति पुरस्कारों का दायरा सीमित होकर रह गया है? इतिहास में कई बार ये पुरस्कार राजनैतिक एवं भूगोलिक कारणों से भी दिए गए हैं. इससे नोबेल निर्णय समिति की साख को अवश्य ही ठेस पहुंचती है. पहले कई विश्व-नेताओं को निरस्त्रीकरण एवं शान्ति को बढ़ावा देने के लिए नोबेल शान्ति पुरस्कार दिया गया था. यदि इन सबकी पृष्ठभूमि देखी जाए तो मालूम होगा कि ये लोग आरम्भ में तो अस्त्रों की दौड में भाग ले रहे थे और बाद में इस पर नियंत्रण करके वाह-वाही लूट ले गए. उल्लेखनीय है कि जब देशों में अस्त्र-शस्त्र की होड़ लगी, तो उन्हें बेच कर धन कमाया. जब सामरिक हितों की खातिर इन पर नियंत्रण करने की सोची तो नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर खूब मान-सम्मान पाया. क्या इन पुरस्कारों का कोई मानवीय औचित्य नहीं हो सकता? क्या नोबेल पुरस्कार समिति थोड़ा और संवेदनशील हो पाएगी?

शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

ये कैसा बाज़ार!


आइए, आपका स्वागत है इस बाज़ार में! यहाँ सब कुछ बिकता है. आपको दुनिया की हर चीज़ यहाँ मिल सकती है सिवाय एक चीज़ के जिसका न कोई खरीदार है और न ही कोई बेचवाल. जब तक हम अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, आप इस विषय में सोचते रहिए.
आजकल के बाजारीकरण व्यवस्था में प्रायः हर वस्तु बिकने के लिए तैयार है. यह बात अलग है कि कीमत का निर्धारण इसकी आपूर्ति एवं माँग पर निर्भर करता है. अगर माँग ज्यादा हो और आपूर्ति कम, तो जाहिर है बाज़ार में इसके मुंह मांगे भी दाम मिल सकते हैं. उपभोक्ता संस्कृति के इस दौर में टी.वी., फ्रिज, एयरकंडीशनर, वाशिंग मशीन, स्कूटर, कार, बाइक और न जाने क्या-क्या खरीदना चाहते हैं लोग, लेकिन फिर भी खुश नहीं हैं. कारण स्पष्ट है कि रूपए से आप सामान तो खरीद सकते हैं, लेकिन खुशियां नहीं.
अगर कोई बीमार है तो उसे बाज़ार से दवाएं तो मिल सकती हैं, इलाज भी मिल सकता है लेकिन अच्छा स्वास्थ्य भी मिले, इस बात की कोई गारंटी नहीं. हमें उपभोक्तावाद ने आज मजबूत जंजीरों से जकड लिया है. लोगों में कोई प्रेम नाम की चीज़ दिखाई नहीं देती. हर व्यक्ति के पास मोबाइल फोन है मगर उसे इस पर भी बात करने की फुर्सत नहीं. रिश्ते, नाते, मित्र व सम्बन्धी आजकल जेब में हर समय मौजूद हैं, लेकिन वास्तव में वे सब बहुत दूर हैं. कहते हैं कि टेलीफोन व मोबाइल के आने के बाद ये दुनिया एक गाँव में तब्दील हो गई है और हर कोई एक दूसरे के करीब आ गया है. परन्तु हकीकत कुछ और ही है. हम मोबाइल के नज़दीक हैं लेकिन हमारे मित्र व संबंधी हमसे कोसों दूर हैं. हर रोज सोचते हैं कि कल आराम से बैठ कर उनसे बात करेंगे, लेकिन कल कभी आती नहीं और सिलसिला इसी तरह चलता रहता है. अगर कोई नाराज़ हो जाए तो हमें उसे मनाने की फुर्सत नहीं है. अगर मनाने की सोचें तो कोई दूसरी घंटी बजने लगती है और मामला जहां का तहां रह जाता है.
हमारी हालत यहाँ तक आ पहुंची है कि स्कूल में बच्चे अपने मां-बाप के स्थान पर किसी भी व्यक्ति को रूपए देकर अपना अभिभावक बना लेते हैं. जब बच्चे पूरी तरह से बिगड जाते हैं तो पता चलता है कि हम उपभोक्तावाद की दुनिया में किस तरह लापता हो गए थे. आज के युग में सभी रिश्ते-नाते बिकने लगे हैं. शादी हो तो आप भाड़े के बाराती इकट्ठे कर सकते हैं. मातम के लिए भी किराए पर लोग मिल जाते हैं. अगर कुछ नहीं मिलता तो वह है मानसिक शान्ति.
वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति को कहीं तो रुकना पडेगा न! शरीर को आराम की इतनी गंदी लत पड़ गई है कि अब कुछ काम करने को मन ही नहीं होता. ज़रा सोचिए, इसके लिए आखिर कौन जिम्मेवार है? यह सही है कि कुछ आधुनिक यंत्र हमारे जीवन को आरामदेह बनाने के साथ कार्य को तेज़ी से कर सकते हैं परन्तु जल्दी काम निपटने की चाहत में हम अपने आपको भी नष्ट करते जा रहे हैं. कही ऐसा तो नहीं कि एक दिन हमारे स्थान पर मशीन आ जाए और हम कहीं पर भी मौजूद न हों!
एक खबर के अनुसार अमेरिका के एक घर का दरवाजा पिछले दस दिनों से बंद था. पड़ोसियों को भी इतनी फुर्सत नहीं थी कि इस विषय में कोई जानकारी लें. हाँ, कई बार उन्हें कोई संगीत की ध्वनि अवश्य सुनाई दे जाती थी. जब उस घर से बदबू आने लगी तो पुलिस को बुलाया गया. अंदर का दृश्य देख कर हर कोई हैरान था. सोफे की एक कुर्सी पर कोई कंकाल बैठा हुआ टी.वी. देख रहा था क्योंकि शरीर के सड़ने-गलने से अब केवल हड्डियों का ढांचा ही दिखाई दे रहा था. वह वृद्ध व्यक्ति अपने घर में अकेला ही रहता था. एक दिन टी.वी. देखते हुए उसकी मृत्यु हो गई और किसी को भी इस की खबर न हो सकी. इस सत्य कथा से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि हम अपनों की बजाए अब वस्तुओं पर अधिक भरोसा करने लगे हैं. यह अवश्य ही चिंतन का विषय हो सकता है.

आप अधीर हो रहे होंगे कि इस दुनिया में ऎसी कौन-सी चीज़ है जो नहीं बिकती. जी हाँ, आपका अनुमान सही है. वह चीज़ है ईमान. ईमान को न कोई खरीद सकता है और न ही बेच सकता है. ईमान सिर्फ अपनों के पास होता है. अगर अपने ही रूठ जाएँ तो सब कुछ बेकार हो जाता है. अतः हमें अपने अपनों का सम्मान करना चाहिए. हमारे उनके साथ सम्बन्ध हमेशा मधुर रहने चाहिएं. चीज़ें इस्तेमाल के लिए हैं इन्हें इस्तेमाल मे लाइए किन्तु इनके लिए अपनों का त्याग हरगिज़ न करें. चीज़ें बाज़ार से दुबारा भी खरीद सकते हैं लेकिन अपने सगे रिश्तेदार और संबंधी कहीं नहीं मिलते.  

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

'आजादी'

आजादी वो नहीं
जो उड़ना चाहे
मगर उड़ न सके!
आजादी वो भी नहीं
जो उड़ने दे सिर्फ तुम्हें, लेकिन
दूसरों के पर काट डाले!
आज़ादी तो वो है
जो  उड़ने दे तुम्हें, मगर
दूसरों के साथ-साथ!
बाँटे भरपूर खुशियाँ
हम सबके दरमियाँ!
आजादी देह की ही नहीं
बल्कि मन की भी हो!
आजादी तेरी-मेरी नहीं

बल्कि जन-जन की हो! -अश्विनी रॉय 'सहर'

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

बात पते की-

यह सच है कि
नज़दीक के रिश्ते दूर
और दूर के रिश्ते
नज़दीक लगते हैं.
मगर ये भी सच है कि
दूर का रिश्तेदार
बात ही नहीं करता.
जबकि नज़दीक का रिश्तेदार
बहुत काम आता है! –अश्विनी रॉय ‘सहर’

टी.आर.पी. के लिए कुछ भी करेगा!


हमारे टी.वी. मीडिया की धाक देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब है. ये लोग किसी भी अधूरी खबर को सनसनीखेज तरीके से दिखाने में माहिर हैं. पिछली सरकार ने इन्हें करोड़ों रूपए के विज्ञापन देकर इतना उपकृत कर दिया था कि अब इन्हें उस सरकार की नाकामी का ज़िक्र करना भी सहज नहीं लगता. क्या हमारा मीडिया वास्तव में इतना गैर जिम्मेदार है? अगर आप कुछ तथ्यों पर निगाह डालें तो यह स्वयं ही स्पष्ट हो जाएगा.
1.  जब मौजूदा सरकार ने सत्ता संभाली तो इन्हें महँगाई विरासत में मिली. यह सही है कि प्याज महंगे हुए परन्तु यह भी सच है कि पिछली सरकार के समय में जिस दाम पर प्याज बेचे गए, अभी उससे आधे दाम पर ही बेचे जा रहे हैं.
2.  सरकार को सत्ता संभाले अभी दो महीने भी नहीं हुए कि इसे नकारा और निकम्मा साबित करने के लिए कई चैनलों में होड़ लगी है.
3.  इराक से सैंकडों भारतीयों को छुडवा कर स्वदेश लाया गया है परन्तु टी.वी. मीडिया ने इसे कोई तरजीह नहीं दी. ज्ञातव्य है कि भारतीय नर्सों के वहाँ फंसे होने की खबर दिन-रात प्रसारित होती रही थी.
4.  सरकार ने कटड़ा तक जो रेल चलाई है उसे ‘कटरा’ लिख कर प्रचारित कर रहे हैं जबकि सरकार द्वारा स्थापित रेलवे स्टेशन पर भी ‘कटड़ा’ शब्द ही अंकित है. क्या यह भाषाई प्रदूषण हमारे टी.वी. मीडिया की देन नहीं है?
5.  सरकार के एक मंत्री ने ‘पब’ कल्चर को बढ़ावा न देने की बात क्या कह दी, सभी टी.वी. चैनल इसे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का उल्लंघन मान कर चिल्लाने लगे. कुछ लोग ‘पब’ में  जाकर शराब पीने में अपनी शान समझते हैं. यह चलन पश्चिमी देशों से आया है जिसे भारत में अधिकतर लोग बुरा मानते हैं. परन्तु टी.वी. मीडिया द्वारा इस खबर को सत्ता और विपक्ष के बीच एक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
6.  उपर्युक्त घटना पर मीडिया द्वारा ‘डीबेट’ अर्थात परिचर्चा का आयोजन किया गया जिसमें समाज सेवी, महिलाओं के हितों से जुड़े लोगों और राजनेताओं ने भाग लिया. क्या मीडिया केवल खबर ही पेश करता है या उसे अच्छा या बुरा बताने से भी बचता है?
7.  ज्ञातव्य है कि हमारे देश में शराब पीने से लाखों लोगों का स्वास्थ्य खराब होता है तथा इसे पी कर जो क़ानून व व्यवस्था की बदतर स्थिति बनती है, उसमें असंख्य अपराध होते हैं.
8.  जहां आम नागरिक को सुरक्षित माहौल मयस्सर न हो वहाँ आप ‘पबों’ में क़ानून और व्यवस्था बनाने के लिए कैसे अतिरिक्त बल तैनात कर सकते हैं? युवा लड़के व लड़कियों द्वारा ‘पब’ में शराब पीने से अनावश्यक अपराधी प्रवृत्तियाँ हावी होने लगती हैं जिसे समाज के शांतिप्रिय लोग पसंद नहीं करते.
9.  क्या शराब बंदी किसी राजनैतिक दल की ‘कल्चर’ है? कम से कम हमें तो ऐसा नहीं लगता. महिला हितों की रक्षा करने वाली आयोग की अध्यक्षा यह कहते हुए सुनी गई कि भारत में पश्चिमी सभ्यता बरसों से आ रही है अतः इस पर अंकुश लगाना ठीक नहीं है. वह परोक्ष रूप से महिलाओं के ‘पब’ में जा कर शराब पीने के अधिकार की वकालत करती हुई नज़र आई.
10. दिल्ली के एक स्कूल की प्रिंसिपल को भी आमंत्रित किया गया था, जो पब में शराब पीने को बुरा नहीं मानती. क्या ये प्रिंसिपल महोदय अपने घर में भी अपने सदस्यों को शराब परोसने के हक में हैं? अगर नहीं, तो क्यों? जो कृत्य घर में बुरा है वह ‘पब’ में क्यों नहीं?
11. कांग्रेस के एक नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि शराब पीना उनकी पारिवारिक परम्परा है, इस पर कोई रोक नहीं लगा सकता. क्या गुजरात राज्य में लागू शराब बंदी गैर कानूनी है? अगर नहीं, तो इसे अन्य राज्य लागू क्यों नहीं कर सकते? क्या किसी को शराब पीने की इजाजत केवल इस लिए दे दी जाए कि यह उनकी खानदानी परम्परा है?
12. अधिकतर चैनल घुमा-फिरा कर ‘पब’ में शराब परोसने को बढ़ावा देते हुए नज़र आए. कुछ ने तो यह भी कहा कि इस बयानबाजी की आड़ में संघ परिवार अपना अजेंडा आगे बढ़ा रहा है. तो क्या ये कोई राजनैतिक आंदोलन है?
13. क्या हमारे टी.वी. मीडिया की अपने समाज के प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती? क्या ये अपराध करते हुए लोगों की फोटो ही दिखा कर अपने कर्तव्य की इति-श्री कर लेते हैं?
14. हमारा टी.वी. मीडिया देश की ज्वलंत समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं है. वह ओछी मानसिकता वाली ख़बरें और परिचर्चा दिखा कर अपनी टी.आर.पी. रेटिंग बढ़ाने में विश्वास करता है. देश के हित की इसे कोई खबर नहीं है.

15. कोई खबर हाथ लगने की देर है, बस डौंडी बजानी शुरू हो जाती है. सुबह से शाम तक एक ही सुर में सब चैनल अपना एक ही राग अलापने लगते हैं. आजकल ‘टमाटर’ को ही एक राष्ट्रीय मुद्दा बना लिया है. क्या टमाटर के बिना जीवन समाप्त हो जाएगा? शायद, हमारा टी.वी. मीडिया तो यही सोचता है!

बुधवार, 28 मई 2014

भिखारी - एक लघु कथा

लेखक- अश्विनी कुमार रॉय
गाड़ी अभी स्टेशन से छूटने ही वाली थी. जब सब लोग इसमें अपना सामान चढ़ा रहे थे, तो एक नौजवान लड़का अपने बाएँ हाथ से भीख माँगता हुआ वहाँ आया. सभी यात्री उस जवान लड़के का एक हाथ देख कर स्तब्ध थे. एक ने कहा कि ईश्वर भी न जाने कैसे-कैसे इम्तिहान लेता है! लड़का अभी जवान है और इसने अपनी दाईं भुजा गंवा दी है. न जाने यह अपनी जिंदगी की गुजर-बसर कैसे कर पाएगा?

जिस यात्री से जो भी बन पड़ा, उसे दिया. देखते ही देखते उसके पास बहुत से पांच और दस रूपए के नोट इकट्ठे हो गए. इतने में गाड़ी ने सीटी बजाई और वह लड़का नीचे कूद गया. गाड़ी से उतरते ही उसने अपनी कमीज़ से दाईं भुजा बाहर निकाली और रूपए गिनने लगा. उस लड़के पर दया करके भीख देने वाले सभी यात्री खिडकी से बाहर झांकते हुए स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे.

बाज़ार में उपलब्ध खतरनाक पेय उत्पाद


कोका-कोला मानव चयापचय अथवा 'मेटाबोलिज्म' के लिए एक खतरनाक ज़हर की तरह है. इसकी एसिडिटी का स्तर बैटरी में मिलने वाले तेज़ाब के आसपास है. यह कई घरेलू क्लीनरों की तरह सफाई करने के काम में प्रयुक्त किया जा सकता है. तीसरी दुनिया के देशों में इस तरह के पेय पदार्थ शुद्ध पेय जल की तुलना में आसानी से उपलब्ध हैं. इस कोल्ड ड्रिंक को पीने वाले लोगों में ह्रदय एवं श्वास रोग होने की संभावना बहुत अधिक होती है. 

कार्बोराइज्ड ड्रिंक पीने से हड्डियों से केल्शियम की हानि होती है. आप इस कमी को दूर करने के लिए सब्जियां, फल या दूध तो ले सकते हैं परन्तु केल्शियम अवशोषण के लिए केवल इसके स्त्रोत ही पर्याप्त नहीं होते! यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकतर लोग इस प्रकार के पेय पदार्थों के सेवन करने में अपनी शान समझते हैं. यह सब अशिक्षा एवं अज्ञानता के कारण हो रहा है. हमारी सरकार द्वारा ऐसे हानिकारक पेय पदार्थों पर अविलम्ब प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए.

मानव संसाधन मंत्री के स्नातक न होने पर सवाल


कांग्रेस के एक छुटभइया नेता ने एक अटपटा बयान जारी करके एन. डी. ए. के शिक्षा मंत्री की योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि वे स्नातक भी नहीं हैं. यह अत्यंत खेद का विषय है कि देश का शीर्ष राजनैतिक दल अपनी करारी हार के बाद शालीनता की सारी सीमाएं लांघ चुका है और उसके पास कहने को शायद कुछ बचा ही नहीं है. विचारणीय है कि अगर आप अपनी टांग से कपड़ा ऊपर उठाते हैं तो स्वयं ही नंगे हो जाते हो. इन्हें यह सवाल उठाने से पहले यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए? क्या स्नातक व्यक्ति ही शिक्षा मंत्री या प्रधानमंत्री हो सकते हैं? अगर हाँ, तो स्नातक मंत्रियों के होते हुए हमारा शिक्षा का स्तर जस का तस क्यों है?
भूतपूर्व प्रधानमंत्री तो बहुत बड़े आर्थिक विशेषज्ञ थे फिर भारत अपनी विकास दर में कैसे पिछड़ गया? इस शीर्ष दल को बताना होगा कि उनकी तथाकथित राजनीति “नीच राजनीति”  से कैसे भिन्न है जिसका उल्लेख इन्होने चुनाव प्रचार के दौरान किया था? अगर जनता को स्नातक मंत्रियों की आवश्यकता थी तो जनता ने उन्हें क्यों नकार दिया? ज़ाहिर है कांग्रेस के पास इस विषय में अधिक कहने के लिए कुछ भी नहीं है. यह तो खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचने वाली बात ही लगती है. देश के सबसे पुराना दल होने का दावा ठोकने वाली पार्टी को अपना इतिहास पढ़ने की आवश्यकता है. उन्हें देखना चाहिए कि आज तक जिन लोगों को उनहोंने मंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनाया है, उनकी क्या-क्या योग्यता थी? शायद अपने गिरेबान में झाँकने पर ही इन्हें कोई बात समझ में आ पाएगी.