कुछ समय पहले की बात है, दिल्ली में चुनाव प्रचार चल रहा था. सभी दल अपनी-अपनी
चुनावी संभावनाओं के प्रति चिंतित दिखाई दे रहे थे. भगवान को सभी पार्टियों
पर दया आ गई. उसने बारी-बारी सभी दलों के
नेताओं से मिलने का फैसला किया. सबसे पहले वह कांग्रेस नेता से मिला और पूछा बोलो, तुम क्या चाहते हो? कांग्रेसी
ने कहा कि हम तो बस इतना चाहते हैं कि किसी तरह इस बार हमारी लाज रख लों क्योंकि
हमारे पास गंवाने के लिए तो कुछ भी नहीं है, लेकिन नतीजे ऐसे दो ताकि
हम खुश हो सकें! बी.जे.पी. नेताओं ने कहा कि हे ईश्वर! हमारी इज्जत तो बाहरी
मुख्यमंत्री प्रत्याशी के कारण अब जा ही चुकी है, कम से
कम इतना कर दो कि आने वाले दिनों में पार्टी द्वारा हम से पूछा जाए कि दिल्ली में
अब क्या करना चाहिए! अब आम आदमी पार्टी की बारी थी. उनहोंने ईश्वर से अपनी सरकार
बनाने की दुआ मांगी. भगवान सबकी बात सुन कर चल दिए और सभी को दस फरवरी का इंतज़ार
करने को कहा. लेकिन भगवान जी ने सोचा कि कुछ राष्ट्रीय दलों के नेताओं से भी उनकी
इच्छा जान लेते हैं. सभी ने एक मत हो कर बी.जे.पी. के लिए हार मांगी. अपने घर जाते
समय ईश्वर बहुत खुश थे क्योंकि वह आज पहली बार सब लोगों की माँग पूरी करने में
समरथ अनुभव कर रहे थे. उन्होंने तुरंत कहा, तथास्तु, और देखते ही देखते सभी राजनैतिक दलों की इच्छा पूर्ण
हो गई! - अश्विनी रॉय 'सहर'
रौशन है मेरी दुनिया तेरी शाने- रहमत से, बिन माँगे दिया तूने नहीं शिकवा है किस्मत से
शनिवार, 14 फ़रवरी 2015
दिल्ली में क्या हुआ?
दिल्ली विधान सभा के परिणामों को शालीनता से स्वीकार करना
सभी के लिए आवश्यक है. हारने वालों के लिए भी और प्रचंड बहुमत से जीतने वालों के
लिए भी. इन परिणामों से यह स्पष्ट हो गया है कि आप अपने प्रतिद्वंदी को कमतर न
आंकें. कांग्रेस ने पराजयों का सिलसिला जारी रखा है. उन्होंने अपनी पुरानी हारों
से कोई सबक नहीं लिया. लगता है कि ये लोग केवल इस बात से ही संतुष्ट हैं कि
बी.जे.पी. हार गई. कमोबेश सभी टी.वी. चैनलों ने बी.जे.पी. की हार के अपने-अपने
कारण गिनाए हैं.
मेरे विचार से
बी.जे.पी. को इस हार से कतई विचलित होने की आवश्यकता नहीं है. यदि देश के अन्य
राजनैतिक दल जैसे तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, यूनाइटेड जनता दल, समाजवादी
दल आदि बी.जे.पी. की हार पर् खुशियाँ मना रहे हैं तो ये उनका छिछोरापन है. लगता है
इन सबने भी अपनी पुरानी भूलों से कोई सबक नहीं लिया. बी,जे.पी. की वर्तमान हार
केवल दिल्ली तक ही सीमित रहेगी, ऐसा मुझे विश्वास है क्योंकि ये अन्य राज्यों में
अपनी गलतियों को दोहराने की भूल कतई नहीं करेगी. जहां तक अन्य दलों की बात है,
उनका हाल भी कांग्रेस की तरह ही होगा, इसकी पूर्ण संभावना है.
दिल्ली में जो आम
आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला है वह कोई उनकी किसी महान उपलब्धि के लिए नहीं
बल्कि उनके बड़े-बड़े वायदों को देख कर आम आदमी ने उन्हें जिताया है. बी.जे.पी. ने
अपना प्रचार देर से शुरू किया तथा किरण बेदी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत
कर दिया. यह परिवर्तन स्थानीय नेताओं को रास नहीं आया तथा उन्होंने जमीनी स्तर पर्
चुनाव प्रचार में कोई तवज्जो नहीं दी. किरण बेदी ने अपने रोड शो में अनुशासन व
सख्ती का पाठ पढ़ाना शुरू किया तो कुछ लोग इससे बिदक गए. रही कसर आम आदमी पार्टी के
दुष्प्रचार ने पूरी कर दी कि जीतने के बाद किरण बेदी सभी अवैध झोंपड़पट्टटे, फुटपाथ
व रेहडी वालों को हटाएगी.
अपनी चुनावी
असफलता के बाद किरण बेदी ने इसे अपनी हार बताने की बजाय पार्टी की हार कहा है जो
उचित नहीं है. पार्टी को चाहिए कि वह भविष्य में अपने कार्यकर्ताओं को विश्वास में
लेकर ही कोई रणनीति तैयार करे अन्यथा इस प्रकार के नुक्सान झेलने पड़ सकते हैं. ये
परिणाम न तो मोदी सरकार की नीतियों पर् जनमत है और न ही केजरीवाल के सुशासन पर
जनता की मोहर है. ये तो विशुद्ध स्थानीय प्रतिक्रिया है जिसकी परिणिती पार्टी की
हार के रूप में सामने आई. अब पार्टी को अब अपना कैडर संभालने की आवश्यकता है ताकि
अगले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया जा सके.
इस पार्टी में
शत्रु नाम से पहचाने जाने वाले शत्रुओं की भी कोई कमी नहीं है. दिल्ली से अधिक
अनुशासन की आवश्यकता तो बी.जे.पी. कार्यकर्ताओं को है. कई नेताओं ने जाति एवं धर्म
के सम्बन्ध में अनावश्यक बातें कही जो निंदनीय है. प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे
ऐसे सभी लोगों से सख्ती के साथ निपटें क्योंकि इनके कारण पूरी पार्टी की छवि खराब
हो रही है. वर्तमान चुनावों में जिन नेताओं ने आवश्यकता से अधिक ऊंचे स्वर में
पार्टी का विरोध किया उन्हें पार्टी से निकालने पर् भी विचार होना चाहिए. किरण
बेदी घटनाक्रम को शायद एक बुरे सपने की तरह भुला देना ही सबके हित में होगा.
कुछ लोगों का कहना
है कि बी.जे.पी. का प्रचार नकारात्मक था जो कुछ हद तक सही भी है. लेकिन इस बार हर
पार्टी का चुनाव नकारात्मक रहा है. आम आदमी पार्टी ने कोई खास सकारात्मकता दिखाई
हो, ऎसी भी बात नहीं है. आम आदमी पार्टी का यह आरोप कि बी.जे.पी. ने अपने सभी
नेताओं को प्रचार में लगाया, सही नहीं है. क्या उनके सब नेता प्रचार नहीं कर रहे
थे? इनके नेता तो हरियाणा और पंजाब से दिल्ली में प्रचार करने गए थे. मुझे लगता है
कि हारने वालों को बहुत सी बातें कही जाती हैं. यह जीतने वालों की फितरत है कि वे
ऐसा कहें. परन्तु हारने वाले अन्य दल बी.जे.पी. की हार पर इतने उत्साहित क्यों
हैं? ये बात समझ से परे है. लोकतंत्र में हर पार्टी को कोई न कोई सबक सीखने को मिलता
है. ये भी एक सबक है जिसे शालीनता से पढ़ना चाहिए.
रविवार, 8 फ़रवरी 2015
तेल का खेल
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में
तेल की गिरती हुई कीमतों के बारे में सभी को मालूम है. कुछ राजनैतिक दल इस पर
सियासत करने से बाज़ नहीं आते. आखिर क्या है इसका राज़? आइए, इस विषय पर तनिक विचार
करते हैं. अधिकतर राज्यों ने पेट्रोल व डीजल पर पन्द्रह से बीस प्रतिशत तक सेल्स टैक्स
लगाया हुआ है. जब तेल की कीमतें बढ़ी तो सेल्स टैक्स के जरिए सरकार को मिलने वाली रकम
भी बढ़ गई. जब सरकार की टैक्स कलेक्शन बढ़ी तो उसका बज़ट भी बढ़ गया. सरकार ने मुलाजिमों
की तनख्वाह और दूसरे खर्चे अपने बजट के मुताबिक़ बढ़ा दिए. अब तेलों की घटती हुई कीमतों
के कारण सरकार की टैक्स कलेक्शन तो कम हो रही है जबकि खर्चे उसी तरह से हैं. ऐसे
में केन्द्रीय सरकार ने तेल पर कुछ टैक्स बढ़ा कर राज्य सरकारों की आमदनी को स्थिर रखने
की एक कोशिश की है.
ऐसा करने से केन्द्र पर जो
कर्जा है,
उसमें भी कमी आएगी तथा विकास
के लिए अतिरिक्त धन जुटाया जा सकेगा. यह सही है कि लोगों को राहत कम मिल रही है, परन्तु
देश के हित में ऐसा करना बुरा भी नहीं है. ज़रा सोचिए,
तेल की कीमतें कम होने के
बा-वजूद क्या ऑटो या टैक्सी वालों ने अपने भाड़े में कमी की?
बिल्कुल नहीं. इस विषय में
सभी खामोश हैं. कारण स्पष्ट है. अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपने ढुलाई के भाव कम नहीं
करेगा तो इसका फायदा सीधे ट्रांसपोर्टरों को होगा. ट्रांसपोर्ट महँगा होने से वस्तुओं
के दाम कम नहीं हो पाएंगे. ट्रक मालिकों का कहना है कि महँगाई के कारण ड्राइवरों की
तनख्वाह अधिक कर दी है. तेलों की कीमत चाहे बढे या घटे,
इसका असर सभी पर पड़ता है.
अगर सरकार कम दामों का सारा फायदा हमें दे
दे तो भी हमें कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि ट्रांसपोर्ट भाड़े में कमी नहीं
हो रही है. इससे सारा लाभ निजी सेक्टर के ट्रांसपोर्टरों को ही जाएगा.
एक सामान्य व्यक्ति अपने
स्कूटर में प्रतिमाह पांच या छह सौ रूपए का पेट्रोल डलवाता है. अगर इसके दाम एक दम
आधे कर दें तो यह तीन सौ रूपए हो सकता है. परन्तु सरकार ने इसका आधा लाभ ही
उपभोक्ताओं को दिया है. अर्थात तीन सौ के स्थान पर उपभोक्ता को लगभग साढ़े चार सौ
रूपए प्रतिमाह चुकाने पड़ रहे हैं जिससे उपभोक्ताओं को पांच रूपए प्रतिदिन का ही
अतिरिक्त खर्च झेलना पड़ रहा है. जरा सोचिए, यदि पूरा लाभ मिल जाता तो केवल एक सौ
पचास रूपए प्रति माह का ही लाभ होता जो कोई खास मायने नहीं रखता. जिन लोगों के पास
कारें हैं उन्हें भी चार-पांच सौ रूपए अधिक देने से कोई विशेष लाभ नहीं हो सकता.
ऐसे में अगर हमारे देश का बज़टीय घाटा कम हो जाए तो क्या बुरा है?
जब सरकार को घाटा होता है
तो वह टैक्स बढ़ा कर इससे कहीं ज्यादा राजस्व की
वसूली कर लेती है. इसलिए यह सरकार के लिए अच्छा अवसर है कि वह बिना किसी
अतिरिक्त धन खर्च किए अपने राजस्व में कुछ वृद्धि कर पाएगी. ये धन आखिर काम तो हम
सबके ही आएगा न! अगर सरकार दिवालिया होगी तो ये देश के लोगों का क्या भला करेगी?
केवल तेलों का दाम कम होने
से हरियाणा सरकार की आमदनी एक हज़ार करोड़ रूपए सालाना तक कम हो गई है. अगर केन्द्रीय
सरकार तेल के दाम पूरी तरह कम कर देती तो ये घाटा इससे भी अधिक हो जाता. ऐसा करने से
शायद लोगों को तनख्वाह मिलने में भी मुश्किल हो सकती थी. अतः इस पर किसी तरह की घटिया
सियासत नहीं होनी चाहिए.
आम आदमी कौन है?
भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसकी अधिकतर संख्या गाँवों में रहती है. गाँव,
जहां पर्याप्त साफ़-सफाई, पक्की गालियाँ, स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक स्थल तथा बिजली
व पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी रहती है. गाँव के लोग एक आम आदमी की तरह जीवन
बसर करते हैं. यह अत्यंत हैरानी की बात है गत वर्ष एक नई तरह के आम आदमी का उदय
हुआ है. यह आम आदमी दिल्ली में रहता है जहां एक कमरे के मकान का मालिक भी लखपति
है. क्यों न हो .... आखिर देश की राजधानी जो है! राजधानी के लोग सभी प्रकार की
सुख-सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं. उन्हें बढ़िया सड़कें, अस्पताल, स्कूल, कालेज,
अदालतें एवं रोज़गार के वे सभी अवसर प्राप्त हैं जो शायद गाँव का आदमी कभी सोच ही
नहीं सकता. तो क्या आम आदमी दिल्ली में रहता है? आइए, इस पर मंथन करें.
मनुष्य स्वभाव से ही परिवर्तन का समर्थन करता आया है. जब वह पैदल नहीं चलता तो
साइकिल या रिक्शा की माँग करता है. रिक्शा से मन भर गया तो ऑटो या टैक्सी में चलना
पसंद करता है. जब इससे भी संतुष्ट न हो तो वह बस या मेट्रो की सवारी करने लगता है.
लेकिन जल्द ही उसे पता चलता है कि मेट्रो में तो आम आदमी चलते हैं. तब उसे मेट्रो
की जगह अपनी कार अच्छी लगने लगती है. अपनी कार तो चार या पांच लाख तक की ही हो
सकती है जबकि सरकारी कार बीस लाख रूपए या इससे भी अधिक की होती हैं. जब यही आम
आदमी मुख्यमंत्री बन जाता है तो उसे लगता है कि वह देश का प्रधानमंत्री भी बन सकता
है. वह शीघ्र ही मुख्यमंत्री का पद छोड़ कर प्रधानमंत्री बनने की दिशा में चलने
लगता है. क्या आम आदमी को प्रधानमंत्री बनने का अधिकार नहीं है? क्यों नहीं,
प्रधानमंत्री तो कोई भी बन सकता है.
कोई भी व्यक्ति महत्त्वाकांक्षी हो सकता है, परन्तु
मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के पद को आम पद समझ लेना भारी भूल होगी. ये सभी पद
उच्च स्तर की जिम्मेवारी और सत्यनिष्ठा से बंधे होते है. किसी भी आम आदमी को इन
संवैधानिक पदों से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. हमारे देश में लोकतंत्र
है जो एक अच्छी बात है. परन्तु कुछ लोग केवल वोट प्राप्त करने के लिए जनता को
गुमराह करते रहते हैं. लोगों को आधे रेट में बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त वाई-फाई दे
कर आप क्या सन्देश देना चाहते हैं? अगर आप आम आदमी के नाम पर ही खजाना लुटा देंगें
तो विकास कार्यों के लिए बजट कहाँ से आएगा? अमीर लोगों की संख्या इतनी अधिक भी
नहीं है कि वे टैक्स देकर आपका खजाना भर दें.
हमारे देश में काले धन की उत्पत्ति क्यों होती है?
क्या किसी ने इस पर विचार किया है? जब सरकार भलाई के नाम पर मुफ्त में रुपया
लुटाने लगे, मुफ्त में मकान, बिजली और पानी देने लगेगी तो काम कौन करना चाहेगा?
ऐसे समाजवाद का हश्र रूस जैसे देश पहले ही देख चुके हैं. समाजवाद से पेट नहीं
भरता. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम गरीबों या आम आदमी के हितों के विरुद्ध
हैं.
अगर आम आदमी की सच्ची सेवा करनी है तो उसे शिक्षित
करो. उसे रोज़गार उपलब्ध कराओ ताकि वह धन कमा कर न केवल अपना मकान बनाए बल्कि पानी
और बिजली का बिल भी चुकाए. वह अपनी आय इतनी बढाए कि सरकार को भी कर अदा करे ताकि
वह इसे कल्याणकारी कामों पर खर्च कर सके. आज सरकार का आधा बजट केवल क़र्ज़ लिए
रुपयों को चुकाने में चला जाता है. बचे हुए आधे धन को सरकार के मंत्री तथा
कर्मचारी खर्च कर देते हैं. जो शेष बचता है उसे गरीबों में बांटने के लिए नए- नए
ढंग तलाश करने में लगा देते हैं. विकास कार्यों के लिए तो बजट बचता नहीं, उलटे
लोगों को ये नसीहत दी जाती है कि वे अपने बैंक के कर्जे भी अदा न करें. इन सब
बातों से हमारा देश कहाँ जाएगा? कैसे तरक्की होगी?
आज आम आदमी को मूर्ख बना कर उसे तात्कालिक लाभ दिया
जा सकता है परन्तु ये सब लंबे समय तक नहीं चल सकता. यदि धन कमाया न जाए तो कुबेर
के बड़े से बड़े खजाने भी खाली हो जाते हैं. क्या लुटाने के लिए केवल सरकारी खजाना
ही रह गया है? दिल्ली में आम आदमी के तथाकथित नेता लाखों-करोड़ों रूपए की संपत्ति
रखते हैं. क्या उन्होंने कभी किसी आम आदमी का बिजली का बिल जमा करवाया? कम से कम
हमें तो ऐसा नहीं लगता. हाँ, ऎसी ख़बरें अवश्य पढ़ी हैं कि जिन लोगों का बिजली
कनेक्शन बिल जमा न कराने से कट गया था, उनकी तारें अवैध ढंग से जोड़ दी गई. इससे
क्या सन्देश गया? स्पष्ट है कि आप जो चाहे मनमानी करो, क्योंकि आपका कोई कुछ नहीं
बिगाड़ सकता. क्या यह दल देश के नागरिकों को यही सन्देश देना चाहता है? अगर हाँ, तो
वह दिन दूर नहीं जब इनका भी हाल हमारे देश के सर्वोच्च राजनैतिक दल की तरह हो
जाएगा. आज उस दल के नेता अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं परन्तु उनकी बात कोई
सुनने को ही तैयार नहीं है. यह स्पष्ट है कि इन्होंने भी आम लोगों को उम्मीद से
कहीं अधिक सब्ज-बाग दिखाए थे. जब ये नेता इनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे तो
इन्हें सड़क पर ला पटका.
हम अच्छी तरह जानते हैं कि आम आदमी पार्टी भले ही
सरकार बना ले, लेकिन वह जनता को वो सभी खैरातें नहीं बाँट पाएगी, जिनका उल्लेख
इनके नेताओं ने किया है. अगर आप आधी दिल्ली को पानी और बिजली पर सब्सिडी देंगे तो बचे
हुए अन्य लोग भी इसकी माँग करेंगे. अगर आपने सबको खुश नहीं किया तो समाज में
असमानता बढ़ेगी. इसी असमानता के कारण अपराध बढते हैं जो बिगड़ती हुई क़ानून और
व्यवस्था के लिए जिम्मेवार हैं. हमें तो लगता है कि सरकार किसी की भी बने, लेकिन
आम आदमी ही पिसता है.
आज आम आदमी का स्थान ‘छद्म रूप’ के आम आदमी ने ले
लिया है. अब गाँवों में रहने वाले आम आदमी को लगता है कि ‘आम’ आदमी तो केवल दिल्ली
में ही रहता है. जिस आदमी ने आम आदमी पार्टी बनाई वह भी गाँव से ही चल कर दिल्ली
आया. उसने गाँव में रहने वाले आम आदमी के लिए तो कुछ नहीं किया किन्तु दिल्ली में
आ कर नई तरह के आम आदमी भी तैयार कर दिए. अब इन्हीं तथाकथित आम लोगों की सरकार भी
बन जाएगी. क्या आप इन्हें वास्तव में आम आदमी समझते हैं?
सोमवार, 19 जनवरी 2015
एम.एस.जी. पर बवाल क्यों?
"सच्ची बात कही थी मैंने
लोगों ने सूली पे चढ़ाया
मुझको ज़हर का जाम पिलाया
फिर भी उनको चैन ना आया
सच्ची बात कही थी मैंने!"
जी हाँ, ऐसा ही कुछ
एम.एस.जी. फिल्म में हुआ है. सच्ची बात किसे कड़वी नहीं लगती? फिर चाहे वह सेंसर
बोर्ड ही क्यों न हो! फिल्म सेंसर बोर्ड की अध्यक्षा ने सरकारी दखलंदाजी का कारण
बताते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उल्लेखनीय है कि एम.एस.जी. फिल्म को
सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया था. ये वही बोर्ड है जिसे ‘पी.के.’ फिल्म में तो कुछ
भी आपत्तिजनक नहीं लगा परन्तु ‘एम.एस.जी.’ को सेंसर कर दिया. ये फिल्म डेरा प्रमुख
राम रहीम सिंह इन्सां द्वारा निर्देशित है जिसका विरोध देश के सिख संगठन एवं कई
राजनेता कर रहे हैं. परन्तु अब तक किसी भी दल ने इस विरोध की कोई खास वजह नहीं
बताई.
ये हैरानी की बात है कि
उस ‘पी.के.’ फिल्म को पास करने में सेंसर ने कोई देर नहीं लगाईं जिसमें हिन्दू
धर्म को ठेस पहुंचाने वाले कई दृश्य डाले गए हैं. एक दृश्य में फिल्म का नायक
हिन्दू देवताओं के चित्रों पर ‘लापता’ लिख कर इधर-उधर घूमता दिखाई देता है. वह
मंदिर जा कर गल्ले से रूपए निकाल लेता है. फिल्म का नायक एक महिला को कंडोम का पेकेट
भी दिखाता है जो अत्यंत अपमानजनक दृश्य है. ये वही नायक हैं जो टी.वी. में अक्सर महिलाओं
के उत्पीडन पर विरोध प्रदर्शित करता है परन्तु अपनी फिल्म में उनका अपमान करने से
बाज़ नहीं आता.
इस फिल्म का नायक अपने
नंगेपन की सफाई भी बड़ी बेशर्मी से उचित ठहराते हुए कहता है कि जब कौवे वस्त्र नहीं
पहनते तो मनुष्यों के लिए यह क्यों आवश्यक है? फिल्म में कारों के अंदर सेक्स करते
हुए दिखाया है जिसपर सेंसर को कोई एतराज़ नहीं हुआ. ये वही सेंसर बोर्ड है जो
सिगरेट पीने के दृश्य में वैधानिक चेतावनी छापने की बात करता है परन्तु इस फिल्म
में नायक के नंगे होने, पूजा स्थल पर चोरी करने, नारी को अपमानित करने, देवताओं को
बे-इज्ज़त करने तथा सेक्स करते हुए लोगों के वस्त्र चुराने वाले दृश्यों पर न तो
कोई आपत्ति करता है और न ही चेतावनी छापने की सलाह देता है.
इन लोगों को एम.एस.जी.
जैसी साधारण फिल्म पर आपत्ति क्यों है, ये समझ से परे है. ऐसे भेदभावपूर्ण सोच
रखने वाले लोगों को सेंसर बोर्ड में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए. अगर इन्होंने
इस्तीफा दे दिया है तो अच्छा ही है. इनके स्थान पर ईमानदार अध्यक्ष तथा अन्य
सदस्यों की नियुक्ति होनी चाहिए जो पूर्ण पारदर्शिता से अपना काम करे.
मंगलवार, 13 जनवरी 2015
"पी.के." की समीक्षा
पी.के. फिल्म देखने से मालूम हुआ कि इसमें बहुत से तथाकथित ‘रोंग’ नम्बरों का उल्लेख है परन्तु यह स्वयं ही एक ‘रोंग’ नंबर है. फिल्म में बहुत से ऊल-जलूल सवाल उठाए गए हैं जबकि इसकी कहानी स्वयं ही सवालों के घेरे में आती हुई जान पड़ती है. फिल्म में ईश्वर के अस्तित्व एवं धर्म गुरुओं पर सवाल उठाया गया है. उल्लेखनीय है कि जब इस फिल्म का नायक शराब की बोतलें उठा कर मस्जिद की तरफ जाता है तो उसे बाहर से ही खदेड़ दिया जाता है जबकि वह मंदिर में बे-धड़क जाकर गल्ले से रूपए निकाल लेता है. वह एक हिन्दू धर्म गुरु से भी मनमाने प्रश्न करता हुआ दिखाया गया है. यह अत्यंत हैरानी की बात है कि नायक ने पूरी फिल्म में अपने धर्म गुरु या पैगम्बर के विषय में कोई प्रश्न नहीं उठाया और न ही कोई नुक्ताचीनी की. इससे यह स्पष्ट होता है कि फिल्म के नायक की सोच कितनी दोगली है?
इस फिल्म का नायक किसी का हाथ पकड़ कर यह तो जान लेता है कि कोई अपनी भाषा कैसे बोलता है तथा उसके मन में क्या है परन्तु यह नहीं जान सकता कि वह किसकी अराधना करता है? उसका धर्म क्या है? वह बार-बार पूछता है कि किसी व्यक्ति का धर्म बताने वाला ठप्पा शरीर पर कहाँ लगा है? यह सब बड़ा हास्यास्पद लगता है. फिल्म के नायक द्वारा देवी-देवताओं की तस्वीरें उठा कर उन्हें लापता बताना भी उसकी ओछी सोच का परिचायक है. इस धरती पर सब लोगों के कपडे पहनने पर सवाल उठाए गए हैं. नायक पूछता है कि जब कौवा कपडे नहीं पहनता तो हमारे कपडे न पहनने पर एतराज़ क्यों हो? फिल्मों में सब कुछ वास्तविकता से परे है.
इस फिल्म के कुछ दृश्यों को बड़े फूहड़ ढंग से दिखाया गया है. कुछ दृश्यों में नायक द्वारा महिलाओं के हाथों को पकड़ना बहुत ही बचकाना लगता है. कुछ दिन पहले इस ‘नायक’ ने स्वयं एक टी.वी. शो में स्वीकार किया था कि अगर हम फिल्मों में महिलाओं का सम्मान नहीं करेंगे तो लोग अपने सार्वजनिक जीवन में भी ऐसा ही करेंगे. स्पष्टतः लोग फिल्मी नायकों को अपने रोल मॉडल के रूप में देखते हैं. पाकिस्तान के पत्रकार जिन्हें निष्पक्ष होना चाहिए, वे भी यह स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनका देश भारत में बम-विस्फोट करवाने में किस तरह दिलचस्पी लेता रहता है. कहानी में एक पाकिस्तानी व्यक्ति ‘सरफराज़’ फिल्म की हिन्दुस्तानी नायिका से प्रेम करता हुआ दिखाया गया है. “बिन पूछे मेरा नाम पता, चल दो न साथ मेरे....” गीत गाते हुए सरफराज़ ऐसे लगता है मानो पाकिस्तान भारत को ही सही रास्ते पर चलने की नसीहत दे रहा हो. यह अपने आपमें संसार का आठवां आश्चर्य ही प्रतीत होता है.
चर्चित है कि यह फिल्म अब तक बहुत ही सफल रही है. भारत के सभी सिनेमा घरों में आप चाहे ‘पोर्न’ फ़िल्में लगा कर देख लें, अब तक के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे. तो क्या अधिक लोगों द्वारा किसी फिल्म को देखना ही इसकी सफलता का परिचायक है? देश में कुछ स्थानों पर इस फिल्म के विरोध में स्वर उठ रहे हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से तो इनसे सहमत नहीं हूँ परन्तु उचित-अनुचित में भेद करने वाले फिल्म नायक से यह प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि वह अपनी भडांस एक विशेष धर्म के प्रति ही क्यों निकालना चाहता है?
फिल्म के कई दृश्य ऐसे भी हैं जिन्हें देख कर मन में करुणा के भाव तो उत्पन्न होते हैं परन्तु कोई हँसी नहीं आती. फिल्म में जो भी गीत-संगीत है वह अच्छा है, तकनीकी दृष्टि से तो सब ठीक-ठाक है लेकिन कहानी बे-सिरपैर व ऊल-जलूल है. फिल्म के एक दृश्य में टिकटों की ब्लैक करने वाले व्यक्ति को घटिया सोच वाला तथा एक बुजुर्ग व्यक्ति को ऐसे धोखेबाज के रोल में दिखाया है जो स्वयं ही ब्लैक में सिनेमा टिकट खरीद लेता है. कहते हैं कि फ़िल्में समाज का आइना होती हैं परन्तु इस फिल्म को देख कर लगता है कि सब कुछ सही नहीं है. अगर आमिर खान फिल्मों को केवल मनोरंजन ही मानते हैं तो टी.वी. पर आकर भारतीय नायिकाओं को ‘फूहड़’ अभिनय करने से क्यों रोकते हैं? अगर फ़िल्में देख कर हमारे नवयुवक नहीं बिगड़ते तो आप विभिन्न उत्पादों के प्रचार हेतु स्वयं को क्यों लगाते हैं? इससे तो यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि लोग आपके द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करने की कोशिश करते हैं चाहे वह सब गलत हो या सही!
यह एक विडम्बना ही है कि जो अच्छा है लोग उस पर कोई ध्यान नहीं देते परन्तु जो बुरा है उससे खूब कमाई करते हैं. ईश्वर के होने या न होने से तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु जो लोग ईश्वर के नाम पर अच्छे काम करते हैं वह अवश्य ही अनुकरणीय है. कई लोग राम, अल्लाह, जीसस या अपने गुरु के नाम पर अस्पताल, स्कूल, कालेज व धर्मशालाएं बनवाते हैं जो समाज के हित में है. वहीं कुछ लोग धर्म के नाम पर लोगों को बांटते हैं जो बुरी बात है. देश में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इन दोनों तरह के लोगों पर फ़िल्में बना कर रुपया कमाते हैं जिनके बारे में आप स्वयं ही फैसला कर सकते हैं कि ये सब अच्छा है या बुरा!
इस फिल्म का नायक किसी का हाथ पकड़ कर यह तो जान लेता है कि कोई अपनी भाषा कैसे बोलता है तथा उसके मन में क्या है परन्तु यह नहीं जान सकता कि वह किसकी अराधना करता है? उसका धर्म क्या है? वह बार-बार पूछता है कि किसी व्यक्ति का धर्म बताने वाला ठप्पा शरीर पर कहाँ लगा है? यह सब बड़ा हास्यास्पद लगता है. फिल्म के नायक द्वारा देवी-देवताओं की तस्वीरें उठा कर उन्हें लापता बताना भी उसकी ओछी सोच का परिचायक है. इस धरती पर सब लोगों के कपडे पहनने पर सवाल उठाए गए हैं. नायक पूछता है कि जब कौवा कपडे नहीं पहनता तो हमारे कपडे न पहनने पर एतराज़ क्यों हो? फिल्मों में सब कुछ वास्तविकता से परे है.
इस फिल्म के कुछ दृश्यों को बड़े फूहड़ ढंग से दिखाया गया है. कुछ दृश्यों में नायक द्वारा महिलाओं के हाथों को पकड़ना बहुत ही बचकाना लगता है. कुछ दिन पहले इस ‘नायक’ ने स्वयं एक टी.वी. शो में स्वीकार किया था कि अगर हम फिल्मों में महिलाओं का सम्मान नहीं करेंगे तो लोग अपने सार्वजनिक जीवन में भी ऐसा ही करेंगे. स्पष्टतः लोग फिल्मी नायकों को अपने रोल मॉडल के रूप में देखते हैं. पाकिस्तान के पत्रकार जिन्हें निष्पक्ष होना चाहिए, वे भी यह स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनका देश भारत में बम-विस्फोट करवाने में किस तरह दिलचस्पी लेता रहता है. कहानी में एक पाकिस्तानी व्यक्ति ‘सरफराज़’ फिल्म की हिन्दुस्तानी नायिका से प्रेम करता हुआ दिखाया गया है. “बिन पूछे मेरा नाम पता, चल दो न साथ मेरे....” गीत गाते हुए सरफराज़ ऐसे लगता है मानो पाकिस्तान भारत को ही सही रास्ते पर चलने की नसीहत दे रहा हो. यह अपने आपमें संसार का आठवां आश्चर्य ही प्रतीत होता है.
चर्चित है कि यह फिल्म अब तक बहुत ही सफल रही है. भारत के सभी सिनेमा घरों में आप चाहे ‘पोर्न’ फ़िल्में लगा कर देख लें, अब तक के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे. तो क्या अधिक लोगों द्वारा किसी फिल्म को देखना ही इसकी सफलता का परिचायक है? देश में कुछ स्थानों पर इस फिल्म के विरोध में स्वर उठ रहे हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से तो इनसे सहमत नहीं हूँ परन्तु उचित-अनुचित में भेद करने वाले फिल्म नायक से यह प्रश्न तो पूछा ही जा सकता है कि वह अपनी भडांस एक विशेष धर्म के प्रति ही क्यों निकालना चाहता है?
फिल्म के कई दृश्य ऐसे भी हैं जिन्हें देख कर मन में करुणा के भाव तो उत्पन्न होते हैं परन्तु कोई हँसी नहीं आती. फिल्म में जो भी गीत-संगीत है वह अच्छा है, तकनीकी दृष्टि से तो सब ठीक-ठाक है लेकिन कहानी बे-सिरपैर व ऊल-जलूल है. फिल्म के एक दृश्य में टिकटों की ब्लैक करने वाले व्यक्ति को घटिया सोच वाला तथा एक बुजुर्ग व्यक्ति को ऐसे धोखेबाज के रोल में दिखाया है जो स्वयं ही ब्लैक में सिनेमा टिकट खरीद लेता है. कहते हैं कि फ़िल्में समाज का आइना होती हैं परन्तु इस फिल्म को देख कर लगता है कि सब कुछ सही नहीं है. अगर आमिर खान फिल्मों को केवल मनोरंजन ही मानते हैं तो टी.वी. पर आकर भारतीय नायिकाओं को ‘फूहड़’ अभिनय करने से क्यों रोकते हैं? अगर फ़िल्में देख कर हमारे नवयुवक नहीं बिगड़ते तो आप विभिन्न उत्पादों के प्रचार हेतु स्वयं को क्यों लगाते हैं? इससे तो यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि लोग आपके द्वारा बताई गई बातों का अनुसरण करने की कोशिश करते हैं चाहे वह सब गलत हो या सही!
यह एक विडम्बना ही है कि जो अच्छा है लोग उस पर कोई ध्यान नहीं देते परन्तु जो बुरा है उससे खूब कमाई करते हैं. ईश्वर के होने या न होने से तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु जो लोग ईश्वर के नाम पर अच्छे काम करते हैं वह अवश्य ही अनुकरणीय है. कई लोग राम, अल्लाह, जीसस या अपने गुरु के नाम पर अस्पताल, स्कूल, कालेज व धर्मशालाएं बनवाते हैं जो समाज के हित में है. वहीं कुछ लोग धर्म के नाम पर लोगों को बांटते हैं जो बुरी बात है. देश में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इन दोनों तरह के लोगों पर फ़िल्में बना कर रुपया कमाते हैं जिनके बारे में आप स्वयं ही फैसला कर सकते हैं कि ये सब अच्छा है या बुरा!
कैसे खुदगर्ज़ हो?
मेरा किया तो फ़र्ज़ है
तुम्हारा किया एहसान
मुझे इस पर हर्ज है !
दोस्ती मेरी इबादत है
तुम्हारे लिए सियासत है
ये कैसी लियाकत है?
वायदे खूब करते हो
लेकिन वफ़ा नहीं करते
खुद को बा-वफ़ा कहते हो !
हमें अपने हाल पे छोड़ दो
हमारे बीच न कोई होड़ हो
गर दीवार है उसे तोड़ दो! -अश्विनी रॉय 'सहर'
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014
धर्मांतरण पर कैसा बवाल?
हमारे देश में सभी नागरिकों को छूट है कि वे किसी भी धर्म का पालन करें. फिर
भी यदा-कडा इस मुद्दे पर सियासत गरमाती रहती है कि देश में कुछ संगठन जबरन धर्म
परिवर्तन करवाने में लगे हैं. किसी ने ठीक ही कहा है कि-
“उम्र बीती बुतपोशी में, अब क्या ख़ाक मुसलमान होंगे!” अर्थात सारी जिंदगी तो मूर्ति-पूजा
करते रहे, अब आप मुसलमान कैसे बन सकते हैं? कुछ लोग अदूरदर्शिता अथवा आर्थिक
प्रलोभन के कारण भी धर्म परिवर्तन हेतु तत्पर रहते हैं. ये लोग अपने अल्पकालिक
हितों के लालच में दूरगामी परिणामों की अनदेखी कर देते हैं. कहा जाता है कि “पहला
रंग ही रंग है, दूजा रंग बदरंग!” अगर आप भगवां रंग के वस्त्र पर हरा रंग चढाने की
कोशिश करेंगे तो वह न तो भगवां रहेगा और न ही हरा.
हमारे देश में अब तक हुए असंख्य धर्म परिवर्तनों से यह साफ़ हो गया है कि धर्म
कोई वस्त्र नहीं हैं, जो जब जी चाहा बदल लें. ये तो एक आस्था का विषय है. जो
व्यक्ति अपने धर्म में आस्था नहीं रखता, उसे दूसरों के धर्म में कैसे आस्था हो
सकती है? राजस्थान में बरसों पहले कुछ हिन्दू लोग मुसलमां हो गए थे. आज वे सब
अलग-थलग ही नज़र आते हैं क्योंकि वे अब न तो हिन्दू ही रहे और न ही मुसलमान. हिन्दू
परिवार इनके साथ कोई वैवाहिक सम्बन्ध स्वीकार नहीं करते और न ही ये अपने बच्चों की
शादियाँ मुसलामानों में कर पाते हैं. परिणामस्वरुप इन लोगों की एक अलग ही श्रेणी
बन गई है जिन्हें कायमखानी मुसलमान कहा जाता है.
कुछ लोगों ने धर्म परिवर्तन इसलिए भी किया क्योंकि उनके धर्म में सामाजिक
भेदभाव अधिक होता है. हिंदुओं में तथाकथित ऊँची व नीची जातियों में मतभेदों के
कारण लोग ईसाई व मुसलमान बनने लगे. जो लोग ईसाई बने उन्हें ईसाइयों ने अपनी
मुख्यधारा में शामिल नहीं किया. ये लोग स्वयं को उपेक्षित अनुभव करते रहे तथा जब दलित
एवं पिछड़े हिंदुओं को आरक्षण दिया जाने लगा तो ये ‘परिवर्तित’ ईसाई और मुसलमान भी
आरक्षण की माँग करने लगे. अब प्रश्न ये उठता है कि यदि ईसाइयों और मुसलामानों में ऊंच-नीच
का भेद नहीं होता तो इन्हें आरक्षण क्यों दिया जाए? अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन
के बाद भी उपेक्षित है तो उसने अपना धर्म ही क्यों छोड़ा? उपर्युक्त बातों से यह
स्पष्ट हो जाता है कि मानव वस्तुतः लोभी प्रवृत्ति का प्राणी है. उसे जहां भी लाभ
दिखाई देता है, वह वहाँ चला जाता है.
हमारे देश के राजनीतिज्ञ संसद में इस विषय पर चर्चा करते हुए नहीं थकते परन्तु
समस्या के मूल में कोई झांकने को भी तैयार नहीं है. जिसे देखो वह वोटों की राजनीति
करता हुआ दिखाई देता है. “कौन व्यक्ति किस धर्म को अपनाए” इसका निर्धारण हमारे
राजनेता नहीं कर सकते. जिस देश में लोगों को भरपेट खाने को न मिलता हो, वहाँ अपने धर्म
के प्रति कौन वफादार होगा? क्या धर्म व्यक्ति का पेट भर सकता है? एक भिखारी के लिए
तो पेट भरना अधिक महत्वपूर्ण है न कि वह मंदिर या मस्जिद जहां से उसे कुछ खाने को
मिल सकता है.
‘अपराधमुक्त’ भारत की संकल्पना
देश में अपराध का हर रोज बढ़ता हुआ ग्राफ नई ऊंचाइयां छूने लगा है. दिल्ली में
बलात्कार की एक और घटना ने साबित कर दिया है कि देश में महिलाएं अब भी सुरक्षित
नहीं है. हर नई घटना के बाद मीडिया का बेसुरा प्रलाप, राजनीतिज्ञों द्वारा घटना की
भर्त्सना, पुलिस द्वारा तेज़ी से जांच करने के आश्वासन और सरकार की नित्य होने वाली
छीछालेदर देखकर सभी लोग परेशाँ हो रहे हैं. आखिर इस तरह की घटनाओं पर लगाम कैसे
कसी जाए? अगर देखा जाए तो इन घटनाओं की पुनरावृत्ति के लिए हमारा समूचा तंत्र एवं
समाज दोनों ही जिम्मेवार हैं. इसकी शुरुआत घर से ही हो जाती है. कोई भी व्यक्ति
अपराधी क्यों बनता है? या तो उसके घर की पृष्ठ-भूमि अपराधिक होती है या फिर उसके
परिवार में कोई न कोई व्यक्ति पहले से अपराधी होता है. प्रदूषित वातावरण में पलने
वाले बच्चे घर की अपराधिक पृष्ठ-भूमि से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते. हमारे
परिवार एवं समाज दोनों की यह जिम्मेवारी है कि अपराधों को संरक्षण देने की बजाय हम
इन्हें उचित मंच तक ले जाएँ ताकि इन्हें जड़ से ही पनपने का अवसर न मिले.
हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं
संस्कार अपने परिवार के बाद स्कूल से मिलते हैं. यदि स्कूलों में अध्यापक अपराधिक
पृष्ठभूमि के होंगे तो आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि देश का क्या होगा? कुछ लोग
स्कूलों में अध्यापक का पद प्राप्त करने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने से लेकर
तरह-तरह की हेराफेरियाँ करते हैं. ये सब देश में फ़ैल रहे भ्रष्टाचार से ही होता
है. अध्यापकों की चरित्र जांच या ‘वेरिफिकेशन’ अक्सर पुलिस द्वारा रिश्वत लेकर की
जाती है. जब लोग रिश्वत देकर अपने काम करवाने लगेंगे तो गुणवत्ता से तो समझौता
करना ही पडेगा. इसी तरह पुलिस में होने वाली भर्ती भी भ्रष्टाचार के आशीर्वाद से
होती है. हमारे समाज की जड़ें खोखली करने में भ्रष्टाचार की भूमिका सर्वाधिक है.
हैरानी की बात है कि जब ड्राईविंग लाइसेन्स बनवाना हो तो कुशल नेत्र दृष्टि के
साथ-साथ मनुष्य का स्वस्थ होना भी जरूरी है. जब कोई व्यक्ति अपराधिक छवि का हो, तो
उसे किसी भी हालत में ड्राईविंग लाइसेन्स
नहीं मिलना चाहिए क्योंकि वह इसका दुरुपयोग कर सकता है. परन्तु वास्तविकता एक दम
अलग है. आजकल लोग रिश्वत देते हैं तथा ड्राईविंग लाइसेन्स अपने आप बन कर आपके घर
चला आता है. जब अपराधों को रोकने के लिए बनी पुलिस ही सभी अपराधों को न्यौता देने
लगे तो आप कहाँ जाएंगे?
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हम आज़ाद तो हो गए
किन्तु आजादी के इतने साल बाद भी हमारे देश में क़ानून का शासन नहीं है. लोग अपराध
करके बे-खौफ घूमते रहते हैं. हम केवल सरकार को बुरा-भला कह कर अपना पल्ला झाड लेते
हैं. परिणाम फिर वही.... जस का तस! हाल ही में घटी ‘रेप’ की घटना के अपराधी को
पकड़ने से मालूम हुआ है कि उस व्यक्ति पर पहले से ही बलात्कार के आरोप में मुकद्दमा
चल रहा है जिसमें वह अभी बरी नहीं हुआ था. यह उतना ही आश्चर्यजनक है कि इस प्रकार
के अपराध करने वाला व्यक्ति ड्राईविंग लाइसेन्स कैसे बनवाने में सफल हो गया? एक
कंपनी को ‘कैब-सर्विस’ के व्यवसाय में कोताही बरतने का दोष दिया जा सकता है परन्तु
क्या यह हमारे तंत्र का दोष नहीं है कि अनधिकृत व्यक्ति इस देश में किस प्रकार
कारें व टेक्सियाँ चला सकते हैं? कुछ लोगों का मानना है कि महिला ड्राइवरों को
टैक्सी के ड्राईविंग लाइसेन्स दिए जाएँ तो अच्छा रहेगा. परन्तु इस बात की क्या
गारंटी है कि टैक्सियों में सफर करने वाले पुरुष या महिलाएं कोई अपराध नहीं
करेंगे?
हमें अपराध के मामलों को सख्ती से निपटने की आवश्यकता
है. आजकल अपराधियों को या तो पकड़ा ही नहीं जाता, या पकड़ने में बहुत लंबा समय लगता
है जिससे घटना के सभी साक्ष्य कमज़ोर पड़ जाते हैं. कई बार पुलिस घटना की एफ.आई.आर.
दर्ज करने में आना-कानी करती है. हमारा क़ानून बहुत कमज़ोर है जो तरह-तरह की
बैसाखियों के सहारे चलता है. ये बैसाखियाँ भ्रष्टाचार के रस से सराबोर हैं. कभी
वकीलों की फीस, कभी राजनैतिक हस्तक्षेप, तो कभी गवाहों की बेरुखी अपराधियों को सजा
दिलाने में संकोच करती है. न्याय मिलने में देरी होने के कारण लोगों का हमारी
न्याय व्यवस्था से ही विश्वास उठ गया है.
आज हमें अपने भीतर झांकना होगा. हम सब मिलकर इस तरह
के अपराधों को अवश्य ही रोक सकते हैं. अपराधी हमारे परिवार, समाज, शहर तथा राज्यों
में ही छुपे हुए हैं. हमें इनकी पहचान करके क़ानून के हवाले करना होगा. क़ानून से
कोई बचने न पाए, इस पर सारे समाज की नज़र होनी चाहिए. हमारा कर्तव्य है कि हम सभी
अपराधियों के प्रति अतिसंवेदनशील बनें तथा इन्हें पकडवाने में अपना अधिकाधिक
योगदान दें. ‘अपराधमुक्त’ भारत की संकल्पना शायद हम सबके सहयोग से ही सम्भव हो
सकती है.
बुधवार, 3 दिसंबर 2014
एल.पी.जी.सब्सिडी पर रोक
आजकल सरकार अमीरों को मिलने
वाली एल.पी.जी. सिलेंडर पर सब्सिडी रोकने पर विचार कर रही है. समझ नहीं आता कि इस
तरह से सरकार कितने रुपयों में बचत कर लेगी? देश में अमीरों की संख्या कितनी है?
अगर मुट्ठी-भर अमीरों ने साल भर में एक गैस सिलेंडर अतिरिक्त उपयोग कर भी लिया तो
कौन-सा पहाड़ टूट जाएगा? जो अमीर व्यक्ति देश को लाखों रूपए कर के रूप में दे रहे
हैं, उन्हें एल.पी.जी. की मामूली सब्सिडी अगर चली भी गई तो क्या हर्ज है? सरकार
अपने संसाधनों की चोरी पर अंकुश क्यों नहीं लगाती?
जो अपना आयकर ईमानदारी से
देता है उस पर सभी प्रतिबन्ध लागू हो सकते हैं. जो व्यक्ति कोई कर नहीं देते वे
फर्जी ढंग से सभी प्रकार के फायदे सरकार से लेते रहते हैं. अगर देखा जाए तो हमारे
जनप्रतिनिधि ही सर्वाधिक सिलेंडरों की खपत कर रहे हैं. क्या सरकार ने उन पर कोई
अंकुश लगाने की बात सोची है? ये लोग बिजली और टेलीफोन का भी सबसे अधिक उपयोग करते
हैं तथा अपने बिल भी समय पर नहीं चुकाते. सरकार इन लोगों पर तो कोई कार्यवाही नहीं
करती!
इस तरह के नकारात्मक क़दमों
से देश में भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता है. यदि किसी अधिक वेतन पाने वाले
कर्मचारी से सरकार सब्सिडी हटाएगी तो वह एल.पी.जी. का कनेक्शन कम आय वाले परिवार
के किसी और व्यक्ति के नाम से भी तो ले सकता है. अगर ऐसा हुआ तो फिर सरकार क्या कर
लेगी? घरेलू एल.पी.जी. सिलेंडरों के व्यावसायिक उपयोग को तो वह रोक नहीं पाई अब इस
तरह की कवायद करके भी क्या हासिल हो जाएगा? अगर सब्सिडी को नियंत्रित करना ही है
तो घरेलू गैस के उपयोग को वाहनों में प्रतिबंधित करना चाहिए.
स्कूलों में संस्कृत या जर्मन?
आजकल केन्द्रीय
विद्यालयों में संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में पढाने पर एक नया विवाद छिड़ गया
है. अभी कुछ समय पहले तक इसके स्थान पर जर्मन भाषा पढ़ाई जाती थी. यह अत्यंत
आश्चर्यजनक बात है कि हमारे देश में इतनी अधिक संख्या में समृद्ध भाषाएँ होते हुए
भी हम विदेशी भाषाओं के प्रति अपने मोह को दूर नहीं कर पा रहे हैं.
समूचे भारत में तीन
भाषाएँ पढ़ने व सीखने का चलन पहले से ही है. इसके अनुसार स्कूली बच्चों को एक
क्षेत्रीय भाषा के साथ अंग्रेजी तथा हिन्दी का ज्ञान दिया जाता है. एक अंग्रेजी
अखबार में छपे सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय बच्चे संस्कृत के स्थान पर विदेशी भाषा
पढ़ने को ही अहमियत देते हैं. अखबार का कहना है कि ये बच्चों को एक अच्छे रोज़गार की
ओर भी अग्रसर करता है. हम इसे विडम्बना ही कहेंगे कि हमारी सोच कितनी छोटी है?
जर्मन या फ्रेंच भाषा सीख कर कितने लोग रोज़गार पा सकते हैं? मुश्किल से कुछ सौ या
हज़ार व्यक्ति ही इन भाषाओं को सीख कर नौकरी पा सकते हैं. अगर देखा जाए तो हिन्दी
सीखे हुए लाखों और करोड़ों लोगों को आज नौकरी के कहीं बेहतर अवसर मिल रहे हैं.
इन अंग्रेजियत तथा विदेशी
भाषाओं के समर्थकों से कोई आज ये तो पूछे कि जर्मनी व फ्रांस के कितने लोग हिन्दी
सीखना चाहते हैं? शायद कोई भी नहीं. कारण स्पष्ट है, इन्हें अपनी जबान से बढ़ कर
कुछ भी अच्छा नहीं लगता. फ्रांस में तो आप अंग्रेजी में बात नहीं कर सकते. वहाँ
सभी साइन-बोर्ड उनकी अपनी फ्रेंच भाषा में ही पढ़ने को मिलते हैं. हमारे देश के
लोगों को अंग्रेज़ न जाने कौन सी घुट्टी पिला गए हैं, जो ये अब भी अंग्रेजी की
भक्ति और महिमा-मंडन में लगे हुए हैं!
तीसरी भाषा संस्कृत ही सही, कम से कम आप अपने बच्चों को भारतीय भाषा ही तो सिखा रहे
हैं! इसमें बुरा क्या है? फ्रेंच या जर्मन सिखाने से तो अच्छा है आप अपने ही देश
की किसी भाषा को तीसरी भाषा का स्थान दें! क्या हमारे देश में भाषाओं की कमी है?
विदेशी भाषा तो आप स्नातक
अथवा स्नातकोत्तर करने के बाद भी सीख सकते हैं. हम विदेशी भाषा सीखने पर प्रतिबन्ध
लगाने की बात नहीं कर रहे हैं. मेरे विचार में स्वदेश रहते हुए किसी विदेशी भाषा को
तीसरी भाषा का सम्मान देना निंदनीय है.
कोई भी व्यक्ति अगर चाहे तो संस्कृत
भाषा में अपना केरियर बना सकता है. आजकल देश में संस्कृत पढाने वाले अध्यापकों की
काफी माँग है. हमारे प्राचीन धर्म-ग्रन्थ संस्कृत में हैं, जिनकी टीका करके लोग आज अपना नाम कमा रहे हैं. जर्मनी में तो वेदों के संस्कृत
ज्ञान पर लगातार अनुसंधान होता रहा है. प्राचीन आयुर्वेद के हज़ारों नुस्खे संस्कृत
में लिखे हैं, जिन्हें कोई भी व्यक्ति संस्कृत ज्ञान
के बिना नहीं समझ सकता. आधुनिक भाषाओं का अपना महत्व है, परन्तु संस्कृत जैसी प्राचीन एवं समृद्ध भाषा को कमतर बता कर नहीं आंका जा
सकता. हरियाणा के सभी स्कूलों में यह भाषा नियमित रूप से पढ़ाई जा रही है.
विश्वविद्यालयों में संस्कृत का अलग विभाग होता है. विदेशों के विश्वविद्यालयों
में तो संस्कृत की एक अलग से पीठ भी स्थापित की गई है.
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