My expression in words and photography

सोमवार, 19 जनवरी 2015

एम.एस.जी. पर बवाल क्यों?

"सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढ़ाया
मुझको ज़हर का जाम पिलाया
फिर भी उनको चैन ना आया
सच्ची बात कही थी मैंने!"
जी हाँ, ऐसा ही कुछ एम.एस.जी. फिल्म में हुआ है. सच्ची बात किसे कड़वी नहीं लगती? फिर चाहे वह सेंसर बोर्ड ही क्यों न हो! फिल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा ने सरकारी दखलंदाजी का कारण बताते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उल्लेखनीय है कि एम.एस.जी. फिल्म को सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया था. ये वही बोर्ड है जिसे ‘पी.के.’ फिल्म में तो कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा परन्तु ‘एम.एस.जी.’ को सेंसर कर दिया. ये फिल्म डेरा प्रमुख राम रहीम सिंह इन्सां द्वारा निर्देशित है जिसका विरोध देश के सिख संगठन एवं कई राजनेता कर रहे हैं. परन्तु अब तक किसी भी दल ने इस विरोध की कोई खास वजह नहीं बताई.
ये हैरानी की बात है कि उस ‘पी.के.’ फिल्म को पास करने में सेंसर ने कोई देर नहीं लगाईं जिसमें हिन्दू धर्म को ठेस पहुंचाने वाले कई दृश्य डाले गए हैं. एक दृश्य में फिल्म का नायक हिन्दू देवताओं के चित्रों पर ‘लापता’ लिख कर इधर-उधर घूमता दिखाई देता है. वह मंदिर जा कर गल्ले से रूपए निकाल लेता है. फिल्म का नायक एक महिला को कंडोम का पेकेट भी दिखाता है जो अत्यंत अपमानजनक दृश्य है. ये वही नायक हैं जो टी.वी. में अक्सर महिलाओं के उत्पीडन पर विरोध प्रदर्शित करता है परन्तु अपनी फिल्म में उनका अपमान करने से बाज़ नहीं आता.
इस फिल्म का नायक अपने नंगेपन की सफाई भी बड़ी बेशर्मी से उचित ठहराते हुए कहता है कि जब कौवे वस्त्र नहीं पहनते तो मनुष्यों के लिए यह क्यों आवश्यक है? फिल्म में कारों के अंदर सेक्स करते हुए दिखाया है जिसपर सेंसर को कोई एतराज़ नहीं हुआ. ये वही सेंसर बोर्ड है जो सिगरेट पीने के दृश्य में वैधानिक चेतावनी छापने की बात करता है परन्तु इस फिल्म में नायक के नंगे होने, पूजा स्थल पर चोरी करने, नारी को अपमानित करने, देवताओं को बे-इज्ज़त करने तथा सेक्स करते हुए लोगों के वस्त्र चुराने वाले दृश्यों पर न तो कोई आपत्ति करता है और न ही चेतावनी छापने की सलाह देता है.

इन लोगों को एम.एस.जी. जैसी साधारण फिल्म पर आपत्ति क्यों है, ये समझ से परे है. ऐसे भेदभावपूर्ण सोच रखने वाले लोगों को सेंसर बोर्ड में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए. अगर इन्होंने इस्तीफा दे दिया है तो अच्छा ही है. इनके स्थान पर ईमानदार अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों की नियुक्ति होनी चाहिए जो पूर्ण पारदर्शिता से अपना काम करे.

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

"पी.के." की समीक्षा

पी.के. फिल्म देखने से मालूम हुआ कि इसमें बहुत से तथाकथित ‘रोंग’ नम्बरों का उल्लेख है परन्तु यह स्वयं ही एक ‘रोंग’ नंबर है. फिल्म में बहुत से ऊल-जलूल सवाल उठाए गए हैं जबकि इसकी कहानी स्वयं ही सवालों के घेरे में आती हुई जान पड़ती है. फिल्म में ईश्वर के अस्तित्व एवं धर्म गुरुओं पर सवाल उठाया गया है. उल्लेखनीय है कि जब इस फिल्म का नायक शराब की बोतलें उठा कर मस्जिद की तरफ जाता है तो उसे बाहर से ही खदेड़ दिया जाता है जबकि वह मंदिर में बे-धड़क जाकर गल्ले से रूपए निकाल लेता है. वह एक हिन्दू धर्म गुरु से भी मनमाने प्रश्न करता हुआ दिखाया गया है. यह अत्यंत हैरानी की बात है कि नायक ने पूरी फिल्म में अपने धर्म गुरु या पैगम्बर के विषय में कोई प्रश्न नहीं उठाया और न ही कोई नुक्ताचीनी की. इससे यह स्पष्ट होता है कि फिल्म के नायक की सोच कितनी दोगली है?
 इस फिल्म का नायक किसी का हाथ पकड़ कर यह तो जान लेता है कि कोई अपनी भाषा कैसे बोलता है तथा उसके मन में क्या है परन्तु यह नहीं जान सकता कि वह किसकी अराधना करता है? उसका धर्म क्या है? वह बार-बार पूछता है कि किसी व्यक्ति का धर्म बताने वाला ठप्पा शरीर पर कहाँ लगा है? यह सब बड़ा हास्यास्पद लगता है. फिल्म के नायक द्वारा देवी-देवताओं की तस्वीरें उठा कर उन्हें लापता बताना भी उसकी ओछी सोच का परिचायक है. इस धरती पर सब लोगों के कपडे पहनने पर सवाल उठाए गए हैं. नायक पूछता है कि जब कौवा कपडे नहीं पहनता तो हमारे कपडे न पहनने पर एतराज़ क्यों हो? फिल्मों में सब कुछ वास्तविकता से परे है.
 इस फिल्म के कुछ दृश्यों को बड़े फूहड़ ढंग से दिखाया गया है. कुछ दृश्यों में नायक द्वारा महिलाओं के हाथों को पकड़ना बहुत ही बचकाना लगता है. कुछ दिन पहले इस ‘नायक’ ने स्वयं एक टी.वी. शो में स्वीकार किया था कि अगर हम फिल्मों में महिलाओं का सम्मान नहीं करेंगे तो लोग अपने सार्वजनिक जीवन में भी ऐसा ही करेंगे. स्पष्टतः लोग फिल्मी नायकों को अपने रोल मॉडल के रूप में देखते हैं. पाकिस्तान के पत्रकार जिन्हें निष्पक्ष होना चाहिए, वे भी यह स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनका देश भारत में बम-विस्फोट करवाने में किस तरह दिलचस्पी लेता रहता है. कहानी में एक पाकिस्तानी व्यक्ति ‘सरफराज़’ फिल्म की हिन्दुस्तानी नायिका से प्रेम करता हुआ दिखाया गया है. “बिन पूछे मेरा नाम पता, चल दो न साथ मेरे....” गीत गाते हुए सरफराज़ ऐसे लगता है मानो पाकिस्तान भारत को ही सही रास्ते पर चलने की नसीहत दे रहा हो. यह अपने आपमें संसार का आठवां आश्चर्य ही प्रतीत होता है.
 चर्चित है कि यह फिल्म अब तक बहुत ही सफल रही है. भारत के सभी सिनेमा घरों में आप चाहे ‘पोर्न’ फ़िल्में लगा कर देख लें, अब तक के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे. तो क्या अधिक लोगों द्वारा किसी फिल्म को देखना ही इसकी सफलता का परिचायक है? देश में कुछ स्थानों पर इस फिल्म के विरोध में स्वर उठ रहे हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से तो इनसे सहमत नहीं हूँ परन्तु उचित-अनुचित में भेद करने वाले फिल्म नायक से यह प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि वह अपनी भडांस एक विशेष धर्म के प्रति ही क्यों निकालना चाहता है?
 फिल्म के कई दृश्य ऐसे भी हैं जिन्हें देख कर मन में करुणा के भाव तो उत्पन्न होते हैं परन्तु कोई हँसी नहीं आती. फिल्म में जो भी गीत-संगीत है वह अच्छा है, तकनीकी दृष्टि से तो सब ठीक-ठाक है लेकिन कहानी बे-सिरपैर व ऊल-जलूल है. फिल्म के एक दृश्य में टिकटों की ब्लैक करने वाले व्यक्ति को घटिया सोच वाला तथा एक बुजुर्ग व्यक्ति को ऐसे धोखेबाज के रोल में दिखाया है जो स्वयं ही ब्लैक में सिनेमा टिकट खरीद लेता है. कहते हैं कि फ़िल्में समाज का आइना होती हैं परन्तु इस फिल्म को देख कर लगता है कि सब कुछ सही नहीं है. अगर आमिर खान फिल्मों को केवल मनोरंजन ही मानते हैं तो टी.वी. पर आकर भारतीय नायिकाओं को ‘फूहड़’ अभिनय करने से क्यों रोकते हैं? अगर फ़िल्में देख कर हमारे नवयुवक नहीं बिगड़ते तो आप विभिन्न उत्पादों के प्रचार हेतु स्वयं को क्यों लगाते हैं? इससे तो यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि लोग आपके द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करने की कोशिश करते हैं चाहे वह सब गलत हो या सही!
 यह एक विडम्बना ही है कि जो अच्छा है लोग उस पर कोई ध्यान नहीं देते परन्तु जो बुरा है उससे खूब कमाई करते हैं. ईश्वर के होने या न होने से तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु जो लोग ईश्वर के नाम पर अच्छे काम करते हैं वह अवश्य ही अनुकरणीय है. कई लोग राम, अल्लाह, जीसस या अपने गुरु के नाम पर अस्पताल, स्कूल, कालेज व धर्मशालाएं बनवाते हैं जो समाज के हित में है. वहीं कुछ लोग धर्म के नाम पर लोगों को बांटते हैं जो बुरी बात है. देश में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इन दोनों तरह के लोगों पर फ़िल्में बना कर रुपया कमाते हैं जिनके बारे में आप स्वयं ही फैसला कर सकते हैं कि ये सब अच्छा है या बुरा!

कैसे खुदगर्ज़ हो?

मेरा किया तो फ़र्ज़ है
तुम्हारा किया एहसान
मुझे इस पर हर्ज है !
दोस्ती मेरी इबादत है
तुम्हारे लिए सियासत है
ये कैसी लियाकत है?
वायदे खूब करते हो
लेकिन वफ़ा नहीं करते
खुद को बा-वफ़ा कहते हो !
हमें अपने हाल पे छोड़ दो
हमारे बीच न कोई होड़ हो

गर दीवार है उसे तोड़ दो! -अश्विनी रॉय 'सहर'

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

धर्मांतरण पर कैसा बवाल?

हमारे देश में सभी नागरिकों को छूट है कि वे किसी भी धर्म का पालन करें. फिर भी यदा-कडा इस मुद्दे पर सियासत गरमाती रहती है कि देश में कुछ संगठन जबरन धर्म परिवर्तन करवाने में लगे हैं. किसी ने ठीक ही कहा है कि-
“उम्र बीती बुतपोशी में, अब क्या ख़ाक मुसलमान होंगे!” अर्थात सारी जिंदगी तो मूर्ति-पूजा करते रहे, अब आप मुसलमान कैसे बन सकते हैं? कुछ लोग अदूरदर्शिता अथवा आर्थिक प्रलोभन के कारण भी धर्म परिवर्तन हेतु तत्पर रहते हैं. ये लोग अपने अल्पकालिक हितों के लालच में दूरगामी परिणामों की अनदेखी कर देते हैं. कहा जाता है कि “पहला रंग ही रंग है, दूजा रंग बदरंग!” अगर आप भगवां रंग के वस्त्र पर हरा रंग चढाने की कोशिश करेंगे तो वह न तो भगवां रहेगा और न ही हरा.
हमारे देश में अब तक हुए असंख्य धर्म परिवर्तनों से यह साफ़ हो गया है कि धर्म कोई वस्त्र नहीं हैं, जो जब जी चाहा बदल लें. ये तो एक आस्था का विषय है. जो व्यक्ति अपने धर्म में आस्था नहीं रखता, उसे दूसरों के धर्म में कैसे आस्था हो सकती है? राजस्थान में बरसों पहले कुछ हिन्दू लोग मुसलमां हो गए थे. आज वे सब अलग-थलग ही नज़र आते हैं क्योंकि वे अब न तो हिन्दू ही रहे और न ही मुसलमान. हिन्दू परिवार इनके साथ कोई वैवाहिक सम्बन्ध स्वीकार नहीं करते और न ही ये अपने बच्चों की शादियाँ मुसलामानों में कर पाते हैं. परिणामस्वरुप इन लोगों की एक अलग ही श्रेणी बन गई है जिन्हें कायमखानी मुसलमान कहा जाता है.
कुछ लोगों ने धर्म परिवर्तन इसलिए भी किया क्योंकि उनके धर्म में सामाजिक भेदभाव अधिक होता है. हिंदुओं में तथाकथित ऊँची व नीची जातियों में मतभेदों के कारण लोग ईसाई व मुसलमान बनने लगे. जो लोग ईसाई बने उन्हें ईसाइयों ने अपनी मुख्यधारा में शामिल नहीं किया. ये लोग स्वयं को उपेक्षित अनुभव करते रहे तथा जब दलित एवं पिछड़े हिंदुओं को आरक्षण दिया जाने लगा तो ये ‘परिवर्तित’ ईसाई और मुसलमान भी आरक्षण की माँग करने लगे. अब प्रश्न ये उठता है कि यदि ईसाइयों और मुसलामानों में ऊंच-नीच का भेद नहीं होता तो इन्हें आरक्षण क्यों दिया जाए? अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद भी उपेक्षित है तो उसने अपना धर्म ही क्यों छोड़ा? उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव वस्तुतः लोभी प्रवृत्ति का प्राणी है. उसे जहां भी लाभ दिखाई देता है, वह वहाँ चला जाता है.

हमारे देश के राजनीतिज्ञ संसद में इस विषय पर चर्चा करते हुए नहीं थकते परन्तु समस्या के मूल में कोई झांकने को भी तैयार नहीं है. जिसे देखो वह वोटों की राजनीति करता हुआ दिखाई देता है. “कौन व्यक्ति किस धर्म को अपनाए” इसका निर्धारण हमारे राजनेता नहीं कर सकते. जिस देश में लोगों को भरपेट खाने को न मिलता हो, वहाँ अपने धर्म के प्रति कौन वफादार होगा? क्या धर्म व्यक्ति का पेट भर सकता है? एक भिखारी के लिए तो पेट भरना अधिक महत्वपूर्ण है न कि वह मंदिर या मस्जिद जहां से उसे कुछ खाने को मिल सकता है.   

‘अपराधमुक्त’ भारत की संकल्पना

देश में अपराध का हर रोज बढ़ता हुआ ग्राफ नई ऊंचाइयां छूने लगा है. दिल्ली में बलात्कार की एक और घटना ने साबित कर दिया है कि देश में महिलाएं अब भी सुरक्षित नहीं है. हर नई घटना के बाद मीडिया का बेसुरा प्रलाप, राजनीतिज्ञों द्वारा घटना की भर्त्सना, पुलिस द्वारा तेज़ी से जांच करने के आश्वासन और सरकार की नित्य होने वाली छीछालेदर देखकर सभी लोग परेशाँ हो रहे हैं. आखिर इस तरह की घटनाओं पर लगाम कैसे कसी जाए? अगर देखा जाए तो इन घटनाओं की पुनरावृत्ति के लिए हमारा समूचा तंत्र एवं समाज दोनों ही जिम्मेवार हैं. इसकी शुरुआत घर से ही हो जाती है. कोई भी व्यक्ति अपराधी क्यों बनता है? या तो उसके घर की पृष्ठ-भूमि अपराधिक होती है या फिर उसके परिवार में कोई न कोई व्यक्ति पहले से अपराधी होता है. प्रदूषित वातावरण में पलने वाले बच्चे घर की अपराधिक पृष्ठ-भूमि से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते. हमारे परिवार एवं समाज दोनों की यह जिम्मेवारी है कि अपराधों को संरक्षण देने की बजाय हम इन्हें उचित मंच तक ले जाएँ ताकि इन्हें जड़ से ही पनपने का अवसर न मिले.
      हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं संस्कार अपने परिवार के बाद स्कूल से मिलते हैं. यदि स्कूलों में अध्यापक अपराधिक पृष्ठभूमि के होंगे तो आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि देश का क्या होगा? कुछ लोग स्कूलों में अध्यापक का पद प्राप्त करने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने से लेकर तरह-तरह की हेराफेरियाँ करते हैं. ये सब देश में फ़ैल रहे भ्रष्टाचार से ही होता है. अध्यापकों की चरित्र जांच या ‘वेरिफिकेशन’ अक्सर पुलिस द्वारा रिश्वत लेकर की जाती है. जब लोग रिश्वत देकर अपने काम करवाने लगेंगे तो गुणवत्ता से तो समझौता करना ही पडेगा. इसी तरह पुलिस में होने वाली भर्ती भी भ्रष्टाचार के आशीर्वाद से होती है. हमारे समाज की जड़ें खोखली करने में भ्रष्टाचार की भूमिका सर्वाधिक है. हैरानी की बात है कि जब ड्राईविंग लाइसेन्स बनवाना हो तो कुशल नेत्र दृष्टि के साथ-साथ मनुष्य का स्वस्थ होना भी जरूरी है. जब कोई व्यक्ति अपराधिक छवि का हो, तो उसे किसी भी हालत में  ड्राईविंग लाइसेन्स नहीं मिलना चाहिए क्योंकि वह इसका दुरुपयोग कर सकता है. परन्तु वास्तविकता एक दम अलग है. आजकल लोग रिश्वत देते हैं तथा ड्राईविंग लाइसेन्स अपने आप बन कर आपके घर चला आता है. जब अपराधों को रोकने के लिए बनी पुलिस ही सभी अपराधों को न्यौता देने लगे तो आप कहाँ जाएंगे?
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हम आज़ाद तो हो गए किन्तु आजादी के इतने साल बाद भी हमारे देश में क़ानून का शासन नहीं है. लोग अपराध करके बे-खौफ घूमते रहते हैं. हम केवल सरकार को बुरा-भला कह कर अपना पल्ला झाड लेते हैं. परिणाम फिर वही.... जस का तस! हाल ही में घटी ‘रेप’ की घटना के अपराधी को पकड़ने से मालूम हुआ है कि उस व्यक्ति पर पहले से ही बलात्कार के आरोप में मुकद्दमा चल रहा है जिसमें वह अभी बरी नहीं हुआ था. यह उतना ही आश्चर्यजनक है कि इस प्रकार के अपराध करने वाला व्यक्ति ड्राईविंग लाइसेन्स कैसे बनवाने में सफल हो गया? एक कंपनी को ‘कैब-सर्विस’ के व्यवसाय में कोताही बरतने का दोष दिया जा सकता है परन्तु क्या यह हमारे तंत्र का दोष नहीं है कि अनधिकृत व्यक्ति इस देश में किस प्रकार कारें व टेक्सियाँ चला सकते हैं? कुछ लोगों का मानना है कि महिला ड्राइवरों को टैक्सी के ड्राईविंग लाइसेन्स दिए जाएँ तो अच्छा रहेगा. परन्तु इस बात की क्या गारंटी है कि टैक्सियों में सफर करने वाले पुरुष या महिलाएं कोई अपराध नहीं करेंगे?
हमें अपराध के मामलों को सख्ती से निपटने की आवश्यकता है. आजकल अपराधियों को या तो पकड़ा ही नहीं जाता, या पकड़ने में बहुत लंबा समय लगता है जिससे घटना के सभी साक्ष्य कमज़ोर पड़ जाते हैं. कई बार पुलिस घटना की एफ.आई.आर. दर्ज करने में आना-कानी करती है. हमारा क़ानून बहुत कमज़ोर है जो तरह-तरह की बैसाखियों के सहारे चलता है. ये बैसाखियाँ भ्रष्टाचार के रस से सराबोर हैं. कभी वकीलों की फीस, कभी राजनैतिक हस्तक्षेप, तो कभी गवाहों की बेरुखी अपराधियों को सजा दिलाने में संकोच करती है. न्याय मिलने में देरी होने के कारण लोगों का हमारी न्याय व्यवस्था से ही विश्वास उठ गया है.

आज हमें अपने भीतर झांकना होगा. हम सब मिलकर इस तरह के अपराधों को अवश्य ही रोक सकते हैं. अपराधी हमारे परिवार, समाज, शहर तथा राज्यों में ही छुपे हुए हैं. हमें इनकी पहचान करके क़ानून के हवाले करना होगा. क़ानून से कोई बचने न पाए, इस पर सारे समाज की नज़र होनी चाहिए. हमारा कर्तव्य है कि हम सभी अपराधियों के प्रति अतिसंवेदनशील बनें तथा इन्हें पकडवाने में अपना अधिकाधिक योगदान दें. ‘अपराधमुक्त’ भारत की संकल्पना शायद हम सबके सहयोग से ही सम्भव हो सकती है. 

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

एल.पी.जी.सब्सिडी पर रोक

आजकल सरकार अमीरों को मिलने वाली एल.पी.जी. सिलेंडर पर सब्सिडी रोकने पर विचार कर रही है. समझ नहीं आता कि इस तरह से सरकार कितने रुपयों में बचत कर लेगी? देश में अमीरों की संख्या कितनी है? अगर मुट्ठी-भर अमीरों ने साल भर में एक गैस सिलेंडर अतिरिक्त उपयोग कर भी लिया तो कौन-सा पहाड़ टूट जाएगा? जो अमीर व्यक्ति देश को लाखों रूपए कर के रूप में दे रहे हैं, उन्हें एल.पी.जी. की मामूली सब्सिडी अगर चली भी गई तो क्या हर्ज है? सरकार अपने संसाधनों की चोरी पर अंकुश क्यों नहीं लगाती?
जो अपना आयकर ईमानदारी से देता है उस पर सभी प्रतिबन्ध लागू हो सकते हैं. जो व्यक्ति कोई कर नहीं देते वे फर्जी ढंग से सभी प्रकार के फायदे सरकार से लेते रहते हैं. अगर देखा जाए तो हमारे जनप्रतिनिधि ही सर्वाधिक सिलेंडरों की खपत कर रहे हैं. क्या सरकार ने उन पर कोई अंकुश लगाने की बात सोची है? ये लोग बिजली और टेलीफोन का भी सबसे अधिक उपयोग करते हैं तथा अपने बिल भी समय पर नहीं चुकाते. सरकार इन लोगों पर तो कोई कार्यवाही नहीं करती!

इस तरह के नकारात्मक क़दमों से देश में भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता है. यदि किसी अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारी से सरकार सब्सिडी हटाएगी तो वह एल.पी.जी. का कनेक्शन कम आय वाले परिवार के किसी और व्यक्ति के नाम से भी तो ले सकता है. अगर ऐसा हुआ तो फिर सरकार क्या कर लेगी? घरेलू एल.पी.जी. सिलेंडरों के व्यावसायिक उपयोग को तो वह रोक नहीं पाई अब इस तरह की कवायद करके भी क्या हासिल हो जाएगा? अगर सब्सिडी को नियंत्रित करना ही है तो घरेलू गैस के उपयोग को वाहनों में प्रतिबंधित करना चाहिए. 

स्कूलों में संस्कृत या जर्मन?

आजकल केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में पढाने पर एक नया विवाद छिड़ गया है. अभी कुछ समय पहले तक इसके स्थान पर जर्मन भाषा पढ़ाई जाती थी. यह अत्यंत आश्चर्यजनक बात है कि हमारे देश में इतनी अधिक संख्या में समृद्ध भाषाएँ होते हुए भी हम विदेशी भाषाओं के प्रति अपने मोह को दूर नहीं कर पा रहे हैं.
समूचे भारत में तीन भाषाएँ पढ़ने व सीखने का चलन पहले से ही है. इसके अनुसार स्कूली बच्चों को एक क्षेत्रीय भाषा के साथ अंग्रेजी तथा हिन्दी का ज्ञान दिया जाता है. एक अंग्रेजी अखबार में छपे सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय बच्चे संस्कृत के स्थान पर विदेशी भाषा पढ़ने को ही अहमियत देते हैं. अखबार का कहना है कि ये बच्चों को एक अच्छे रोज़गार की ओर भी अग्रसर करता है. हम इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हमारी सोच कितनी छोटी है? जर्मन या फ्रेंच भाषा सीख कर कितने लोग रोज़गार पा सकते हैं? मुश्किल से कुछ सौ या हज़ार व्यक्ति ही इन भाषाओं को सीख कर नौकरी पा सकते हैं. अगर देखा जाए तो हिन्दी सीखे हुए लाखों और करोड़ों लोगों को आज नौकरी के कहीं बेहतर अवसर मिल रहे हैं.
इन अंग्रेजियत तथा विदेशी भाषाओं के समर्थकों से कोई आज ये तो पूछे कि जर्मनी व फ्रांस के कितने लोग हिन्दी सीखना चाहते हैं? शायद कोई भी नहीं. कारण स्पष्ट है, इन्हें अपनी जबान से बढ़ कर कुछ भी अच्छा नहीं लगता. फ्रांस में तो आप अंग्रेजी में बात नहीं कर सकते. वहाँ सभी साइन-बोर्ड उनकी अपनी फ्रेंच भाषा में ही पढ़ने को मिलते हैं. हमारे देश के लोगों को अंग्रेज़ न जाने कौन सी घुट्टी पिला गए हैं, जो ये अब भी अंग्रेजी की भक्ति और महिमा-मंडन में लगे हुए हैं!
तीसरी भाषा संस्कृत ही सही,  कम से कम आप अपने बच्चों को भारतीय भाषा ही तो सिखा रहे हैं! इसमें बुरा क्या है? फ्रेंच या जर्मन सिखाने से तो अच्छा है आप अपने ही देश की किसी भाषा को तीसरी भाषा का स्थान दें! क्या हमारे देश में भाषाओं की कमी है? विदेशी भाषा तो आप स्नातक अथवा स्नातकोत्तर करने के बाद भी सीख सकते हैं. हम विदेशी भाषा सीखने पर प्रतिबन्ध लगाने की बात नहीं कर रहे हैं. मेरे विचार में स्वदेश रहते हुए किसी विदेशी भाषा को तीसरी भाषा का सम्मान देना निंदनीय है.

कोई भी व्यक्ति अगर चाहे तो संस्कृत भाषा में अपना केरियर बना सकता है. आजकल देश में संस्कृत पढाने वाले अध्यापकों की काफी माँग है. हमारे प्राचीन धर्म-ग्रन्थ संस्कृत में हैं, जिनकी टीका करके लोग आज अपना नाम कमा रहे हैं. जर्मनी में तो वेदों के संस्कृत ज्ञान पर लगातार अनुसंधान होता रहा है. प्राचीन आयुर्वेद के हज़ारों नुस्खे संस्कृत में लिखे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति संस्कृत ज्ञान के बिना नहीं समझ सकता. आधुनिक भाषाओं का अपना महत्व है, परन्तु संस्कृत जैसी प्राचीन एवं समृद्ध भाषा को कमतर बता कर नहीं आंका जा सकता. हरियाणा के सभी स्कूलों में यह भाषा नियमित रूप से पढ़ाई जा रही है. विश्वविद्यालयों में संस्कृत का अलग विभाग होता है. विदेशों के विश्वविद्यालयों में तो संस्कृत की एक अलग से पीठ भी स्थापित की गई है.

बुधवार, 26 नवंबर 2014

हमारी साख में गिरावट क्यों?

लोग अक्सर पूछते हैं कि विदेशों तथा भारतीय लोकतंत्र व्यवस्था में मूलभूत अंतर क्या है? किसी जमाने में हमारी व्यवस्था सभी पश्चिमी देशों से बेहतर होती थी परन्तु अब हमने अपनी सारी ‘साख’ ही गंवा दी है. उस समय हमारे देश में आर्थिक लेन-देन के समय किसी लिखत-पढ़त का कोई चलन नहीं था परन्तु आजकल लोग लिखे हुए को भी आसानी से नकारने लगे हैं. लोग बैंकों से ऋण लेकर चुकाने से मना कर देते हैं. हमारे नेता वोट मांगने के लिए जो भी वायदा करते हैं, उसे पूरा नहीं करते. सम्भव है कुछ नेताओं की साख अच्छी हो, परन्तु अधिकतर नेताओं द्वारा अपनी ‘साख’ गंवा देने से लोग इन पर सहज विश्वास नहीं करते.
‘साख’ की आवश्यकता केवल नेता और जनता तक ही सीमित नहीं है. अगर मां-बाप भी अपने बच्चों से किए गए वायदे पूरे न कर सकें तो इन्हें कोई अधिकार नहीं है कि वे उनको झूठे सपने दिखाएँ. कई बार इस तरह की प्रवृति से बच्चे बिगड़ जाते हैं तथा उन्हें दोबारा पटरी पर लाना वास्तव में बड़ा कठिन होता है. आप रेल की टिकट खरीद कर नियत समय पर स्टेशन तो पहुँच जाते हैं लेकिन वहाँ जा कर मालूम होता है कि गाड़ी के आने का समय बदल गया है. परिणामस्वरूप आपको भारी परेशानी झेलनी पड़ती है. भारतवर्ष में बसों, रेलों, जहाज़ों का आवागमन प्रायः सही समय पर नहीं होता. इस दुर्व्यवस्था के चलते हमारे यहाँ यातायात प्रणाली को अत्यंत संदेह की दृष्टि से देखा जाता है. लोग अपने गंतव्य स्थल तक पहुँचने के लिए समय से काफी पहले ही घर से निकल जाते हैं. जाहिर है यह सब यातायात व्यवस्था के ‘साख’ खो देने से ही हुआ है.
अगर हम पूंजी बाज़ार की बात करें तो लोग यहाँ अपना रुपया ऐसी कंपनियों में निवेश करते हैं जिनका पुराना रिकोर्ड अच्छा हो. कुछ कंपनियां प्राइमरी मार्केट से रूपए की उगाही तो कर लेती हैं परन्तु शीघ्र ही ऐसे गायब हो जाती हैं जैसे गधे के सिर से सींग! ऐसा हमारे तंत्र में कानूनी ढील के कारण ही होता है. आजकल निवेशकों के हित को ध्यान में रखते हुए ‘सेबी’ अर्थात भारतीय प्रतिभूति एक्सचेंज बोर्ड का गठन किया गया है. लेकिन हमारी कुछ कंपनियों के मालिक तो ऐसे हैं कि तू डाल-डाल, मैं पात पात. इन्हें इस व्यवस्था में भी कुछ खामियों का पता चल जाता है और ये किसी न किसी तरह जनता का धन लूटने में सफल हो ही जाते हैं. यद्यपि इस प्रकार की लूट-मार बहुत कम कंपनियां ही करती हैं परन्तु इसके कारण समूचे शेयर बाज़ार की ‘साख’ को बट्टा लगता है. क्या भविष्य में कोई शेयरधारक पूंजी बाज़ार का रुख कर पाएगा? कदापि नहीं. आज हमारे शेयर बाज़ार की विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो चुकी है. कम से कम छोटे निवेशक तो इसके आसपास भी नहीं फटकते. किसी समय लोग इसमें निवेश करने के लिए हरदम तत्पर रहते थे परन्तु तथाकथित बे-इमान उद्यमियों ने इसकी साख को चौपट कर दिया है.
आजकल हमारी करेंसी ‘रूपए’ पर भारी अंतर्राष्ट्रीय दबाव है. इसका मुख्य कारण है सरकार द्वारा लिया गया ऋण. आज भारतीय आयात भी निर्यात की तुलना में बहुत अधिक है. इस वजह से भी हमारी मुद्रा पर दबाव बना रहता है. हमें दूसरे देशों से माल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना होता है. अतः डॉलर का मूल्य रूपए की तुलना में कहीं अधिक बढ़ने लगा है. अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों से प्राप्त ऋणों की वापसी भी डॉलरों में होने से हमारी ऋण अदायगी प्रभावित होती है. किसी भी देश को मिलने वाला ऋण उस देश की अंतर्राष्ट्रीय ‘साख’ पर निर्भर करता है. ‘साख’ का मूल्यांकन कई विदेशी रेटिंग एजेंसियों द्वारा किया जाता है. किसी भी देश की ‘साख’ वहाँ की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर करती है. संक्षेप में कहा जा सकता है कि हमारी ‘साख’ व्यक्तिगत स्तर से लेकर गली मोहल्ले, शहर, राज्य, देश व अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक मायने रखती है. अगर हमारी ‘साख’ अच्छी न हो तो कोई भी बैंक हमें ऋण नहीं देगा.

हमारी हर रोज की खरीद-फरोख्त जो क्रेडिट कार्ड से होती है, वह भी ‘साख’ से ही नियंत्रित होती है. जो लोग समय से अपने कार्ड की राशि अदा कर देते हैं उनकी खरीद सीमा बैंक द्वारा बढ़ा दी जाती है. इसी तरह वाहन एवं गृह निर्माण हेतु मिलने वाले ऋणों में भी किसी व्यक्ति की ‘साख’ को ही देखा जाता है. अगर हमारे देश में कोई एक व्यक्ति अपराध करता है तो इसकी छवि शहर से लेकर राज्य के स्तर तक प्रभावित होती है. किसी भी राज्य में संगठित अपराधियों के गिरोह होने से पूरे राज्य की बदनामी होती है. इसी प्रकार इधर-उधर गंदगी फैलाने से हमारे देश में आने वाले पर्यटकों की ‘राय’ कभी अच्छी नहीं हो सकती. गलती कुछ लोग ही करते हैं जबकि ‘साख’ पूरे देश की प्रभावित होती है. क्या आप चाहेंगे कि हमारी ‘साख’ कम हो? हम अपने देश की ‘साख’ बढ़ाने के लिए क्या कर सकते हैं? जाहिर है हमें जितना लगाव अपनी ‘साख’ से है उतना ही लगाव देश की ‘साख’ से भी होगा. तो आइए, हम सब कुछ ऐसे काम करें कि हमारी तथा हमारे देश की ‘साख’ को कोई बट्टा न लगे!

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बेटी बड़ी हो गई है!

देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

समझते थे जिसको सब नादान
आज हो गई है वह सबसे महान
माला की मजबूत कड़ी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

उसके कारण घर में बहार है
जैसे चलती कोई ठंडी बयार है
सावन की शीतल झड़ी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

घर में सब पर उस का रौब है
पढ़-लिख कर पाया इक ‘जॉब’ है
सबको पढाने वह खड़ी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है
अपने पैरों पर खड़ी हो गई है!

बेटी ने सभी को जगाया है
हमारे घर को महकाया है
ज़िंदगी की अनमोल घडी हो गई है.
देखो अब बेटी बड़ी हो गई है

अपने पैरों पर खड़ी हो गई है! –अश्विनी रॉय ‘सहर’

महाराष्ट्र का महासंग्राम!

महाराष्ट्र विधानसभा में किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण बड़ी विचित्र परिस्थितियाँ बनती जा रही हैं. जहां शिवसेना ने बी.जे.पी. का विरोध करने का मन बनाया है, वहाँ एन.सी.पी. ने हर हाल में बी.जे.पी. को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही है. यह अत्यंत चिंता का विषय है कि हमारे दल राजनीति से ऊपर उठ कर लोक भलाई के विषय में नहीं सोचते. अगर किसी दल को बहुमत न मिले तो दोबारा चुनाव करवाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रहता. आजकल बार-बार चुनाव करवाने से जनता को महँगाई की मार पड़ती है. सरकार जो रुपया चुनावों पर खर्च करती है वह भी जनता की गाढ़ी कमाई से ही आता है. ऐसे में मध्यावधि चुनावों से हर हाल में बचना चाहिए.
कुछ दल अपने राजनैतिक अहम के कारण एक दूसरे का विरोध करते हैं जो किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता. हालांकि बी.जे.पी. ने एन. सी.पी. से कोई समर्थन नहीं माँगा, फिर भी उन्होंने राज्य के हित में वर्तमान सरकार को बिना शर्त अपना समर्थन देने का फैसला किया है जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. कुछ दलों को इस फैसले पर सख्त एतराज़ है क्योंकि चुनाव से पहले बी.जे.पी. और एन.सी.पी. एक दूसरे के घोर विरोधी रहे हैं. ज्ञातव्य है कि शिवसेना और बी.जे.पी. भी तो एक दूसरे के विरोध में अलग-अलग चुनाव लड़े थे, फिर इन दोनों का मेल भी कैसे पवित्र हो सकता है? इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है.
हमारे विधायक केवल सत्ता की राजनीति करते हैं. जब शिवसेना को उनकी इच्छानुसार मंत्रालय नहीं मिल पाए तो उनका विरोध मुखर हो कर सामने आ गया. शिवसेना को एन.सी.पी. द्वारा बी.जे.पी. को समर्थन मिलने पर भी सख्त एतराज़ है क्योंकि इसी कारण उनका बी.जे.पी. से गठजोड़ नहीं हो पाया. आजकल की दूषित राजनीति को स्वच्छ करने के लिए सरकार को एक नए संविधान संशोधन पर विचार करना चाहिए जिसके अनुसार किसी दल या गठजोड़ को बहुमत न मिले तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या गठजोड़ के नेता को सरकार बनाने के लिए कहे, चाहे यह अल्पमत सरकार ही क्यों न हो! हाँ, कोई भी क़ानून तभी पास होगा जब प्रांतीय विधायक बहुमत से इसका समर्थन करें.

हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली भी राजनैतिक विद्वेष का शिकार हुई है. यहाँ के लोगों ने चुनावों में बढ़-चढ़ कर भाग लिया, फिर भी वहाँ कोई सरकार नहीं बन पाई. जो सरकार बनी, उसने कतिपय ओछी दलीलें दे कर कुछ दिन बाद इस्तीफा दे दिया. अब यहाँ दोबारा चुनाव होंगे. यह विचारणीय है कि अगर फिर भी किसी दल को बहुमत न मिला तो क्या होगा? आखिर एक अल्पमत सरकार बनने देने में क्या हर्ज है, बशर्ते इसे जनता द्वारा चुना गया हो!  

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

आओ पेड़ लगाएं

आओ हम सब पेड़ लगाएं  
जीवन एक आदर्श बनाएँ!   

कहीं भी जाएँ, कहीं से आएं
अपने पेड़ से मिलकर जाएँ
अपनी व्यथा जिसे कह पाएं
ऐसा जीवन-साथी बनाएं.
आओ हम सब पेड़ लगाएं
जीवन एक आदर्श बनाएँ!

पेड़ों से हरियाली आए
जीवन में खुशहाली आए
वर्षा लाएं, प्रदूषण मिटाएं
पेड़ हमारे बहुत काम आएं
आओ हम सब पेड़ लगाएं
जीवन एक आदर्श बनाएँ!

पेड़ों पर निर्भर सब पक्षी
शाकाहारी हों या परभक्षी 
पेड़ों की छाया में आकर
सब अपनी थकान मिटाएं
आओ हम सब पेड़ लगाएं   
जीवन एक आदर्श बनाएँ!

                  –अश्विनी रॉय ‘सहर’