My expression in words and photography

बुधवार, 22 जुलाई 2015

योग का विरोध क्यों?


भारत सरकार 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग-दिवस के अवसर पर पूरे देश में योग दिवस का आयोजन कर रही है. सम्पूर्ण विश्व ने योग की महिमा एवं इससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को मान्यता दी है. योग केवल जीवन पद्धति एवं स्वस्थ परम्परा ही नहीं बल्कि मानव चित्त को शांत रखने के एक काला भी है. आज कई देशों के लोग आपस में वैरभाव एवं वैमनस्य के कारण लड़ रहे हैं. ऐसे में योग सबको जोड़ने का काम करेगा. मनुष्य चाहे किसी भी देश, धर्म अथवा जाति का हो, उसे स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार है. क्या स्वास्थ्य सीमित लोगों की आवश्यकता है? सभी लोग स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त रहना चाहते हैं. ऐसे में उन्हें योग से बेहतर कोई विकल्प नहीं मिल सकता जो अत्यंत आसानी से उपलब्ध हो. योग शब्द का अर्थ है जोड़ना परन्तु लोग इस शब्द के कारण आज एक दूसरे से अलग होने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ लोग इसे अपने स्वास्थ्य हेतु अच्छा मानने की बजाय अपने धर्म का विरोधी मान बैठे हैं. यह कैसी सोच है?
हमारे देश में कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी राजनैतिक दल आज योग के विरोध में खड़े हो गए हैं. वे इसे भारतीय जनता पार्टी एवं संघ परिवार का निजी एजेंडा बता रहे हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने स्पष्ट किया है कि योग दिवस के चलते कोई भी कार्यकर्ता पार्टी का झंडा नहीं फहराएगा. इसी तरह किसी भी हिन्दू संगठन को इस आयोजन से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. आजकल योग कई यूरोपीय एवं अमेरिकी देशों में लोकप्रिय हो रहा है. क्या वहाँ पर इसे भारतीय जनता पार्टी ने लोकप्रिय किया है? जो भी व्यक्ति यौगिक क्रियाओं में भाग लेता है वह इसका महत्त्व बखूबी समझता है. ऐसे में देश के विपक्षी दलों का योग-विरोध समझ के परे है. विरोध करने के लिए देश में अन्य कई मुद्दे हैं परन्तु विपक्ष इन पर विरोध करना तो दूर, कभी चर्चा करना भी गवारा नहीं करता.
ऐसा ही एक मुद्दा आरक्षण का है. कांग्रेस को डर है कि अगर जाटों के आरक्षण का विरोध किया तो उनके वोट अन्यत्र चले जाएंगे. अधिकतर पार्टियां इस मुद्दे पर खामोश हैं क्योंकि वोट किसे बुरे लगते हैं?  हमारे सभी राजनैतिक दल वोटों के लिए देश को बांटने की राजनीति कर रहे हैं.  कहते हैं धडा धर्म से भी महान है. अगर आपका धडा मजबूत है तो आप धर्म पर भी विजय पा सकते हैं. आज समूचा  विश्व ऐसे ही कई मजबूत धडों में बाँट गया है जो आपस में लड़ते रहते हैं. जो विजयी होता है वह अधिक दौलतमंद और प्रभावशाली हो जाता है. क्या जीवन का ऊदेश्य केवल दौलतमंद एवं बलशाली होना ही है? अगर जीतना है तो स्वयं को विजय करो. मानवता को प्रेम सिखाओ न कि नफरत. नफरत के बीज बोने से नफरत ही पैदा होगी. हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस प्रकार क्या सन्देश देंगे? आने वाली नस्लें जब अपने पुरखों के बारे में सोचेंगी तो उन्हें कैसा लगेगा?
हम सबको एक अच्छी एवं स्वस्थ परम्परा का वाहक बनना चाहिए. आज देश की राजनीति इतनी दूषित हो गई है कि सब लोग विरोध की खातिर विरोध करने में लगे हैं. आम आदमी पार्टी एक अलग तरह की छवि ले कर आई थी परन्तु लोगों को इससे भी घोर निराशा ही मिली है. जब दिल्ली के क़ानून मंत्री को फर्जी डिग्री प्रकरण में गिरफ्तार किया तो इनके नेताओं ने इसका जम कर विरोध किया. ये लोग अपने फर्जी डिग्रीधारी मंत्री के बचाव में खुल कर आगे आ गए. आज सारा देश जानता है कि सही कौन है तथा गलत कौन है! कोई भी व्यक्ति अपने अंदर झाँक कर देखना नहीं चाहता. सत्ताधारी दल कुछ गलत करता है तो अन्य दल उसकी आलोचना कर सकते हैं. परन्तु सत्ताधारी दल पूर्ववर्ती सरकारों के निर्णयों को एक परम्परा के रूप में प्रस्तुत करता है जो सही नहीं है. अगर पिछली सरकार ने कुछ गलत किया है तो वर्तमान सरकार को इससे सबक लेना चाहिए. आजकल विदेश मंत्री द्वारा मानवीय आधार पर ललित मोदी की सहायता करने के लिए हमारे विदेश मंत्री की आलोचना हो रही है जो सही भी है. अगर आप कोई अच्छा काम करते हैं तो लोग आपको सर-आँखों  पर  बिठाते हैं, परन्तु एक बुरा काम करने से ही लोग आपके विरोध में उठ खड़े होते हैं. स्वस्थ लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है.
लोकतंत्र में लोगों की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए परन्तु अगर लोग क़ानून को अपने हाथ में लें तो यह भी उचित नहीं है. आज लोगों में असहिष्णुता  बढ़ती जा रही है. किसी एक जाति को आरक्षण मिलने से अन्य जातियों के लोग भी इसकी माँग करने लगते हैं. इसकी नौबत यहाँ तक आ गई है कि आरक्षण न मिलने पर ये लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं. ज़रा सोचिए, अगर यही क्रम जारी रहा तो एक दिन सभी लोग आरक्षण की माँग करने लगेंगे! सरकार को तो अपनी वोटों की फ़िक्र है. ऐसे में कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले भी अप्रभावशाली हो सकते हैं. क्या चंद लोगों को खुश करने के लिए संविधान संशोधन लाना उचित रहेगा? यह चिंतन का विषय हो सकता है. जिस जाति को सुप्रीम कोर्ट भी आरक्षण हेतु उपयुक्त नहीं मानता उसे आरक्षण देने के लिए आज राजनैतिक दलों में होड़-सी मची है. क्या राजनीति का अर्थ केवल सत्ता प्राप्त करना ही है? अगर यह सिलसिला यूं ही चलता रहा तो एक दिन देश में अराजकता की स्थिति भी आ सकती है. सरकार को आर्थिक, रक्षा, विदेश नीति के मोर्चे पर तो भारी चुनौतियों से निपटना पद ही रहा है, वहीं आरक्षण जैसी सामाजिक बुराई ने अगर सर उठाया तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं.

क्या देश के सभी राजनैतिक दल वोटों की राजनीति छोड़ कर देश हित की कोई बात करेंगे?

मंगलवार, 19 मई 2015

देश में निजी स्कूल हों या सरकारी स्कूल?

पटना (बिहार) में सामाजिक समारोह के दौरान एक सात वर्षीय बच्चे ने कहा कि अगर वह प्रधानमंत्री बन गया तो देश के सभी निजी स्कूलों को बंद करवा देगा. कमोबेश इसी तरह की टिप्पणियाँ बहुत से अभिभावक भी करते रहते हैं. उक्त घटना से यह स्पष्ट है कि अधिकतर लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाना तो चाहते हैं परन्तु इसके लिए अधिक फीस देना उन्हें गवारा नहीं है. हमारे देश में सरकारी स्कूलों की फीस तो बहुत कम है किन्तु वहाँ की पढ़ाई एक दम बेकार है. आज एक आम आदमी इसी ऊहापोह में फंस कर रह गया है कि वह अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढाए या सरकारी स्कूलों में! यह समस्या इतनी गंभीर नहीं है परन्तु लोग इस पर सार्थकता से विचार करने को भी कतई तैयार नहीं हैं.
जरा सोचिए कि निजी स्कूल बिना किसी सरकारी सहायता के इतनी अच्छी सुविधाएं कैसे जुटा लेते हैं? अधिकतर मामलों में इन्हें जमीन भी अपने ही रुपयों से खरीदनी पड़ती है. इनकी इमारतें सरकारी स्कूलों से बहुत भव्य एवं अच्छी होती हैं. यदि बैठने के स्थान की तुलना करें तो निजी स्कूलों की कक्षाएं अत्यंत आरामदेह परिस्थितियों में आयोजित की जाती हैं. निजी स्कूलों में बच्चों की अभिरुचियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है. बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु नाना प्रकार के साधन जुटाए जाते हैं. सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूल के अध्यापक बहुत कम वेतन लेते हैं जबकि उन्हें यहाँ कड़ी मेहनत से पढाना पड़ता है. इन सब बातों में कुछ अपवाद भी हो सकते हैं परन्तु अधिकतर मामलों में ये सब बातें सत्य ही है.
सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की नियुक्तियां किस प्रकार होती हैं, यह अब जगजाहिर है. अभी हाल ही में जम्मू तथा कश्मीर हाईकोर्ट के न्यायधीश ने अपनी एक टिप्पणी में सरकारी स्कूल के एक अध्यापक के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने को कहा है जो ‘गाय’ पर निबंध तक नहीं लिख सका. फिर उस अध्यापक ने कहा कि वह गणित का अच्छा ‘जानकार’ है लेकिन पूछने पर चौथी कक्षा के गणित से मामूली प्रश्न भी हल नहीं कर पाया. हमारे देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों की स्थिति लगभग इसी तरह की है. अगर आज सभी अध्यापकों का टेस्ट लिया जाए तो मालूम होगा कि उनमें से आधे तो शिक्षक बनने के लायक ही नहीं हैं. आजकल सरकारी स्कूलों में नियुक्ति पाने के लिए लोग मोटी रिश्वत देने को तैयार हो जाते हैं परन्तु जब इन स्कूलों में अपने बच्चे पढाने की बात सामने आती है तो सभी कन्नी काटने लगते हैं.
कुछ लोगों का सुझाव है कि सभी अध्यापकों एवं सरकारी अफसरों के बच्चों को जबरदस्ती सरकारी स्कूलों में पढाने के लिए दबाव डाला जाए ताकि इन स्कूलों का शैक्षिक वातावरण बेहतर हो सके. क्या इस प्रकार इस् समस्या का हल सम्भव है? कदाचित नहीं. जब तक हम सरकारी स्कूलों में नियुक्त होने वाले अध्यापकों की शिक्षा एवं अनुभव पर ध्यान नहीं देंगे तब तक इन स्कूलों का स्तर सुधरने वाला नहीं है. सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों की शैक्षिक गुणवत्ता समय-समय पर जांचती रहे ताकि फर्जी डिग्री एवं घूस देकर नियुक्तियां प्राप्त लोग यहाँ नौकरी प्राप्त न कर सकें. जो लोग येन-केन-प्रकारेण इस व्यवसाय में जबरन घुस आए हैं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए. अगर हमारे देश के शिक्षक ही नालायाक होंगे तो हमारी भावी पीढ़ी कैसी होगी? आज देश में सभी प्रकार की नौकरियाँ पाने के लिए लंबी कतारें लगी हुई हैं. जो व्यक्ति अपने जीवन में कोई भी नौकरी पाने में असमर्थ रहता है, वह अध्यापक बन जाता है. ऐसा क्यों होता है? क्या इस ‘नोबल’ व्यवसाय के लिए उच्च योग्यता के मापदंड नहीं होने चाहिएं? सरकार भी शिक्षा के नाम पर केन्द्रीय बजट से मामूली राशि का आबंटन करके पल्ला झाड लेती है. अगर हमारे विश्वविद्यालय  तथा स्कूल आज विश्व के शीर्ष संस्थानों में नहीं गिने जाते तो यह सब किसका दोष है? आखिर जैसा पेड़ लगाएंगे उस पर फल भी वैसा ही आएगा न!
जहां देखो, तहां देश की राज्य सरकारें बजट के अभाव में कम तनख्वाह पर ‘गेस्ट’ अध्यापकों की नियुक्तियां करने लगी हैं. बाद में यही अध्यापक पूरे वेतन तथा स्थायी नौकरी की माँग करते हैं. वोटों के दबाव में सरकार इनके साथ समझौता करती है तथा यहीं से शुरू हो जाते है हमारे छात्रों के बुरे दिन. इस लेख का उद्देश्य सुपात्र अध्यापकों को नौकरी से वंचित करना नहीं है किन्तु गेस्ट अध्यापकों को बिना किसी परीक्षा के सकूलों में स्थायी नियुक्ति कैसे दी जा सकती है? हाँ, यदि इनमें कुछ योग्य अध्यापक हैं तो उन्हें अवश्य ही सरकारी स्कूलों में लगाया जाना चाहिए. हमारे अधिकतर सरकारी स्कूलों की स्थिति आज अत्यंत दयनीय हो चुकी है. अध्यापक या तो समय पर नहीं आते या कभी-कभार ही स्कूल में दिखाई देते हैं. भ्रष्टाचार ने हमारे स्कूलों की शिक्षा को उद्देश्यहीन एवं व्यर्थ बना दिया है. बच्चे स्कूलों में कम तथा ट्यूशन पर अधिक पढते हैं.

आजकल सरकारी स्कूलों में परीक्षा परिणाम बीस प्रतिशत से भी कम आने लगे हैं. सरकार हर साल अधिक छात्रों को पास करने के लिए विशेष फार्मूले बनाती है जिसके अंतर्गत कमज़ोर छात्रों को ‘ग्रेस’ अंक दिए जाते हैं. क्या यह सरकार अपने स्कूलों को भी कभी कोई ‘ग्रेस’ दे पाएगी? यह सिलसिला कब तक चलेगा? छात्र देश का भविष्य होते हैं. इनके भविष्य से खिलवाड़ करना देशद्रोह के समान होता है. स्कूलों में केवल योग्य विद्यार्थियों को ही पास करना चाहिए वरना यही अयोग्य विद्यार्थी दोबारा शिक्षक बन कर आएँगे तथा स्कूल के परिक्षा परिणामों को इसी प्रकार प्रभावित करते रहेंगे. यदि सरकार के काम चलाने के लिए आई.ए.एस. अफसरों की आवश्यकता हो सकती है तो स्कूलों के लिए योग्य अध्यापक क्यों नहीं? यदि समय रहते इन स्कूलों का स्तर नहीं सुधरा तो लोग अपने बच्चों को इनमें पढ़ने के लिए कैसे प्रेरित कर पाएंगे?

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

किसान आत्महत्या क्यों करते हैं?


आजकल बदलते हुए जलवायु परिदृश्य से सभी हैरान और परेशान हैं. जब बारिश की आवश्यकता होती है तो सूखा पड़ता है तथा जब सूखा आवश्यक हो तो बारिश या ओलावृष्टि होने लगती है. जब इन दोनों में से कोई अपना रंग न दिखाए तो भूकंप आ जाता है. अगर देखा जाए तो प्राकृतिक आपदाएं हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग हो गई हैं. इन आपदाओं से आजकल कोई भी व्यक्ति अछूता नहीं है. तो फिर केवल किसानों में इतनी बेचैनी क्यों है जो इन्हें आत्म ह्त्या के लिए मजबूर करती है? आइए, इस समस्या पर विचार करें.
हमारा देश आरम्भ से ही कृषि पर आधारित रहा है परन्तु भारी उद्योगों का विकास होने के कारण देश की कृषि योग्य भूमि का क्षरण होने लगा है. पहले हम तीस करोड़ लोगों के खाने के लिए भी अन्न पैदा नहीं कर पाते थे परन्तु आज हम एक सौ बीस करोड़ लोगों को भरपेट खिलाने में सक्षम हैं. यह सब हरित क्रान्ति के कारण ही संभव हो सका है. आज देश में दूध का उत्पादन भी विश्व में दूसरे स्थान पर है. इसका एक अन्य पहलू यह भी है कि अत्याधिक उत्पादन के बा-वजूद हमारे देश में प्रति एकड़ पैदावार अन्य विकसित राष्ट्रों के मुकाबले बहुत कम है. इसी प्रकार दूध के मामले में भी प्रति पशु दुग्ध-उत्पादन बहुत कम है. हमारा किसान खेती के परम्परागत तरीकों को ही इस्तेमाल करता आया है. वह आज भी अपने सहेज के रखे बीजों से फसल उगाता है. हमारा किसान आज भी अशिक्षित है तथा नई तकनीकी अपनाने के मामले में उसे कोई दिलचस्पी नहीं है. वह इसे महँगा व जोखिम भरा बता कर पल्ला झाड लेता है.
आज वैश्विक स्तर पर कृषि का उत्पादन नए शिखर छूने जा रहा है जबकि भारत में अब भी कई स्थानों पर कृषि पूर्णतया बारिश पर ही निर्भर है. जहां कम पानी की फसलें उगानी चाहिएं वहां हम अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलें बो रहे हैं. इसी तरह देखा जाए तो हम अपने संसाधनों का युक्ति-संगत उपयोग नहीं कर रहे हैं. भूमिगत जल का लगातार दोहन होने से स्थिति और भी विकराल रूप लेती जा रही है. हमारा किसान बिना किसी सोच विचार के अपनी खेती करता जा रहा है जबकि दुनिया कहीं आगे निकल गई है. बरसों से एक जैसी फसलें बार-बार उगाने के कारण मिट्टी में कुछ विशेष तत्त्वों की कमी हो जाती है जिससे किसान अनभिज्ञ रहता है. इसका कृषि उत्पादन क्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ता है. जलवायु परिवर्तन के कारण भी हमारी फसलों का उत्पादन कम हो रहा है. हमारा पर्यावरण दूषित हो गया है. खेतों में नई तरह के कीट एवं खरपतवार निकलने लगे हैं. इन्हें परम्परागत साधनों से नष्ट करना अब आसान नहीं रहा. किसानों को उन्नत खेती के लिए अधिक उत्पादन क्षमता वाले बीजों की आवश्यकता पड़ती है. खाद और पानी का समुचित लाभ न मिलने के कारण किसान को हानि उठानी पड़ती है. वह रुपया उधार लेकर खेती करता है जबकि प्राकृतिक आपदा के एक झटके में ही उसकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है. वह अन्दर से टूट जाता है तथा आत्म-हत्या जैसा आसान किन्तु निंदनीय कार्य करने में भी संकोच नहीं करता.
क्या आत्म-हत्या करने से किसी समस्या का समाधान हो सकता है? कदाचित नहीं. मुसीबत का सामना तो डट कर किया जाना चाहिए. जनसँख्या बढ़ने के कारण किसान के खेत भी छोटे होते जा रहे हैं. छोटे-छोटे खेतों में अनाज उगाना उतना लाभकारी नहीं होता जितना बड़े खेतो के लिए लाभदायक है. ऐसे में किसानों को आपस में मिलजुल कर खेती करने पर विचार करना चाहिए. जो मशीन एक छोटा किसान अकेला नहीं खरीद सकता, उसे कई किसान मिलकर खरीद सकते हैं. इसी तरह उन्नत प्रौद्योगिकी द्वारा अधिक उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकता है. आज देश में ऐसे भी किसान हैं जो एक एकड़ जमीन से इतनी आय कर लेते हैं जितनी शायद अन्य किसान दस एकड़ खेत से भी नहीं कर पाते. अतः किसानों को अपनी सहायता स्वयं करनी होगी. हमारा किसान सरकार के भरोसे रह कर खेती में कामयाब नहीं हो सकता. प्रत्येक किसान को अपने मुश्किल समय के लिए कुछ न कुछ धन अवश्य जोड़ना चाहिए. अन्यथा वह आढतियों एवं दलालों के चंगुल से कभी नहीं छूट पाएगा. किसानों को अपनी फसलें बदल बदल कर बोनी चाहिएं ताकि मिट्टी से खनिज तत्त्वों का अनावश्यक दोहन न होने पाए तथा इसकी उर्वरा शक्ति अधिक समय तक बनी रहे.
यदि हमारा किसान शिक्षित एवं समझदार होगा तो वह कभी भी आत्महत्या जैसी घिनौनी बात नहीं सोचेगा. जो लोग बैसाखी के सहारे चलते हैं वे कभी भी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते. हर प्राकृतिक आपदा के समय उसे सरकार की ओर ताकने की बजाय अपनी मदद खुद करनी होगी. ज़रा सोचिए, अगर सरकार सभी किसानों की घटिया फसलें पूरे दाम में खरीदने लगे तो एक दिन ऐसा आएगा कि कोई भी किसान अपनी फसल को भीगने से नहीं बचाएगा क्योंकि उसे इस बात का यकीन हो जाएगा कि सरकार उचित मुआवजा दे देगी. इसी तरह किसान को भी अपने खाने के लिए भीगी और बर्बाद फसल खरीदने की नौबत आ सकती है. अतः सरकारी सहायता के दुरुपयोग को भी रोकना होगा ताकि लोग जान-बूझ कर ही इसे प्राप्त न करने लगें. जिन लोगों को इसकी आवश्यकता है उन्हें इससे वंचित न रहना पड़े. यह सब आपसी सहयोग एवं तालमेल से ही संभव हो सकता है.

हमारी सरकार तो सभी नागरिकों हेतु कई कल्याणकारी योजनाएं चलाती ही है, उसी तरह किसानों को भी अपने उत्थान के लिए स्वयं आगे आना होगा ताकि वह छोटी-मोटी प्राकृतिक आपदा से स्वयं ही निपट सके. ये आपदाएं केवल किसानों को ही नहीं बल्कि हमारे देश के सभी लोगों को प्रभावित करती हैं. ऐसे में हम सब को आत्महत्या का विचार छोड़ कर हिम्मत से काम लेना होगा ताकि मौसम की मार को बे-असर किया जा सके!

उबाऊ टी.वी., पकाऊ मीडिया; ठगता रहेगा, बिकाऊ मीडिया!


व्यावसायिक होना बुरी बात नहीं है परन्तु जिस तरह हमारा टी.वी. मीडिया ख़बरों की मार्केटिंग कर रहा है, वह अवश्य ही निंदनीय है. पिछले दिनों बोट क्लब, दिल्ली में एक रैली हुई जिसमें कथित रूप से किसी किसान ने पेड़ पर लटक कर अपनी जान दे दी. हमारा टी.वी. मीडिया जोर-शोर से इस खबर का प्रसारण ही नहीं बल्कि यूं कहें कि सुबह शाम भोंपू की तरह इसका बखान करने में लग गया. ऐसा लगता था कि देश में इस खबर के अतिरिक्त कोई दूसरी खबर है ही नहीं. अगर कोई इनसे पूछे कि जब किसान आत्महत्या कर रहा था तो आप उसकी तस्वीरें उतारने में लगे रहे. क्या आपने उसकी जान बचाने की सोची? अगर चाहते तो मीडिया वाले ही उसकी जान बचा कर देश में सबकी वाह-वाही लूट सकते थे. परन्तु सवाल तो टी.आर.पी. का है न. क्या किसान की जान बचने से इनके चैनल हेतु कोई कहानी बन पाती? फिर अचानक नेपाल में भूकंप आया तथा हज़ारों लोग बेघर हो गए तथा कईयों को अपनी जान गंवानी पडी. मैं यहाँ ये स्पष्ट कर दूँ कि इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष या संस्था पर दोषा-रोपण करना कतई नहीं है. यह लेख तो केवल आत्मचिंतन एवं मंथन करने की कवायद भर ही है जिसे इसी परिपेक्ष्य में लिया जाना चाहिए.
यह ठीक है कि मीडिया को संवेदनशील होते हुए तुरंत ताज़ी ख़बरें लोगों तक पहुंचानी चाहिएं परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि सभी ख़बरों को सनसनीखेज तरीके से पेश किया जाए. ज़रा इसकी एक बानगी तो देखिए! नेपाल में भूकंप, कुदरत का कहर, वहाँ सबसे पहले पहुंचे हम, नेपाल की ताज़ा तस्वीरों के लिए देखते रहिए हमारा चैनल....! अब आप ही बताइए कि ये आप खबरें दे रहे हैं या उनके माध्यम से अपने चैनल का प्रचार कर रहे हैं? कई बार तो ऐसा लगता है कि आप प्राकृतिक आपदा को अपने ढंग से दिखा कर प्रभावित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं. भूकंप-ग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचे विभिन्न चैनलों के विडियो कैमरा ऑपरेटर चाहते हुए भी किसी की सहायता करने की बजाय मुसीबत में फंसे लोगों की टिप्पणियाँ ‘लाइव’ दिखाने लगते हैं. यह न केवल अशोभनीय है अपितु शर्मनाक भी है. पत्रकारों को ऐसे स्थान पर जाने हेतु विशेष अनुमति दी जाती है परन्तु ये लोग केवल ख़बरें दिखाने के बहाने रोते-बिलखते आपदा-ग्रस्त लोगों की तस्वीरें प्रसारित करने लगते हैं.
टी.वी. में समाचार देखने पर मालूम होता है कि पहले किसानों की आत्महत्या से संबंधी ख़बरों का सैलाब आया था फिर उसके बाद आम आदमी पार्टी की रैली का. फिर अचानक भूकंप आने से चैनलों ने नेपाल के भूकंप को ही अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने का माध्यम बना डाला. यदि हमारे न्यूज़ चैनल वाले वास्तव में राहत कार्यों में अपना योगदान देना चाहते तो और भी रचनात्मक ढंग से अपना सहयोग कर सकते थे. परन्तु ये लोग तो केवल वही काम करते हैं जिससे इनकी टी.आर.पी. बढ़ सके. आपने एक बात और नोट की होगी कि जब एक चैनल विज्ञापन दिखा रहा होता है तो अन्य चैनल भी विज्ञापन दिखाने की गंगा में हाथ ढो रहे होते हैं, अर्थात आप विज्ञापन देखने से किसी प्रकार नहीं बच सकते. वैसे तो इन सब चैनलों में कड़ी स्पर्द्धा है किन्तु विज्ञापन दिखाने के समय सभी ने एक जैसे ही निर्धारित किए हैं ताकि इनकी कमाई में कोई फर्क न पड़े.
ख़बरें देखते-देखते अचानक टी.वी. स्क्रीन के नीचे एक पट्टी पर लिखा होता है कि शाम सात बजे जानिए कि किस शहर में हुआ महिला का बलात्कार. कहाँ हुआ भीषण सड़क हादसा? उत्तर प्रदेश में ट्रेन को कैसे लूटा गया? एक कलर्क  ने किस प्रकार भ्रष्टाचार द्वारा अकूत धन-दौलत अर्जित की? जानने के लिए देखते रहिए हमारा न्यूज़ चैनल! अब आप ही बताइए कि ये समाचार चैनल हैं या ख़बरों को महिमा-मंडित करते हुए टी.आर.पी. के भूखे भेड़िए? इसका निर्णय मैं आप लोगों पर छोडता हूँ. सीमा पर लड़ते हुए हमारा जवान शहीद हो जाता है जिस पर राजनैतिक लोग बयानबाजी शुरू कर देते हैं. चैनलों को इस ‘शहादत’ की खबर में कोई दिलचस्पी नहीं परन्तु नेताओं के बयान बार-बार दिखाए जाते हैं ताकि समाचार को सनसनीखेज ढंग से पेश किया जा सके. फिर उसी शाम को स्टूडियो में कुछ विभिन्न दलों के नेताओं को बुला कर बहसबाजी की जाती है जिसका परिणाम लगभग शून्य होता है परन्तु इस बीच इनको विज्ञापनों से भारी-भरकम आय हो जाती है.
अगर न्यूज़ चैनल चाहें तो देश की विभिन्न समस्याओं पर राष्ट्रव्यापी बहस अपने माध्यम से करवा सकते हैं. इस तरह की बहस में अलग अलग राजनैतिक दल के व्यक्तियों को बुलाने की बजाय उस विषय से सम्बंधित विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, समाजशास्त्रियों, सिविल अफसरों, एन.जी.ओ. आदि से सम्बंधित लोगों को ही आमंत्रित किया जाना चाहिए ताकि वे एक दूसरे पर आक्षेप करने की बजाय चर्चा में सकारात्मक रूख अपना सकें. इस तरह की राष्ट्रीय बहस से अवश्य ही समाज एवं देश का हित होगा. अगर चैनल वाले चाहें तो देश के दर्शकों की प्रतिक्रियाएं भी ले सकते हैं. किसी स्थान पर सड़क दुर्घटना देखने पर फ़ौरन सहायता पहुंचाने हेतु सम्बंधित अधिकारियों से संपर्क साधना चाहिए. ये लोग मीडिया के दर से अपना कार्य तत्परता से करने लगते हैं. इसी तरह बाढ़ग्रस्त एवं भूकंपग्रस्त क्षेत्रों में ये लोग अपना सूचना केन्द्र स्थापित कर सकते हैं जो सबकी सहायता करने हेतु बेहतर समन्वय स्थापित करने में अपनी महती भूमिका अदा कर सकता है. मीडिया चाहे तो लोगों को प्रभावित स्थानों हेतु सामग्री भेजने की अपील कर सकता है जो अभी तक किसी भी टी.वी. चैनल ने नहीं की है. अच्छा काम करने के लिए आपको टी.आर.पी. का लाभ तो नहीं मिलता परन्तु लोगों के दिलों में अवश्य ही आपका सम्मान बढ़ता है.

क्या इस देश में ख़बरों के नाम पर सब कुछ उबाऊ होता जा रहा है? ये लोग टी.वी. दर्शकों को कब तक पकाते रहेंगे? इस बिकाऊ मीडिया से कब मुक्ति मिलेगी? शायद इन सब प्रश्नों का उत्तर दर्शकों के पास भी नहीं है. न जाने कब तक इस देश के लोग ऐसे भौंडे मजाक को देखने के लिए ऐसे ही मजबूर होते रहेंगे!

सोमवार, 16 मार्च 2015

खामोश चीखें – एक पुस्तक समीक्षा. (भाग-२)

हरकीरत हीर ने हाल ही में ‘आगमन’ प्रकाशक द्वारा यह कविता संग्रह पाठकों हेतु प्रस्तुत किया है जिसके कुल १२८ पृष्ठ हैं. यह पुस्तक बेजान चीज़ों में भी जान की तलाश करते हुए रूहानियत की नई बुलंदियों को छूने की कोशिश करती हुई प्रतीत होती है. कवयित्री की पंजाबी पृष्ठ भूमि का प्रभाव भी इसमें मुखर होता हुआ जान पड़ता है. कहते हैं पत्थर में खुदा का वजूद है लेकिन सबसे पहले इसे इन्सान ने ही देखा और महसूस किया. मोहब्बत भी कुदरत की बेशकीमती नेमतों में से एक एहसास है जिसका दीदार ना-मुमकिन है लेकिन इसे रूह की गहराइयों से महसूस किया जा सकता है. कहीं ‘कब्र’ में रिश्ते दफन हैं तो कहीं रिश्तों में नफरतों की दरारे हैं. एक अदद ‘तिनका’ .... चाहिए बस ... मोहब्बत को इसी का सहारा है! ऐसा प्रतीत होता है कि कवयित्री ने ‘दर्द’ को गहराइयों से अनुभव करके ही अपनी कविताओं को इस किताब के खाली सफहों यानि ‘कैनवास’ पर उकेरा है. लोग ‘हीर’ को रांझे के कारण जानते होंगे परन्तु राँझा तो उसकी आँखों में साक्षात ‘रब्ब’ को देखता था. कभी-कभी शब्दों के अर्थ इतने गहरे हो जाते हैं कि वे स्वतः बोलने लगते हैं. ‘हीर’ की इन कविताओं में कुछ ऎसी ही अनुभूतियाँ दिखाई देती हैं. इस संग्रह में यथासंभव शब्दों की अपव्ययिता से परहेज़ किया गया है. आपके लिए ‘ईद’ की एक बानगी प्रस्तुत है-
“मैं जब ‘हकीर’ थी
उसके रोज़े ही रोज़े थे
मैं जब ‘हीर’ हुई
उसकी ईद हो गई!”
‘नज़्म’ की बेचारगी पर कहा गया है कि-
”मैं तो नज़्म हूँ
जिसे हर कोई पढता तो है
पर सहेजता कोई नहीं ....”
जो लोग रूहानियत में यकीन रखते हैं उनकी पहुँच सीधे रब्ब तक होती है. कविताएं महज़ लफ़्ज़ों की कारीगरी ही नहीं बल्कि प्रेरणा-स्रोत भी हैं, जैसे एक छोटी से छोटी चिड़िया को भी अपनी ‘उड़ान’ से ये मालूम होना चाहिए कि-
“आकाश सिर्फ खूबसूरत
पंख वालों का ही नहीं
ऊँची उड़ान की सोच
रखने वालों का भी
होता है...!’
‘मिलन’ में मंज़रकशी देखते ही बनती है-
“नज़्म रात
इश्क के कलीरे बाँध
धीमे – धीमे
सीढियां उतर
तारों के घर की ओर
चल पडी ......
खौफज़दा रात
अंगारों पर पानी
डालती रही.....!”
‘माँ’ ... के बारे में लिखा है कि-
.....“आज भी जब देखती हूँ
भरी आँखों से माँ की तस्वीर
उसकी आँखों में
उतर आते हैं
दुआओं के बोल .... !
माजी में स्त्री-पुरुष के परस्पर संबंधों के विषय में बहुत कुछ लिखा जाता रहा है. हमारे समाज में इन दोनों के रिश्तों के बीच असमानता सभी को खलती रही है. “आधा रिश्ता” में इसे यूं उकेरा गया है-
“क्या कहा .... ?
औरत मर्द का
आधा हिस्सा होती है?
बताना तो ज़रा....
तुमने इस आधे हिस्से के बारे
ज़िंदगी में
कितनी बार सोचा........ ?”
कविता संग्रह की कवितायेँ बहुत सहज हैं लेकिन पढ़ने के बाद भी इनका असर दिलो-दिमाग पर छाया रहता है. ‘गुलाब’ में ज़रा इसका जलवा देखिए-
“वक़्त ने कहा
आ तुझे ‘गुलाब’ का फूल दूँ
हवा मुस्कुराई....
पतझड़ का मौसम कभी
रंगीनी नहीं देता हीर ....!”

निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि खामोशी की कोई जुबान नहीं होती, लेकिन कभी-कभी यह खामोशी बुलंद आवाज़ में चीखती हुई अपनी उपस्थिती का आभास करवाती है. हरकीरत ‘हीर’ ने इन्हें “खामोश चीखें’ बता कर पुस्तक के शीर्षक को यथोचित सम्मान देने का सराहनीय प्रयास किया है.   

रविवार, 15 मार्च 2015

दीवारों के पीछे की औरत – एक पुस्तक समीक्षा. (भाग-१)

अदबी दुनिया में हरकीरत 'हीर' एक जाना-माना हस्ताक्षर है. हाल ही में उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. प्रथम पुस्तक का शीर्षक है “दीवारों के पीछे की औरत” जबकि दूसरी पुस्तक है “खामोश चीखें” जिसकी समीक्षा मैं लेख के दूसरे भाग में करूँगा. दोनों ही पुस्तकें ‘आगमन’ मेरठ रोड, हापुड द्वारा प्रकाशित की गई हैं. आप की सभी कविताएं मुक्त-छंद शैली में हैं. वर्षों से व्याप्त समाज की रुढिवादी परम्पराओं को तोडती हुई ये कवितायेँ एक नए समाज के निर्माण हेतु अपना मार्ग प्रशस्त करती हुई प्रतीत होती हैं. हमारे समाज में महिलाएं अक्सर परदे के पीछे रह कर अपने कार्यों का निर्वहन करती आई हैं. परिणाम-स्वरुप इन्हें कई प्रकार के कष्ट एवं विषमताओं का सामना करना पड़ा है. “परदे के पीछे की औरत” ऎसी सभी वर्जनाओं को तोड़ कर आज आगे बढ़ना चाहती है. उसकी यही छटपटाहट ही इस पुस्तक में विभिन्न कविताओं के रूप में मुखर हो कर सामने आई है.
..... अपनी मर्जी से
एक बेटी को जन्म नहीं दे पाती
दीवारों के पीछे की औरत
........... मैं लिख रही हूँ
दीवारों के पार की तेरी कहानी.
अन्यत्र नारी को ‘पत्थर’ मान कर लिखा है.....
“मैं पत्थर थी
अनछपे सफहों की
इक नज़्म उतरी
कानों में सरगोशियाँ की
कुछ शब्दों को मेरी हथेली पर रखा
और ले उडी मुझे
आसमां की ऊंचाइयों पे
जिंदगी से मिलवाने
.......... पत्थर से दो बूँद आंसू गिरे
और मैं जिन्दा हो गई!”
ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी यह पुस्तक एक बहु-पृष्ठीय कैनवास की तरह है जिसके प्रत्येक सफ्हे पर एक नई शैली का चित्र है. किसी चित्र में मुस्कराहट है, कहीं खामोशी है, कहीं उम्मीद है तो कहीं ना-उम्मीदी में ‘सत्य का अलाव” जल रहा है. शब्दों के ताने-बाने में निरंतरता है, गहराई है, जीवन की सच्चाई है, दर्द है और कहीं इस दर्द को “माँ.....” का साथ भी मिला है..... मानो माँ का बुना हुआ कोई शाल एक ममतामयी हाथ के रूप में कवयित्री के सर पर रखा हुआ है और वह उस शाल से अपना सारा दर्द भुला देने में सक्षम हो गई हो ......! शब्दों से कविताओं की मंज़रकशी देखते ही बनती है. “करवा चौथ” में आपने अपना तस्सवुर कुछ यूं बयान किया है कि -
.... चाँद तब भी था
चाँद आज भी है
तन्हाइयां तब भी थी
दूरियां अब भी हैं
पर दिलों में कुछ तो है
जो बांधे हुए है अब तक
आज के दिन भीतर कहीं
कुछ सालता है .....!
कहीं शब्द संजीव हो गए हैं तो कहीं मृत.... “चलो यूं करें
आज सारे शब्दों को इकठ्ठा कर
नज़्म के जिस्म पर
ओढ़ा देते हैं इक कफ़न
और लिख देते हैं
राम नाम सत्य है...!”
कभी स्त्री चंडी बन कर अपने हक़ के लिए लड़ती है तो कहीं उसकी चीखें दीवारों के पीछे दफ़न होती हुई प्रतीत होती हैं. ऐसे में “महिला दिवस” के नाम पर हो रहे ढकोसले भी खोखले जान पड़ते हैं. कविताओं में कहीं तो औरत पत्थर बन जाती है तो कहीं वह पुनर्जीवित हो कर एक ‘तब्शीर’ की ख्वाहिश करने लगती है! पुस्तक में सफहों के खाली कैनवास पर उकेरी गई इन तस्वीरों को देख कर कुछ लोग इन्हें “कला की शौक़ीन” भी समझ लेने की भूल कर सकते हैं. परन्तु वास्तविकता तो ये है कि सर्वत्र ऎसी खामोशी है जिसमें आज की स्त्री की आवाज़ और चीखें दब कर रह गई हैं. वह चहुँ ओर ‘झूठ’ और फरेब से ‘कशमकश’ करती हुई नज़र आती है. ‘घाव’.... गहरे हैं परन्तु अंत में एक ऐसे वक़्त की परिकल्पना की गई है जिसमें आस्था और प्रेम के पुनर्जीवित होने की उम्मीद है. यहाँ वक्त को हारा हुआ कहा गया है लेकिन मरा हुआ कदाचित नहीं. शायद यही इस पुस्तक का उद्देश्य भी था कि तमाम विषमताओं के बा[-वजूद कहीं कोई जीवन की किरण दिखाई देती है जो एक दिन हमारे समाज को नई राह पर ले जाएगी जहां औरत को दीवारों के पीछे रहने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा! -अश्विनी रॉय ‘सहर’

राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान करनाल (हरियाणा)

सोमवार, 2 मार्च 2015

नमन किसान को

देश की खातिर मरते-मिटते, देखो अमर जवान को 
खेतों में हरियाली लाए, शत-शत नमन किसान को !

जय जवान की बहादुरी को, शत्रु ने अब पहचाना है 
किसानों की मेहनत को, हमने अंतर्मन से जाना है
इनके खून-पसीने ने, चमकाया भारत के भाल को 
खेतों में हरियाली लाए, शत-शत नमन किसान को !

गर्मी, सर्दी, आंधी और, बरसात से नहीं डरते जो
बन प्रहरी इस देश के, अपनी रखवाली करते वो
उसकी भी जय बोलो, जो सम्मान दिलाए देश को
खेतों में हरियाली लाए, शत-शत नमन किसान को ! -अश्विनी रॉय ‘सहर’

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

मुदासिर अहमद की दो कविताएं

फूट डालो शासन करो

मानव – मानव को

लडाने की

जन – जीवन को

लहुलहान कर देने की

भाईचारे , प्रेम और शान्ति को

भंग करने की बात

किस धर्म ने

किस अवतार ने

कही है .

वास्तव में ये तो

‘फूट डालो शासन करो’

की नियति थी

जो चली थी  1947 से पहले

तब अंधापन हावी था

जन पर

इतने क्रूर और भयावह कि

बहु – बेटियों को

अपवित्र  किया गया ,

जान – माल का

हरण किया गया .

मुस्लिम देशों में

शिया और सुन्नी

भारत में बौद्ध – वैष्णव ,

शैव – बौद्ध ,आर्यसमाजी ,

हिन्दू – सिक्ख झगड़े

होते रहे .

असली सफलता उन्हें

तब मिली

जब एक नया षड्यंत्र

हिन्दू –मुस्लिम फसाद

और यह इसलिए

ताकि वे

शासक बने रहे ,

खूनी , साम्प्रदायिक संघर्ष

वीभत्स आग बढती गई .

आज़ादी के बाद भी ...

विभाजन संघर्ष

घर – घर ,नगर – नगर

अमानवीयता का

खूनी परचम लहराया .

तब धर्मों और धर्मों को

आपस में लड़ाया

और अब

धर्म को लड़ा रहे है

कर्म से , धन से

संपत्ति से

तब शिया और सुन्नी थे

अब हर घर का

अपना – अपना मसलक,

अपना – अपना खलीफ़ा,

अपना – अपना मसीहा

जो धन के मारे

धर्म को मार रहे है

स्वयं  मर रहे है

अपने भाइयों को

मार रहे है .

लोग मरते रहेंगे,

लूट , हत्या , बलात्कार

होते रहेंगे

जब तक अज्ञान है

अरे नादान !

ये तो वही

वही ‘फूट डालो  शासन करो’

का सिद्धांत है, जो

हम और तुम को

दूर कर रहा है .

कब्रिस्तान 

नहीं भूल सकता

तेरे उस फ़रेब को

जिसके कारण

अपने कंधो पे

लाशें  लिये फिरता हूँ

कब्रिस्तान  – दर – कब्रिस्तान .

अब इस बोझ से

थक गया हूँ ,

कर ऐसा फ़रेब कि

मेरी लाश भी

चल पड़े अपने मुकाम की ओर

ओरों के कंधों पर

कहीं ऐसा न हो कि
मेरी लाश पड़ी रहे

किसी सड़क पर ...

किसी कंधे की जरूरत की खातिर

या कब्रिस्तान  की जगह की खातिर .

ये आजादी है या अश्लीलता?

गत दिनों मुंबई में कुछ जाने माने फिल्मी सितारों द्वारा एक अत्यंत अश्लील एवं अशोभनीय कार्यक्रम “ए.आइ.बी.” शो का आयोजन किया गया. अगर आप कार्यक्रम शीर्षक को विस्तार में बताने के लिए कहें तो शायद यह भी संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि इसका शीर्षक भी अशोभनीय शब्द से ही बना है. कथित रूप से इस शो की चारों ओर कड़े शब्दों में भर्त्सना की गई. फिल्म ऐसोसिएशन के कहने पर इसके कलाकारों ने माफी भी मांग ली. यहाँ एक प्रश्न उठता है कि अगर इस कार्यक्रम के आयोजक सही राह पर हैं तो उन्हें माफी मांगने की आवश्यकता ही क्यों है? इस शो के विरोध में कई जगह एफ.आइ.आर. भी दर्ज हुई.
अब देश भर में इस तरह के कार्यक्रमों को आयोजन कर इन्हें कानूनी मान्यता देने पर लंबी बहस छिड़ गई है. कल एक टी.वी. शो के दौरान ऐसी ही एक बहस में भोजपुरी कलाकार एवं सांसद मनोज कुमार व मुंबई में सामना अखबार के संपादक ने ऐसे आयोजनों की निंदा की और इन्हें नैतिकता की सभी सीमाएं लांघने वाला का एक प्रयास बताया. इस शो का बचाव करते हुए एक अन्य प्रतिभागी महिला मधु किश्वर को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगा. उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के मर्द बात करते हुए बिना गाली के दो वाक्य भी नहीं बोल सकते. इनके अनुसार हमारी लोक परम्परा एवं जीवन शैली गालियों से ओत-प्रोत है. किश्वर जी ने लोक गीतों के उदहारण देते हुए कहा कि ये सब अश्लील हैं. उनके सवाल के अनुसार भारत में नैतिकता की सीमाएं कौन तय कर सकता है? क़ानून के विषय में उनका विचार था कि हमारे संविधान की व्याख्या विक्टोरिया साम्राज्य की देन है जो वर्तमान समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती.
मेरे विचार में गालियों एवं अश्लीलता की शुरुआत संभवतः फिल्मों से ही हुई होगी. कहा जाता है कि फ़िल्में समाज का आइना हैं. अगर ये सच है तो क्या समाज का नंगापन भी फिल्मों के जरिए बाहर लाया जाना उचित है? जो काम लोग अपने घर के हमाम में बैठ कर करते हैं, क्या उसे सड़कों पर करके दिखाना तर्क-संगत है? अगर दो मित्रों की भाषा गाली-गलौच वाली है तो क्या उसका रेडियो या टी.वी. रूपान्तर करके लोगों को परोसना उचित है? उल्लेखनीय है कि जिस कार्यक्रम की चर्चा हो रही है उसकी पाण्डुलिपि पहले ही सक्षम अधिकारी को भेज दी गई थी, परन्तु उसमें इस कथित अश्लीलता का कोई जिक्र नहीं था. यह भी संभव है कि अनुमति किसी और स्क्रिप्ट पर ली गई हो और कार्यक्रम इससे भिन्न दिखाया गया हो. आयोजन के बाद कथित रूप से इसे यू ट्यूब पर उपलोड कर दिया गया जिसे लाखों लोगों द्वारा देखा गया. आयोजकों का कहना है कि लगभग सभी लोगों ने इसे पसंद किया है तो अब इस पर अनावश्यक बवाल क्यों?
आयोजकों का यह भी कहना है कि अगर ये कार्यक्रम लोगों को अच्छा नहीं लगता तो इसे क्यों देखते हैं? इस दलील से कोई भी व्यक्ति सहमत नहीं हो सकता. क्या आप सार्वजनिक स्थल पर नंगेपन का प्रदर्शन करते हुए ये बात कह सकते हैं? कदाचित नहीं. फिर तो कोई भी व्यक्ति गंदी गालियाँ देते हुए अश्लील मुद्राएं बनाएगा. जब उसे कोई महिला देख लेगी तो वह पुलिस में शिकायत करेगी. क्या पुलिस यह दलील स्वीकार कर लेगी कि अगर उस व्यक्ति का व्यवहार अशोभनीय है तो उसकी ओर क्यों देखा जाए? जाहिर है इस तरह की बातें करके लोग मुद्दे को भटकाने की कोशिश करते हैं. पहले फिल्मों में नग्नता का प्रवेश हुआ, फिर हिंसा. आजकल भद्दे डायलोग, गाली-गलौच, आइटम सोंग और न जाने कैसा-कैसा कचरा घुस आया है. यदि ये कार्यक्रम जारी रहे तो एक दिन लोग पोर्न फ़िल्में भी दिखाने लगेंगे. अगर किसी ने विरोध किया तो कहेंगे कि आपको बुरा लगता है तो इसे मत देखिए!
इस कार्यक्रम के आयोजन से जो आय हुई, उसका एक भाग दान करने की बात भी कही जा रही है. क्या कोई व्यक्ति अश्लील स्टेज शो दिखा कर दान राशि एकत्र कर सकता है? शायद नहीं क्योंकि यह नैतिकता से सम्बंधित विषय है. इस शो में बोलीवुड के एक सितारे की बहन का भी कथित रूप से मजाक उडाया गया था जो एक गंभीर मामला है. यदि इस तरह के शो को जायज़ करार दिया जा सकता है तो हमें समाज में महिला उत्पीडन पर भी कोई चर्चा करने का अधिकार नहीं है. इस स्टेज शो के दौरान पुरुष कलाकारों द्वारा महिलाओं के विषय में कई भद्दी एवं अशोभनीय टिप्पणियाँ की गई थी. इन्हें सुन कर वहाँ दीपिका पादुकोण जैसी नायिका भी हँस रही थी जो समझ से परे है.
महिलाओं के विरुद्ध बढते हुए छेड़छाड़ के मामलों को रोकने के लिए हाल ही में एक सख्त क़ानून बनाया गया है. इसके अंतर्गत महिलाओं की ओर अभद्र इशारे करना, अश्लील हरकते करना और यहाँ तक कि घूरना भी अपराध की श्रेणी में आता है. समझ नहीं आता कि फिर भी मधु किश्वर जैसी सभ्रांत महिलाएं ऐसे आयोजनों को तर्क-संगत बता रही हैं. इस स्टेज शो को कोई भी पढ़ी-लिखी महिला अपने बेटे-बेटियों या बहुओं के साथ देखने में शर्म महसूस करेगी! क्या इसे स्वस्थ मनोरंजन की श्रेणी में डाला जा सकता है? कुछ लोगों ने इसकी तुलना कला से की है, इसे कार्टून बनाने की तरह की एक विधा करार दिया है. परन्तु यह बात किसी के गले नहीं उतरती.
आप सब जानते हैं कि नैतिकता की कोई सीमा नहीं होती परन्तु जो अनैतिक है वह सबको मालूम है. अगर यह सच है तो इस विषय में बहस करना ही अनावश्यक है. बात इतनी सी है कि जो गाली आपको अच्छी नहीं लगती, वह दूसरों को कैसे अच्छी लगेगी? जब इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा तो शायद कोई भी व्यक्ति ऐसे कार्यक्रमों को दिखाने या बढ़ावा देने की भूल नहीं करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है.


शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

एक लघु कथा

कुछ समय पहले की बात है, दिल्ली में चुनाव प्रचार चल रहा था. सभी दल अपनी-अपनी चुनावी संभावनाओं के प्रति चिंतित दिखाई दे रहे थे. भगवान को सभी पार्टियों पर  दया आ गई. उसने बारी-बारी सभी दलों के नेताओं से मिलने का फैसला किया. सबसे पहले वह कांग्रेस नेता से मिला और पूछा बोलो, तुम क्या चाहते हो? कांग्रेसी ने कहा कि हम तो बस इतना चाहते हैं कि किसी तरह इस बार हमारी लाज रख लों क्योंकि हमारे पास गंवाने के लिए तो कुछ भी नहीं है, लेकिन नतीजे ऐसे दो ताकि हम खुश हो सकें! बी.जे.पी. नेताओं ने कहा कि हे ईश्वर! हमारी इज्जत तो बाहरी मुख्यमंत्री प्रत्याशी के कारण अब जा ही चुकी है, कम से कम इतना कर दो कि आने वाले दिनों में पार्टी द्वारा हम से पूछा जाए कि दिल्ली में अब क्या करना चाहिए! अब आम आदमी पार्टी की बारी थी. उनहोंने ईश्वर से अपनी सरकार बनाने की दुआ मांगी. भगवान सबकी बात सुन कर चल दिए और सभी को दस फरवरी का इंतज़ार करने को कहा. लेकिन भगवान जी ने सोचा कि कुछ राष्ट्रीय दलों के नेताओं से भी उनकी इच्छा जान लेते हैं. सभी ने एक मत हो कर बी.जे.पी. के लिए हार मांगी. अपने घर जाते समय ईश्वर बहुत खुश थे क्योंकि वह आज पहली बार सब लोगों की माँग पूरी करने में समरथ अनुभव कर रहे थे. उन्होंने तुरंत कहा, तथास्तु, और देखते ही देखते सभी राजनैतिक दलों की इच्छा पूर्ण हो गई! - अश्विनी रॉय 'सहर'

दिल्ली में क्या हुआ?

दिल्ली विधान सभा के परिणामों को शालीनता से स्वीकार करना सभी के लिए आवश्यक है. हारने वालों के लिए भी और प्रचंड बहुमत से जीतने वालों के लिए भी. इन परिणामों से यह स्पष्ट हो गया है कि आप अपने प्रतिद्वंदी को कमतर न आंकें. कांग्रेस ने पराजयों का सिलसिला जारी रखा है. उन्होंने अपनी पुरानी हारों से कोई सबक नहीं लिया. लगता है कि ये लोग केवल इस बात से ही संतुष्ट हैं कि बी.जे.पी. हार गई. कमोबेश सभी टी.वी. चैनलों ने बी.जे.पी. की हार के अपने-अपने कारण गिनाए हैं.
मेरे विचार से बी.जे.पी. को इस हार से कतई विचलित होने की आवश्यकता नहीं है. यदि देश के अन्य राजनैतिक दल जैसे तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, यूनाइटेड जनता दल, समाजवादी दल आदि बी.जे.पी. की हार पर् खुशियाँ मना रहे हैं तो ये उनका छिछोरापन है. लगता है इन सबने भी अपनी पुरानी भूलों से कोई सबक नहीं लिया. बी,जे.पी. की वर्तमान हार केवल दिल्ली तक ही सीमित रहेगी, ऐसा मुझे विश्वास है क्योंकि ये अन्य राज्यों में अपनी गलतियों को दोहराने की भूल कतई नहीं करेगी. जहां तक अन्य दलों की बात है, उनका हाल भी कांग्रेस की तरह ही होगा, इसकी पूर्ण संभावना है.
दिल्ली में जो आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला है वह कोई उनकी किसी महान उपलब्धि के लिए नहीं बल्कि उनके बड़े-बड़े वायदों को देख कर आम आदमी ने उन्हें जिताया है. बी.जे.पी. ने अपना प्रचार देर से शुरू किया तथा किरण बेदी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर दिया. यह परिवर्तन स्थानीय नेताओं को रास नहीं आया तथा उन्होंने जमीनी स्तर पर् चुनाव प्रचार में कोई तवज्जो नहीं दी. किरण बेदी ने अपने रोड शो में अनुशासन व सख्ती का पाठ पढ़ाना शुरू किया तो कुछ लोग इससे बिदक गए. रही कसर आम आदमी पार्टी के दुष्प्रचार ने पूरी कर दी कि जीतने के बाद किरण बेदी सभी अवैध झोंपड़पट्टटे, फुटपाथ व रेहडी वालों को हटाएगी.
अपनी चुनावी असफलता के बाद किरण बेदी ने इसे अपनी हार बताने की बजाय पार्टी की हार कहा है जो उचित नहीं है. पार्टी को चाहिए कि वह भविष्य में अपने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेकर ही कोई रणनीति तैयार करे अन्यथा इस प्रकार के नुक्सान झेलने पड़ सकते हैं. ये परिणाम न तो मोदी सरकार की नीतियों पर् जनमत है और न ही केजरीवाल के सुशासन पर जनता की मोहर है. ये तो विशुद्ध स्थानीय प्रतिक्रिया है जिसकी परिणिती पार्टी की हार के रूप में सामने आई. अब पार्टी को अब अपना कैडर संभालने की आवश्यकता है ताकि अगले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया जा सके.
इस पार्टी में शत्रु नाम से पहचाने जाने वाले शत्रुओं की भी कोई कमी नहीं है. दिल्ली से अधिक अनुशासन की आवश्यकता तो बी.जे.पी. कार्यकर्ताओं को है. कई नेताओं ने जाति एवं धर्म के सम्बन्ध में अनावश्यक बातें कही जो निंदनीय है. प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे ऐसे सभी लोगों से सख्ती के साथ निपटें क्योंकि इनके कारण पूरी पार्टी की छवि खराब हो रही है. वर्तमान चुनावों में जिन नेताओं ने आवश्यकता से अधिक ऊंचे स्वर में पार्टी का विरोध किया उन्हें पार्टी से निकालने पर् भी विचार होना चाहिए. किरण बेदी घटनाक्रम को शायद एक बुरे सपने की तरह भुला देना ही सबके हित में होगा.

कुछ लोगों का कहना है कि बी.जे.पी. का प्रचार नकारात्मक था जो कुछ हद तक सही भी है. लेकिन इस बार हर पार्टी का चुनाव नकारात्मक रहा है. आम आदमी पार्टी ने कोई खास सकारात्मकता दिखाई हो, ऎसी भी बात नहीं है. आम आदमी पार्टी का यह आरोप कि बी.जे.पी. ने अपने सभी नेताओं को प्रचार में लगाया, सही नहीं है. क्या उनके सब नेता प्रचार नहीं कर रहे थे? इनके नेता तो हरियाणा और पंजाब से दिल्ली में प्रचार करने गए थे. मुझे लगता है कि हारने वालों को बहुत सी बातें कही जाती हैं. यह जीतने वालों की फितरत है कि वे ऐसा कहें. परन्तु हारने वाले अन्य दल बी.जे.पी. की हार पर इतने उत्साहित क्यों हैं? ये बात समझ से परे है. लोकतंत्र में हर पार्टी को कोई न कोई सबक सीखने को मिलता है. ये भी एक सबक है जिसे शालीनता से पढ़ना चाहिए.