My expression in words and photography

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

बाल-वाटिका


कक्षा में मेरा प्रथम दिन

जब मैं प्रतिदिन अपने घर की छत से स्कूल जाने वाले बच्चों को देखता था तो मेरा मन भी उनके साथ चलने को होता था. मेरे बार बार कहने पर मुझे सब समझा देते कि अभी मैं छोटा बच्चा हूँ. मैं तो बस चुप करके ही रह जाता था. मैं सोचता था कि स्कूल में बच्चे कैसे पढते होंगे? वहाँ पर बड़े मैदान में खेलने का तो अलग ही मज़ा आता होगा! सुना था कि अध्यापक भी बच्चों को बहुत प्यार करते होंगे. ऐसे ही ढेरों विचार मेरे मन में आते परन्तु मैं कुछ भी नहीं कर सकता था.

आखिर एक दिन मुझे बताया गया कि मैं अब बड़ा हो गया हूँ. मेरी आयु स्कूल में प्रवेश योग्य हो गई थी. मैं अपनी मम्मी तथा पापा जी के साथ कार द्वारा स्कूल पहुँचा. मन में पहली बार स्कूल जाने की खुशी के साथ साथ एक अनजाना डर भी बना हुआ था.  मुझे स्कूल टीचर ने प्रवेश की अनुमति दे दी थी. पापाजी मुझे कक्षा में छोड़ कर जैसे ही जाने लगे मुझे एक दम रोना आ गया. मैं अपने मम्मी पापा से अलग नहीं होना चाहता था. मम्मी जी ने मुझे याद करवाया कि मैं कैसे उन्हें बार-बार स्कूल जाने के लिए कहता था. अब सारा मामला बदल गया था और मुझे अचानक अकेलापन खलने लगा था. तभी स्कूल टीचर ने मुझे अपने पास बुला लिया तथा मम्मी व पापाजी को बाय बाय करने को कहा. मैंने डर के मारे ऐसा ही किया.

टीचर ने मुझे खाने को चोकलेट दी तथा कक्षा में अपने सामने वाली कुर्सी पर बिठा दिया. सभी बच्चों से मेरा परिचय करवाया. मुझे यह सब बड़ा अच्छा लग रहा था तथा अब दो-तीन बच्चों से मेरी अच्छी दोस्ती भी हो गई थी. टीचर ने बड़े प्यार से हमें अंग्रेज़ी व हिन्दी पढाई व हमें लिखने को कहा. दोपहर की छुट्टी होते ही घंटी बज गई. मैंने अपने दो दोस्तों के साथ बैठ कर खाना खाया. इसके बाद हम सब मैदान में खेलने चले गए. खेलने के बाद जैसे ही घंटी बजी हम दुबारा कक्षा में आ गए. अब हमें पढाने के लिए दूसरी टीचर आ गयी थी. हमें बहुत अच्छी बातें बतायी गई. मैं सोच रहा था कि आज का दिन सचमुच बहुत ही अच्छा है.  आज मैंने पहली बार कक्षा में पढ़ाई की तथा दो अच्छे दोस्त भी मिले.  मुझे अपने टीचरों से बहुत अच्छी अच्छी बातें भी सीखने को मिली. जाते समय टीचर ने हमें होम वर्क भी करने को दिया.
मैं कक्षा में बिताए अपने पहले दिन को कभी नहीं भूल पाऊँगा.

सोमवार, 24 सितंबर 2012

“रूपया पेड़ों पर नहीं उगता”


“रूपया पेड़ों पर नहीं उगता” यह शास्वत सत्य है. परन्तु न जाने क्यूं बार-बार यही प्रश्न मस्तिष्क को अंदर तक झकझोर रहा है कि ऐसा क्यूं नहीं होता. काश रुपया पेड़ों पर उगता! कम से कम इनके दोहन के लिए भी सरकार द्वारा बोली वाली प्रक्रिया अपनाई जाती. अगर बोली की बजाय ये पेड़ किसी रसूखदार व्यक्ति या कंपनी को आबंटित होते तो इस पर भी शीर्ष ऑडिट संस्थाएं अपनी नुक्ताचीनी करती. सरकार की देश भर में निंदा होती. न जाने कितने जुलूस व मोर्चों का आयोजन होता. देश भर की राजनीति आखिर यूं ही तो नहीं गहराती है.

अगर देखा जाए तो पेड़ भी तो अपने लिए लवण, खनिज तथा जल भूमिगत स्रोतों से ही प्राप्त करते हैं. भूमिगत खनिज सम्पदा राष्ट्रीय सम्पति है, जिसका दोहन सरकार की आज्ञा के बिना हो ही नहीं सकता. वैसे भी आजकल जल को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने की मांग उठने लगी है. अगर रूपए पेड़ों पर ही उगते तो इनके बीजों का वितरण सरकार ही करती. इसके लिए आवश्यक उर्वरकों का आयात विदेशों से किया जाता. आखिर रुपये छापने के लिए भी तो बेहतरीन आयातित कागज़ की आवश्यकता जो पड़ती है! बढ़िया रुपयों की पैदावार के लिए हर वस्तु उच्च गुणवत्ता की ही लगाई जाती है.

‘रुपये के पेड़ों’ की खेती नियंत्रित करने के लिए एक मलाईदार मंत्रालय भी स्थापित किया जाता. इस मंत्रालय को पाने के लिए नेताओं में अच्छी खासी होड़ लग जाती. बढ़िया नस्ल के ‘कुबेर’ पेड़ों के बीज भी विदेशों से मंगवाए जाते. इनके बीजों के चुनाव के लिए हमारे मंत्री सरकारी खर्चे पर विदेशों का दौरा करते. वहाँ से ‘रूपए’ की खेती के लिए आधुनिक तकनीकी हमारे देश में लाई जाती. हो सकता है कि ‘रुपयों की खेती’ के लिए अन्य देशों के साथ संयुक्त उपक्रम भी स्थापित किए जाते. कुल मिलाकर यह निश्चित है कि इस खेती पर हमारे बज़ट का एक बहुत बड़ा भाग व्यय किया जाता.

‘रूपए के पेड़ों’ की खेती के लिए लाइसेंस लेना आवश्यक हो जाता. इसकी फसल के लिए समर्थन मूल्य घोषित करने की तो आवश्यकता ही न रहती. हो सकता है देश में खाद्यान्नों के दाम बहुत अधिक बढ़ जाते. क्योंकि रुपये के पेड़ उगाने वाले आखिर अनाज या सब्जियां क्यों उगाएंगे! अगर ‘रूपए’ की भरपूर खेती होने लगे तो बैंकों का कामकाज बढ़ जाता. किसान क़र्ज़ लेने की बजाय क़र्ज़ देने लगते. किसान सरकार से कोई माफी की मांग नहीं करते, उल्टा सरकार किसानों को अपना क़र्ज़ माफ करने के लिए कहती रहती. ‘कुबेर’ पेड़ों की खेती का अर्थ यह नहीं कि लोग गरीबी रेखा के नीचे नहीं हो सकते. गरीबी रेखा तो अवश्य रहेगी परन्तु काफी अधिक रूपए रखने वाले लोग भी इस रेखा के नीचे आ जाते. अर्थात रूपए अगर पेड़ों पर लगने लगें तो भी कुछ लोग गरीबी रेखा के नीचे रहेंगे ही!

अगर रूपया पेड़ों पर लगने लगे तो लोग फिर भी इन्कम टैक्स चुकाने में दकियानूसी दिखाएंगे. अपनी पैदावार कम बताएंगे. रूपया बैंक में डालने की बजाए स्विस बैंकों में रखेगे. आजकल एक हज़ार से कुछ लाख रुपयों की रिश्वत से फिर भी कोई काम हो जाता है. रूपया पेड़ों पर लगने के कारण संभव है कि अपना कार्य सिद्ध करने के लिए शायद करोड़ रुपयों की रिश्वत भी कम पड़ने लगे. लोग अस्पताल में अपने मरीजों के लिए दवाई तो खरीद पाएंगे मगर हो सकता है जिंदगी पहले से अधिक सस्ती हो जाए. संभवतः सब लोग गाड़ियों में घूमने लगे और सड़क पर यातायात नियंत्रण की समस्या पैदा हो जाए. दुर्घटनाएं बढ़ने से मनुष्य का जीवन नर्क बन सकता है.

पेड़ों पर रूपए उगने से इच्छाएं तो बढ़ती हैं परन्तु संतोष की प्राप्ति नहीं होती. हे ईश्वर! तेरा लाख लाख शुक्र है कि तूने रुपयों को पेड़ों पर नही उगाया. अगर रूपए पेड़ों पर उगते तो शायद लोग तुझे भी खरीद लेते. दुनिया से तेरा डर ही समाप्त हो जाता. कम से कम लोग अब यह तो स्वीकार करते ही हैं कि रूपया सब कुछ नही होता. फिर भी हम आज इस सदमे से दो-चार हैं कि रूपया पेड़ों पर नहीं उगता. इसके पीछे भी एक दर्द छुपा है. एक कड़वाहट है, टीज़ सी उठती है. एक शिकायत है कि रूपया पेड़ों पर क्यों नहीं लगता.

कुछ ऐसे बुद्धिमान लोग भी हैं जो रूपया शायद अपनी हथेली पर उगाना बखूबी जानते हैं. यह बात अलग है कि ऐसा करने के लिए आपको अत्यंत पोषक राजनीति-युक्त मौसम के साथ साथ कोयले की खाद, रिश्वत का पानी, टू जी के विटामिन, और ढेरों प्रकार की अन्य आवश्यक सामग्री की ज़रूरत पड़ेगी जो शायद बहुत कम लोगों को ही मयस्सर होती है. परन्तु जिनके पास ये सामग्री है वही लोग बार बार यह बात कहते हैं कि “रूपया पेड़ों पर नहीं उगता”.

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

परोपकार


जब मैंने
मखमली घास के
तिनकों से पूछा
कैसा लगता है तुम्हें
जब लोग
तुमको रौंद कर
दूर चले जाते हैं...
कष्ट तो होता होगा न
तो आवाज आई
बिलकुल नहीं
मेरे ऊपर पड़ने वाले
हर पाँव को
मैं सुकून देता हूँ
जिससे इतनी
खुशी होती है कि
मैं अपना दर्द
भूल जाता हूँ

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

तीन क्षणिकाएं

यथार्थ
दुनिया सिंधु महान्
मानव बूँद समान.

आम
आम
आजकल नहीं रहा आम
क्योंकि
खास लोग ही
अब खाते हैं
आम.

कल और आज
कल तक
माँ-बाप ही थे
दौलत
आज
दौलत हो गई है
माँ-बाप.

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

कल आज और कल

लोग समझते हैं कि
बुजुर्गों की सोच अलग है
उनकी अपनी सोच से
दोनों में फासला है
एक पीढ़ी का
शायद इसीलिए
अपने बुजुर्गों का
वे आदर नहीं करते.

न जाने वही बुजुर्ग
मुझे इतने अच्छे
क्यूं लगते हैं?
इनकी किसी भी बात पर
गुस्सा नहीं आता.
अनायास ही मैं कल
एक बुजुर्ग से टकरा गया.
हालांकि गलती उनकी थी
फिर भी कुछ न कह पाया
बस मुस्कुरा कर रह गया.

शाम को देखा पार्क में फिर
दो बुजुर्गों को बतियाते हुए
सुना रहे थे शायद
अपनी कथा-व्यथा
एक दूसरे को.
हल्की सी मुस्कान दौड गई
मेरे चेहरे पर
जब मैंने बड़ी हसरत से
देखा एक टक
उन दोनों की ओर क्योंकि
चलता नहीं किसी का
यहाँ वृद्धावस्था पर जोर.

सुबह सुबह देखा मैंने
फिर एक बुजुर्ग को
छोटे से बच्चे के साथ
घास पर टहलते हुए.
मन ही मन
खुश हो रहा था मैं
क्योंकि वर्तमान ने
देख लिया था आज
अपना बीता हुआ कल
और आने वाला कल !

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

“रौशनी महकती है”

जनाब सत्य प्रकाश शर्मा का “रौशनी महकती है” गज़ल संकलन, जो हाल ही में छपा है, कई मायनों में नायाब है. ये सबसे मुख्तलिफ नज़र आता है. खासतौर पर छोटी बह्र की ग़ज़लों को बड़ी खूबसूरती से लिखा गया है. गज़लों में रवानी देखते ही बनती है. हर तरह के मज़मून पर आपने अपनी बात कही है. यकीनन ये किताब आपकी शख्सियत की भरपूर नुमायन्दगी करने में कामयाब हुई है, ऐसा मेरा विश्वास है. मुकम्मल किताब निहायत ही दिलचस्प और सहेजने के काबिल है.
वर्तमान अव्यवस्था पर आपने कुछ ऐसे कटाक्ष किया है-
वो जो महफूज़ खुद ही नहीं
वो हमारा निगहबान है.

क्या खूबसूरत शायरी है !

ये सोच के नज़रें वो मिलाता ही नहीं है
आँखें कहीं जज़्बात का इज़हार न कर दें.

कहीं खूबसूरत शिकायत है...

जिसको चाहें उसी से दूर रहें
ये सितम भी अजीब कितने हैं.

बे-मिसाल तस्सवुर है आपका !

रोज लड़ता है आइना मुझसे
क्या बताऊँ ये घर की बातें हैं.

दुनिया की हकीकत है इसमें !

कुछ दिखाने के, कुछ छुपाने के
मुख्तलिफ रंग हैं ज़माने के.

दिलचस्प रवानी है ...

चोट खाते रहे ज़माने से
बाज़ आए न मुस्कुराने से.

कहीं मजाहिया अंदाज़ है आपका !

गाल अपने बजाओ महफ़िल में
क्या करोगे मियाँ मंजीरों का.

तो कहीं ज़मीनी हकीकत बयान की है.

कौडियों की जिन्हें तमीज नहीं
भाव तय कर रहे हैं हीरों का.

ज़हन औ’ दिल की कशमकश है ..

लाख कहता हूँ कि धोखे खाएगा
दिल ये कहता है कि देखा जाएगा.

कमाल का फलसफा है !

बात करने लगा वफाओं की
यानि वो फिर मुझे दगा देगा.

शायरी जो मौजूदा दौर से ताल्लुक रखती है-

तस्वीर का रुख एक नहीं दूसरा भी है
खैरात जो देता है वही लूटता भी है.

निहायत साफगोई है जनाब इसमें !

अगर झूठ बोलूँ तो खुशियों से खेलूँ
मगर क्या करूँ मेरी आदत नहीं है.

गज़ब की नसीहत है इसमें !

पास जा कर पढ़ो ज़माने को
तुमने पढ़ कर किताब देखा है.

सबकी तारीफ़ है इसमें-

ऐब मुझमें भी कम नहीं होंगे
मैं भी इंसान ही तो हूँ आखिर.

वजा फरमाया है आपने !

सब पे होती नहीं अता उसकी
वरना हर कोई शायरी कर ले.

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

लफ्ज़

ये न सूझें तो
ठहर सी जाती है
मेरी नब्ज़
इनके आने से
महकती है
मेरी जिंदगी
ये ही तो बोलते हैं
मेरे भीतर
इनके बगैर
किस काम का
ये बेजुबान शख्स
सोचता हूँ जब भी
कोई बात मैं
तो उभरते हैं जेहन में
न जाने कितने अक्स
झांकता हूँ जब भी
मैं अपने माजी में
दीखते हैं हर सूं
ये जज्बाती लफ्ज़
न लिखूं तो
बेचैन करते हैं
लिखने ही से तो
दिल को करार आता है
लफ़्ज़ों की तखलीक से
हाले-दिल बयाँ होता है
लफ्ज़ देते हैं दस्तक
जब मेरे माज़ी को
तो राहे-मुस्तकबिल का
खाका तैयार होता है
लफ्ज़ तय करते हैं
लंबी दूरियां
दो दिलों को
ये करीब लाते हैं
लफ्जों में छुपा है
एक अहसासे-मोहब्बत
जो टूटे दिलों को भी
जोड़ देता है
लफ्जों की कारीगरी
का कोई जवाब नहीं
इन से
हर शय है खूबसूरत
और बेमिसाल
अहले-दुनिया में !

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

सुकून

मैंने देखा है
सुकूं की तलाश में
भटकते हुए
लोगों को
न जाने कहाँ कहाँ
अपनी हसरतों को
पूरा करके
समझ लेते हैं
कि उन्हें
मिल गया है
सुकून
वो शायद
सही नहीं हैं
बहुत कुछ
चाहते हैं लोग
अपनी जिंदगी से
लेकिन अंतहीन
चाहतों की
इस दौड़ में ही
खत्म हो जाती है
ये जिंदगी
फिर भी
नहीं मिलता
उनको सुकून
क्योंकि
सुकूं तो
उसमें है जो
अपने पास है
और जो
अपना ही नहीं है
उसे हासिल करके भी
भला कैसे
मिल पायेगा
सुकून?
























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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

एक और मंच

अपनी बात कहने का
दूसरों की बात सुनने का.
अपनी बोली के माध्यम से
एक दूसरे को जानने समझने
के बाद अपनी अभिव्यक्ति हेतु
पेश है आप के लिए एक और मंच...

यदि हम पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करते हैं तो सदैव एक बात याद रखनी चाहिए कि सूरज ने जब भी पश्चिम की ओर रुख किया वह डूब गया.

असहिष्णुता
किसी को अपनी बात न कहने देना अथवा दूसरों की अभिव्यक्ति को असंवैधानिक ढंग से लगाम देना आज बढ़ती हुई असहिष्णुता का ही प्रतीक है. लोग दूसरों की बोलती बंद करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं, जो किसी भी प्रकार से उचित नही है. जीवन कोई एक या दो पल का नही होता अपितु वर्षों की लंबी अवधि से बनता है. फिर हम किसी एक पल में यह कैसे स्वीकार कर लेते हैं कि अब सब कुछ खत्म हो गया है? जबकि यह शाश्वत सत्य है कि जीवन में सबसे अच्छा समय अभी आने वाला है. अगर कुछ बुरा हो रहा है तो यह भी सत्य है कि उससे भी बुरा वक्त आ सकता है. ऎसी परिस्थितियों में हमें विवेक एवं संयम से काम लेने की आवश्यकता पड़ती है. मनुष्य जीवन की अपनी मर्यादाएं हैं जिनका सम्मान किया जाना अति आवश्यक है.

सफल जीवन जीने के लिए अपना व्यवहार सर्वोपरि होता है. अगर आपका बर्ताव अच्छा है तो लोग सर-आँखों पर बिठाते हैं. अक्सर कहा भी जाता है कि ‘बा अदब बा-नसीब, बे-अदब बे-नसीब’ अर्थात जो लोग दूसरों की इज्ज़त नहीं करते, भाग्य भी उनका साथ नहीं देता. जो गाली हमें स्वयं के लिए अच्छी नहीं लगती वह हम दूसरों को कैसे देने की सोच लेते है...यह समझ से परे है. ये सभी बातें परिवार, समाज, प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर पर भी समान रूप से विचारणीय हैं. अभी हाल ही में अखबारों से पता चला कि अमुक स्थान पर किसी ने एक संभावित वक्ता की ओर जूता उछाल दिया ताकि वह अपनी बात दूसरों के सामने न रख सके. यह अत्यंत हास्यास्पद लगता है. जूता उछाल कर तो उस वक्ता की बात को और भी ज्यादा प्रचार माध्यमों का लाभ मिल गया कि ऎसी कौन सी बात है जो वह कहना चाह रहा था. जबकि जूता उछालने वाले व्यक्ति को सब ने भला-बुरा ही कहा. अपना विरोध प्रकट करने के अनेक लोकतांत्रिक ढंग हो सकते हैं. जब आपको किसी की बात स्वीकार्य न हो तो आप चुपचाप वह स्थान छोड़ कर भी जा सकते हैं. ऐसा करने से वक्ता को स्वतः मालूम हो जाएगा कि श्रोता उसकी बात से सहमति नहीं रखते. यह सभी जानते हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है. अगर कोई इस मुद्दे के विरोध में कुछ बोलता है तो इससे क्या फर्क पड़ता है? क्या एक व्यक्ति के बोलने या न बोलने पर ही कश्मीर का भविष्य टिका है? हरगिज़ नहीं. फिर इस पर बे-वजह बवाल क्यों? हमारी संस्कृति एवं अनमोल विरासत हमें सदा शान्ति व सहिष्णुता का सन्देश देती आई है. हमारे देश के महान संतों-विचारकों का भी यही मत रहा है कि आपसी प्रेम और भाईचारे का कोई विकल्प नही है. कहा जाता है “मोहब्बत का सफर, कदम दर कदम और नफरत का सफर एक या दो कदम” क्योंकि नफरत के साथ चंद कदम चल कर आप भी थक जाएँगे और हम भी. मोहब्बत का सफर बहुत लंबा और सुहावना होता है जिसमें थकावट की तो कोई गुंजायश ही नही है. पठानकोट के एक अज़ीम शायर जनाब राजेंद्र नाथ ‘रहबर’ ने अपने अश'आर में कुछ यूं कहा है-

मोहब्बत चार दिन की है अदावत चार दिन की है
ज़माने की हकीकत दर हकीकत चार दिन की है
बनाए हैं मकां अहबाब ने लाखों की लागत से
मगर उनमें ठहरने की इजाज़त चार दिन की है.


हमारे देश में अनेकों ज्वलंत समस्याएँ मुंह बाए खडी हैं जिनका समाधान होना ज़रूरी है. हम छोटी छोटी बातों पर अपना विरोध दर्ज करने से बिलकुल भी नहीं झिझकते किन्तु जहां विरोध अपरिहार्य हो वहाँ खामोश बैठे रहते हैं. आज भ्रष्टाचार से हर कोई त्रस्त है. हम सब चाहते हैं कि यथा शीघ्र इस दानव से मुक्ति मिले. परन्तु यह भी कटु सत्य है कि हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग अपने अल्प-कालिक हित साधने के लिए इस दानव की धन-धान्य से सेवा करता रहता है. महात्मा गांधी ने कहा था कि “पाप से घृणा करो, पापी से नहीं”. अतः आज केवल एक या दो भ्रष्टाचारी व्यक्तियों को मार देने से काम नहीं चलेगा अपितु भ्रष्टाचार का ही समूल नाश करने की आवश्यकता है. इन सभी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष से अच्छा कोई अन्य विकल्प नहीं हो सकता. एक सभ्य समाज में शांति एवं सहिष्णुता ही ऐसे हथियार हैं जिन्हें इस धरती पर वर्षों से सफलतापूर्वक आजमाया गया है तथा ये हर बार विजयी होकर सामने आए हैं.

सोमवार, 26 सितंबर 2011

सब का सपना

सब का सपना

यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है
जब होगा सब के पास
रोटी कपडा और मकान
जियो और जीने दो पर
नहीं उठेगा कोई सवाल
जैसा अधिकार होगा
वैसा ही कर्तव्य अपना है.
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है.

जब ना लड़ेगा कोई
धर्म या जाति के नाम पर
होगा आदर मानवता का
समानता के आधार पर
वसुधैव कुटुम्बकम की
प्रथा को साकार करना है.
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है.

नहीं बंटेगी जब धरती
अलग देशों के नाम से
बनेंगे नागरिक सारे
धरा के अपने आप से
समूची दुनिया को एक
शांतिप्रिय स्थल बनना है.
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है.
























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शनिवार, 27 अगस्त 2011

अन्ना

अन्ना
बहुत कठिन है अन्ना बनना
देश की खातिर भूखे रहना.

स्वजन को सम्मान दिलाने
भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने
सबसे मिलकर आगे बढ़ना
बहुत कठिन है अन्ना बनना
देश की खातिर भूखे रहना.

बापू ने देश आज़ाद कराया
लोगों को स्वराज दिलाया
फिर भी अधूरा उनका सपना
बहुत कठिन है अन्ना बनना
देश की खातिर भूखे रहना.

अहिंसा के पथ पर आगे बढ़ना
स्वच्छ प्रशासन सबका सपना
‘जन-लोकपाल’ को पारित करना
बहुत कठिन है अन्ना बनना
देश की खातिर भूखे रहना.

आओ हम सब आगे आयें
सोये हुओं को आज जगाएं
नहीं स्वीकार यूं तेरा मरना
बहुत कठिन है अन्ना बनना
देश की खातिर भूखे रहना.