My expression in words and photography

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मेरा दोस्त


मेरा दोस्त कहीं खो गया है
आपने उसे कहीं देखा है?
मेरे साथ रहता था हर दम
खेलता, कूदता और मुस्कुराता था
न जाने अब कहाँ चला गया है!
मेरा दोस्त कहीं खो गया है
आपने उसे कहीं देखा है?
वो मेरा हमराज़ था
मुझको उस पर नाज़ था
उसका अक्स मेरे पास रह गया है!
मेरा दोस्त कहीं खो गया है
आपने उसे कहीं देखा है?
सदा सभी से मिल कर रहना
बुरा लगे तो चुपके से सहना
न जाने क्यों अब असहनीय हो गया है!
मेरा दोस्त कहीं खो गया है
आपने उसे कहीं देखा है?
जिंदगी की इस धूप-छाँव में
चल रहा हूँ अकेला छाले हैं पाँव में
ऐसा लगता है कि वो आ गया है!
मेरा दोस्त कहीं खो गया है

आपने उसे कहीं देखा है?

सोमवार, 8 जुलाई 2013

गीत

उम्र गुज़र गई यूं ही
यादों के सहारे
कोई हमको भूल गया
किसी को हमने भुला दिया.
उम्र गुज़र गई यूं ही...
जीवन में चलते चलते
लोग मिलते रहे
बढ़ने लगे जब आगे
तो फिर कारवां हुआ.
कोई आगे को बढ़ गया
कोई पीछे ही रह गया
कोई हमको भूल गया
किसी को हमने भुला दिया.
उम्र गुज़र गई यूं ही...
अपने अपनों का साथ
हर किसी को मिले
सबको मिले वो यार
जो प्यार अच्छा लगे.
यूं ही प्यार करते करते
बस प्यार हो गया
कोई हम को भूल गया
किसी को हमने भुला दिया.

उम्र गुज़र गई यूं ही...

गुरुवार, 27 जून 2013

कितना अच्छा था !

कितना अच्छा था पापा पापा कहना
लेकिन बड़ा मुश्किल है पापा कहाना.

अपना था रोज का वही गोरख-धंधा
मगर अच्छा लगता था बाप का कंधा
बहुत मुश्किल था तब कोई डांट सहना.
कितना अच्छा था पापा पापा कहना
लेकिन बड़ा मुश्किल है पापा कहाना.

वो टी.वी. में कोई विज्ञापन का देखना
पापा से कहना “मेरे वास्ते भी ये लाना”
और ज़रा ज़रा सी बात पे फिर रूठना.
कितना अच्छा था पापा पापा कहना
लेकिन बड़ा मुश्किल है पापा कहाना.

अक्सर पापा से डांट खा कर रोना
फिर माँ की गोद में जाकर सोना
बस बे-फिकर, हर दम मस्ती करना.
कितना अच्छा था पापा पापा कहना
लेकिन बड़ा मुश्किल है पापा कहाना.

अब शुरू हो गया है पापा कहाना
ढूँढता रहता हूँ हर दम कोई बहाना
कल वो बहला दिया आज क्या कहना.
कितना अच्छा था पापा पापा कहना

लेकिन बड़ा मुश्किल है पापा कहाना.

परमसुख


वो जो एक नाम को सौ सुख कहता है
आँख का अंधा, खुद को नैनसुख कहता है.

बरस गुजर गए, उसके चेहरे पे हँसी देखे
लेकिन वो खुद को हंसमुख कहता है.

सब कुछ है मगर सकूं नहीं दिल को
देखो उसे वो खुद को मनसुख कहता है.

जिंदगी में न कभी चल पाया ठीक से
फिर भी खुद को तनसुख कहता है.

गर मिले सकूं तन और मन से ‘सहर’

तो हर कोई इसे परमसुख कहता है.

मंगलवार, 18 जून 2013

चिड़िया

जिन्दगी का है सुन्दर निशान चिड़िया
छोटी होकर भी सबसे महान चिड़िया.
माना कि देखने में बहुत छोटी है तू
मगर नहीं छोटी ये उड़ान चिड़िया.
भांप लेती हो खतरों को दूर से ही तुम
बहुत ऊंची है तेरी मचान चिड़िया!
हर दम कुछ सुनाती ही रहती हमें
चीं चीं करती ये तेरी ज़ुबान चिड़िया.
तेरी ताकत का कोई जवाब ही नहीं
क्या टिकेगा तेरे आगे विमान चिड़िया.
बच्चे भी देखकर खुश हो जाते तुम्हे
ऐसी सुन्दर है तेरी पहचान चिड़िया.
नहीं दुश्मन कोई दुनिया में सहर
दोस्ती है फकत तेरा ईमान चिड़िया.

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

प्रेरक प्रसंग

मैं आपके साथ एक प्रेरक प्रसंग सांझा करना चाहता हूँ, जो इस प्रकार है:-
एक महात्मा ने कुछ लोगों को आपस में चिल्लाते हुए देख कर अपने शिष्यों से पूछा कि ये लोग एक दूसरे के साथ ऊंची आवाज़ में बात क्यों कर रहे हैं. इन्हें इतना समीप बैठने के बावजूद ऊंचे स्वर में बात करने की क्या आवश्यकता है? एक ने कहा कि ये क्रोध के कारण ऐसा कर रहे हैं. परन्तु यह बात धीरे से भी तो कही जा सकती है”- साधु ने कहा. शिष्यों ने कुछ अलग तरह के उत्तर भी दिए जिनसे साधु संतुष्ट नहीं हुआ और बोला मैं तुम सबको आज इसका कारण बताता हूँ. जब दो व्यक्ति एक दूसरे पर क्रोधित होते हैं तो उनके दिलों के बीच की दूरी बढ़ जाती है. इसलिए उन्हें अपनी बात कहने के लिए जोर से चिल्लाना पड़ता है. गुस्सा जितना अधिक होगा यह दूरी भी उतनी ही अधिक होगी तथा इस दूरी को तय करने के लिए आवाज़ ऊंची होती जाएगी!
जब दो व्यक्तियों में प्यार होता है तो वे आपस में धीरे धीरे बात करते हैं क्योंकि उनके दिलों के बीच की दूरी बहुत कम होती है. प्रेम जितना अधिक होगा दूरी उतनी ही कम होती जाएगी. प्रेम अत्यधिक होने पर उनकी आवाज़ सुनाई नहीं देगी क्योंकि वे एक दूसरे की आँखों में देख कर समझ जाते हैं कि उन्हें क्या कहना या सुनना है. इसलिए आप जब भी एक दूसरे से बहस करें तो दिलों के बीच फासले बढ़ने दें अन्यथा किसी दिन दिलों के बीच की दूरी इतनी बढ़ सकती है कि वहाँ से लौटना भी कठिन हो सकता है.

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

अजनबी



कितना अच्छा था
जब तक थे अजनबी
मैं और तुम
न मुझे तुमसे कुछ स्वार्थ था
और न तुम्हें कोई सरोकार
अपनी अपनी राहों पर चलते हुए
न जाने कब और कैसे
एक दूसरे के करीब आ गए
नजदीकियां बढ़ी तो
एक दूजे के दोस्त बन गए
मोहब्बत हुई तो फिर
नफरत भी सर उठाने लगी
स्वार्थ के अँधेरे में डूब कर
न जाने मन में कहाँ विस्फोट हुआ
अचानक दोस्त दुश्मन लगने लगा
क्या दोस्त होना बुरा है?
अजनबी होते हुए
हम कितने अच्छे थे!

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

दोस्ती



मत होना परेशां कभी, इस ज़माने में

हौसले से यहाँ सब काम सुधर जाता है.

चाहे कितना भी भुला दो तुम उसको

दोस्त को अक्सर दोस्त याद आता है.

खो गए वो लड़कपन के सुनहरे लम्हे

खेलते हुए बच्चों से ख्याल आता है.

बदल गया है ये ज़माना अब कितना

बीते हुए वक्त से हमें याद आता है.

याद तेरी यूं कुछ खास नहीं हैसहर

तेरा जलवा लेकिन असर दिखाता है.

गुरुवार, 21 मार्च 2013

अच्छे बच्चे



बीते हुए कल के वो बच्चे

भोले-भाले और सीधे-सच्चे.

लेकिन आजकल के बच्चे

चतुर-सुजान, कान के कच्चे.

हम भी तो कभी होते थे

इन्हीं की तरह बहुत अच्छे.

सब के मन को भाते हैं

वे भोले और सुन्दर बच्चे! 

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

ईर्ष्या


नदी मिली जब सागर में
तो अपनी उपलब्धि पर
खूब लगी वह इतराने
पाकर विशाल आकार
वह लगी खुशी मनाने
तब सागर ने ये बात कही
“कहीं नेकट्य का यह मेरे
कोई दुरुपयोग तो नहीं?”

गुरु से पाकर ज्ञान शिष्य
मन ही मन था सोचता
बांटूगा मैं ज्ञान एक दिन
यूं सबको बिन मोल का
लेकिन गुरु ने सोच कर
अपने शिष्य से यूं कही
“कहीं नेकट्य का यह मेरे
कोई दुरुपयोग तो नहीं?”

सुन के साधु के प्रवचन
मन हो गया जब शांत
दान महिमा जागृत हुई
पाकर सत्संग का साथ
साधु को यह देख कर
तब कुछ ईर्ष्या होने लगी
“कहीं नेकट्य का यह मेरे
कोई दुरुपयोग तो नहीं?”