My expression in words and photography

बुधवार, 28 मई 2014

बाज़ार में उपलब्ध खतरनाक पेय उत्पाद


कोका-कोला मानव चयापचय अथवा 'मेटाबोलिज्म' के लिए एक खतरनाक ज़हर की तरह है. इसकी एसिडिटी का स्तर बैटरी में मिलने वाले तेज़ाब के आसपास है. यह कई घरेलू क्लीनरों की तरह सफाई करने के काम में प्रयुक्त किया जा सकता है. तीसरी दुनिया के देशों में इस तरह के पेय पदार्थ शुद्ध पेय जल की तुलना में आसानी से उपलब्ध हैं. इस कोल्ड ड्रिंक को पीने वाले लोगों में ह्रदय एवं श्वास रोग होने की संभावना बहुत अधिक होती है. 

कार्बोराइज्ड ड्रिंक पीने से हड्डियों से केल्शियम की हानि होती है. आप इस कमी को दूर करने के लिए सब्जियां, फल या दूध तो ले सकते हैं परन्तु केल्शियम अवशोषण के लिए केवल इसके स्त्रोत ही पर्याप्त नहीं होते! यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकतर लोग इस प्रकार के पेय पदार्थों के सेवन करने में अपनी शान समझते हैं. यह सब अशिक्षा एवं अज्ञानता के कारण हो रहा है. हमारी सरकार द्वारा ऐसे हानिकारक पेय पदार्थों पर अविलम्ब प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए.

मानव संसाधन मंत्री के स्नातक न होने पर सवाल


कांग्रेस के एक छुटभइया नेता ने एक अटपटा बयान जारी करके एन. डी. ए. के शिक्षा मंत्री की योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि वे स्नातक भी नहीं हैं. यह अत्यंत खेद का विषय है कि देश का शीर्ष राजनैतिक दल अपनी करारी हार के बाद शालीनता की सारी सीमाएं लांघ चुका है और उसके पास कहने को शायद कुछ बचा ही नहीं है. विचारणीय है कि अगर आप अपनी टांग से कपड़ा ऊपर उठाते हैं तो स्वयं ही नंगे हो जाते हो. इन्हें यह सवाल उठाने से पहले यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए? क्या स्नातक व्यक्ति ही शिक्षा मंत्री या प्रधानमंत्री हो सकते हैं? अगर हाँ, तो स्नातक मंत्रियों के होते हुए हमारा शिक्षा का स्तर जस का तस क्यों है?
भूतपूर्व प्रधानमंत्री तो बहुत बड़े आर्थिक विशेषज्ञ थे फिर भारत अपनी विकास दर में कैसे पिछड़ गया? इस शीर्ष दल को बताना होगा कि उनकी तथाकथित राजनीति “नीच राजनीति”  से कैसे भिन्न है जिसका उल्लेख इन्होने चुनाव प्रचार के दौरान किया था? अगर जनता को स्नातक मंत्रियों की आवश्यकता थी तो जनता ने उन्हें क्यों नकार दिया? ज़ाहिर है कांग्रेस के पास इस विषय में अधिक कहने के लिए कुछ भी नहीं है. यह तो खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचने वाली बात ही लगती है. देश के सबसे पुराना दल होने का दावा ठोकने वाली पार्टी को अपना इतिहास पढ़ने की आवश्यकता है. उन्हें देखना चाहिए कि आज तक जिन लोगों को उनहोंने मंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनाया है, उनकी क्या-क्या योग्यता थी? शायद अपने गिरेबान में झाँकने पर ही इन्हें कोई बात समझ में आ पाएगी.

सोमवार, 24 मार्च 2014

व्यक्ति-विशेष बतौर पी.एम. के साइड इफेक्ट


हाल ही में देश के दूसरे सबसे बड़े राजनैतिक दल में टिकटों के बंटवारे को लेकर जो उथल-पुथल मची है, वह थमने का नाम ही नहीं ले रही है. जब इस दल के सबसे बड़े नेता का नाम गुजरात की सूची में नहीं आया तो उसने भोपाल से चुनाव लड़ने की सोच ली. विवाद को बढ़ता देख उसे गांधी नगर सीट से उम्मीदवार बनाया गया. कुछ लोगों ने इन्हें अत्याधिक महत्वाकांक्षी कहा, तो कुछ ने पद का लोभी बताया. कुछ लोगों की राय थी कि इनको अब सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए था क्योंकि काफी उम्र हो गई है! यह निश्चय ही विचारणीय बात है कि क्या राजनीति में सेवा-निवृत्ति की आयु नहीं होनी चाहिए? क्या अधिक बुढापे में व्यक्ति कुछ अधिक मोह-माया का शिकार नहीं होता? क्या उसकी सोच और कार्य-शक्ति अस्सी वर्ष के बाद भी उतनी ऊर्जावान हो सकती है? शायद आने वाला समय ही इन प्रश्नों का उत्तर दे सके.
      राजस्थान से एक वरिष्ठ सांसद को जब बाड़मेर से टिकट नहीं मिला तो उसने भी अपना विरोध-स्वर मुखर कर दिया. यहाँ के ही एक अन्य सांसद को भी टिकट के लिए मना कर दिया गया जो अब स्वतंत्र उम्मेदवार के रूप में चुनाव लड़ रहा है. यही हाल गुजरात के सात बार सांसद रहे श्री हरिन पाठक के साथ हुआ. आप सहज ही अनुमान लगा सकते है कि ऐसा व्यक्ति अपने क्षेत्र के लोगों के बीच कितना लोकप्रिय होगा? उधर बिहार में भी एक सांसद लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए बी.जे.पी. का टिकट नहीं पा सका. इस सारे घटनाक्रम में जो बात सामने आती है वह ये है कि ये सभी लोग तो गलत नहीं हो सकते. जाहिर है पार्टी ने अवश्य ही इनके साथ दुर्व्यवहार किया है. मामला किसी व्यक्ति को टिकट देने या न देने का नहीं है परन्तु पार्टी ने इन सभी क्षेत्रों में जन-भावना की अनदेखी भी की है. क्या ये एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने का साइड-इफेक्ट है? लगता तो कुछ ऐसा ही है.
      पहले पार्टी के शीर्ष नेता का पत्ता काटने की कोशिश, फिर उसके वफादार सांसदों एवं नेताओं की बारी. पार्टी किस हद तक आगे जाएगी कहा नहीं जा सकता. हमारे देश में अपने बड़ों का सम्मान करने की गौरवशाली परम्परा है. लगता है बी.जे.पी. के क्षत्रप यह सब भूल चुके हैं. बरसों से इन्हें सत्ता न मिल पाने की कुंठा तो समझ में आती है परन्तु इसके लिए इतना भी लालायित नहीं होना चाहिए कि अपने आदर्शों, परम्परागत मूल्यों और सिद्धांतों से समझौता करना पड़े! आजकल एक के बाद एक कई लोंग अन्य पार्टियों से बी.जे.पी. में दस्तक देने लगे हैं. इन सब को अपने दल में शामिल करने पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए परन्तु अगर आप अपने दल के लोगों की मेहनत का इनाम इन नए लोगों में बांटने लगेंगे, तो ये कब तक चुप बैठेंगे? जाहिर है कोई तो आवाज़ उठाएगा ही. मेरे विचार में सभी को जुल्म और बे-इंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए, चाहे वह अपने परिवार में ही क्यों न हो!
      अब कुछ नेता रक्षात्मक मुद्रा में आकर कहने लगे हैं कि हम वरिष्ठ नेताओं को ‘एडजस्ट’ नहीं कर पाए. ‘एडजस्ट’ तो उसे किया जाता है जो बाद में आता है और बाहर से आता है. जो पहले से ही अंदर है उसे ‘एडजस्ट’ करने की क्या आवश्यकता है? हाँ, किसे ‘एडजस्ट’ करना है या नहीं करना है, ये विशेषाधिकार तो पहले से ही पार्टी के लिए काम करने वालों के पास होना चाहिए. अब सवाल ये है कि क्या इन टिकट-विहीन व्यक्तियों को चुनाव लड़ना चाहिए? हम सब की इच्छा है कि इन्हें अवश्य ही चुनाव लड़ना चाहिए. जीत या हार कोई मायने नहीं रखती परन्तु पार्टी को अपने इस दुस्साहस के लिए ‘सीख’ अवश्य ही देनी चाहिए. पार्टी कर्मठ सदस्यों से बनी है. अगर इन सदस्यों की न सुनी जाए तो इन्हें भी पार्टी पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है.

      इस सारे घटनाक्रम से भी अगर बी.जे.पी. को ‘सीख’ न मिली तो वह निश्चय ही अपनी जीती हुई बाजी हार जाएगी. घमंड का सर हमेशा नीचा होता है. लोगों में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि ऐसे लोगों को उठा कर ही बाहर फैंक दें! अगर आपके मित्रों की सूची में आपका कोई विरोधी नहीं है तो यह आपके लिए खतरे की घंटी है. बाहर से घात करने वालों से तो आप सावधान रहते ही हैं, परन्तु सबसे अधिक ख़तरा तो भीतर-घात से होता है. ऐसे में आपके विरोधी आपके लिए बहुपयोगी सिद्ध हो सकते हैं. अगर आप अपनी जय-जयकार करने वाले लोगों से हर-दम घिरे रहेंगे, तो भी यह कोई अच्छा लक्षण नहीं है. सम्भव है आप एक दिन अत्यंत घमंडी और निष्ठुर हो जाएँ! एक अच्छे राजनेता को अपने मित्रों तथा विरोधियों दोनों की ही बात सुन् कर आचरण करना चाहिए. अन्यथा जिस लोकप्रियता के कारण वह शिखर पर पहुंचा है उसी के नकारात्मक प्रभाव द्वारा नीचे भी गिर सकता है.

गुरुवार, 20 मार्च 2014

अभी रास्ते में हूँ !


कहता है आ रहा हूँ
अभी रास्ते में हूँ!
बिस्तर पर लेटा है
नींद में खोया है
जी भर के सोया है
“थोडा और सो लेता हूँ”
इतने में घंटी बजती है
हेलो, आ रहा हूँ मैं
अभी रास्ते में हूँ!
घड़ी में दस बज गए
दफ्तर में देर हो गई
जल्दी से तैयार होना है
अभी नाश्ता भी करना है
अचानक घंटी बजती है
“ऑफिस नहीं आ रहे क्या?”
“बोला आ ही तो रहा हूँ
अभी रास्ते में हूँ!”
जल्दी में शेव नहीं की
रास्ते में हेयर ड्रेसर था
सोचा शेव करवा लेता हूँ
थोड़ी देर ही तो लगेगी
तभी घंटी बजने लगी
“हेलो, एक जरूरी काम है
कहाँ पर मिलेंगे आप?”
“एक जरूरी मीटिंग में हूँ
बाद में बात करता हूँ!”
ये मोबाइल भी बेकार है
काम करने ही नहीं देता
जब देखो बज उठता है
कुछ तो कहना ही पडेगा
“हर बार झूठ बोलता हूँ”
आपको क्या जल्दी है?
“मैं जल्दी आ रहा हूँ
हेलो, अभी रास्ते में हूँ!”

स्वार्थी संसार- एक लघु कथा


वह फर्श पर लेटा हुआ था, न जाने उसके चारों ओर इतनी भीड़ क्यों जमा थी? कोई कह रहा था बड़ा भला आदमी था, तो कोई कह रहा था कि परिवार को ऐसे ही बीच मंझधार में छोड़ गया. किसी ने कहा कि इनके रिश्तेदारों आदि को खबर कर दो ताकि अंतिम संस्कार समय से हो सके! सभी लोग अपने-अपने ढंग से बात कह रहे थे. तभी उसकी पत्नी और बच्चे रोते-बिलखते हुए उधर आए और वातावरण में मातम छा गया. पत्नी ने कहा, “गुडिया बड़ी हो रही है, अब इसकी शादी कौन करेगा?” बेटे को भी अपनी फिक्र सता रही थी. वह रोते-रोते कह रहा था कि अब मैं विदेश जा कर अपनी शिक्षा कैसे जारी रख पाऊँगा? उसकी पत्नी के परिजनों को अपनी बेटी की भावी जिंदगी की फिक्र सता रही थी. उनकी चिंता थी कि अब इस घर का खर्च कौन उठाएगा? वह सबकी बातें सुन पा रहा था और चिंतामग्न था कि मैं तो सोचता था कि मेरे परिवार को मुझसे बेहद प्यार है, लेकिन यहाँ तो माजरा ही कुछ अलग था. सब अपने-अपने सुखों के लिए रो रहे थे! परिवार के किसी भी सदस्य को उससे वास्तविक प्रेम नहीं था.
उसने जिस परिवार के भरण-पोषण के लिए जीवन-भर मेहनत की थी, वह अपने सुखों को ही याद कर रहा था. उन सब को केवल यह चिंता थी कि अब हमें सुख कहाँ से व कैसे प्राप्त होगा? संसार की सारी वास्तविकता उसके सामने आ चुकी थी. इतने में उसने करवट बदली और वह उठ बैठा. सम्पूर्ण घटनाक्रम को याद करते ही उसने स्वयं से कहा...तो ये सपना था!

सपने में उसे जीवन की वास्तविकता का कटु अनुभव हो गया था. वह मन ही मन सोचने लगा कि अच्छा होता अगर ईश्वर उसे सचमुच ही अपने पास बुला लेता. कम से कम इस स्वार्थी संसार से तो उसको पीछा छूट जाता! –डा. अश्विनी रॉय, एन. डी. आर. आई. करनाल.

ये ‘आप’ की कैसी राजनीति?


पहले ‘आप’ ने दिल्ली सरकार की निंदा व लोगों से अनेकों झूठे वायदे करके येन-केन-प्रकारेण अपनी सरकार बना ली. जब आप से कुछ काम हो नहीं पाया तो सत्ता छोड़ कर लोकसभा चुनाव की तैयारी करने लगे. आप के पास अपना तो कोई ऐसा गुण नहीं है कि लोग आप को वोट दें. शायद इसीलिए  आजकल आप स्वयं को छोड़ कर लगभग सभी की निंदा करने में लगे हैं. यह चिंतनीय है कि क्या भारतवर्ष में सभी बे-ईमान हैं और केवल आप ही ईमानदार हैं?
जब आपके क़ानून मंत्री पर अंगुलियां उठी तो आप खामोश रहे. अब आप विभिन्न दलों से प्रश्न पूछ कर उत्तर की अपेक्षा किस मुंह से कर रहे हैं? आपने बार-बार पूछा है कि दूसरे सबसे बड़े दल को एक उद्योगपति ने कितने रुपयों के बदले अपना हेलिकोप्टर दिया है? परन्तु आपने दिल्ली के लोगों को ये कभी नहीं बताया कि आपने सबसे बड़े दल से समर्थन पाने के लिए उन्हें कितनी रकम चुकाई थी? आपने दिल्ली-वासियों के लिए क्या काम किया है?
क्या आपने अपने वायदे पूरे किए? अगर नहीं तो क्यों? आपकी सरकार थी फिर भी आपने कोई काम नहीं किया. सरकार से बाहर रहते हे भी अन्यों पर दोषारोपण किया और सरकार छोड़ कर भी. क्या आप दूध से धुले हैं? आप स्वयं को अन्य दलों से भिन्न बताते हैं. लेकिन आपकी सोच सबसे अधिक घटिया है. आप जन समर्थन के लिए देश में सबको बुरा बता रहे हैं जबकि आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप लोगों को अपनी खूबियाँ बताएं. वोट अच्छाइयों के लिए मिलता है, बुराइयों के लिए नहीं. हमें लगता है आपके पास कोई कार्यक्रम या विज़न नहीं है.
‘आप’ दिन-रात अन्य दलों को अपशब्द बोल कर वोट प्राप्त करना चाहते हो. आजकल ‘आप’ ने एक नया शगूफा छोड़ा है कि आपके नेता दूसरे बड़े दल के प्रधान-मंत्री पद के दावेदार के विरुद्ध चुनाव लड़ने जा रहे हैं. क्या ‘आप’ में इतनी नैतिकता है कि चुनाव हारने पर ये गंदी राजनीति छोड़ देंगे? अन्य सभी दल भी एक दूसरे की आलोचना में लगे हैं.
ये सोचने वाली बात है कि अगर एक दल ने कुछ बुरा किया तो क्या ‘आप’ को भी बुरा करने का अधिकार मिल गया? अगर नहीं, तो ‘आप’ अन्य दलों से भिन्न कैसे हुए? क्या ‘आप’ चुनाव में आम आदमी को टिकट दे रहे हैं? दूसरों पर उंगली उठाने वालों को अपने गिरेबान में जरूर झांकना चाहिए.

‘आप’ के दल में अति-शिक्षित व्यक्तियों के होने के बावजूद किसी में भी दूसरों के प्रति आदर या स्नेह कहीं दिखाई नहीं पड़ता. क्या ‘आप’ को घमंड हो गया है? धैर्य रखिए, चुनाव अधिक दूर नहीं है. आपकी पोल खुलते देर नहीं लगेगी!

चाय पर बवाल कैसा?


अभी हाल ही में चुनाव आयोग ने एक राजनैतिक दल द्वारा लोगों को चाय पिलाने के मामले को गंभीरता से लेते हुए इस पर एतराज़ किया है. वर्षों से भारतीय संस्कृति में निहित है कि-
आओ, बैठो, पियो पानी
तीनों चीजें मोल न आनी!

शायद आयोग यह भी भूल गया है कि चाय और पानी हमारे देश में सामान्य शिष्टाचार के अंतर्गत ही आते हैं. आजकल पानी का एक कप भी तीन रूपए का आता है, तो क्या इसके लिए भी लोगों को बिल चुकाना होगा? पिछले कई वर्षों से आज तक सभी दल अपने कार्य-कर्ताओं को चाय और पानी बिना किसी आग्रह के पिलाते आए हैं. अगर हमारे देश का कोई उम्मीदवार पहले चाय का काम करता था तो इसका अर्थ यह तो नहीं कि हम अपना सामान्य शिष्टाचार ही भूल जाएँ? क्या चुनाव आयोग लोगों से तू या तुम कह कर केवल इसलिए बात करने लगेगा कि ‘आप’ कहने से किसी दल का प्रचार होता है? क्या आयोग के सदस्य अपने यहाँ आए व्यक्ति से चाय के लिए रूपए लेते हैं? चाय पिलाने को रिश्वत कैसे समझा जा सकता है? सरकारी दफ्तरों में, निजी कंपनियों में, कारखानों में अफसर, मजदूर और अन्य सभी लोग दिन-रात चाय पीते हैं. क्या सबको चाय पीनी और पिलानी बंद कर देनी चाहिए? क्या सभी राजनैतिक दल के लोग अब चाय नहीं पिएंगे? तो फिर इस दकियानूसी का क्या अर्थ है? कहीं सारे देश में चाय को प्रतिबंधित करने का इरादा तो नहीं? क्या सामान्य शिष्टाचार भी चुनाव संहिता का निरादर कर सकता है? अगर नहीं, तो ये हो-हल्ला कैसा? हम तो किसी भी दल के सदस्य नहीं हैं और न ही किसी का समर्थन करते हैं. इस मामले को विशुद्ध शिष्टाचार और भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष में देखा जाना चाहिए. किसी भी दल के कार्यालय में कोई भी व्यक्ति चाय पीता है तो वह इसकी कीमत क्यों दे? यह चुनाव खर्च में भी नहीं आ सकता, क्योंकि लोग उस दल को वोट देने के लालच में चाय नहीं पी रहे. यह तो केवल शिष्टाचार है. अगर आपके घर में जा कर कोई चाय पिलाए तो आप इसे रिश्वत कह सकते हैं. हमारे घर आकर कोई चाय पिएगा तो यह सामान्य शिष्टाचार ही कहलाएगा, कुछ और नहीं!

सोमवार, 6 जनवरी 2014

राजनैतिक दल-दल में आम आदमी


आजकल देश में राजनैतिक दल कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे हैं. हमारे यहाँ स्वयं को तथा-कथित अगड़ों के नेता, पिछडों के नेता, दलितों के नेता, अल्प-संख्यकों के नेता कहने वाले तो पहले से ही मौजूद थे, अब आम आदमी के नेता भी आ गए हैं! हम तो आज तक यह भी समझ नहीं पाए कि आम आदमी है कौन? क्या टोपी पहनने वाला व्यक्ति ही आम आदमी है? क्या अगडे, पिछड़े, दलित अथवा अल्प-संख्यक आम आदमी नहीं हो सकते? कभी-कभी शक होता है कि क्या हम आम आदमी हैं? तो क्या अपना मत आम आदमी पार्टीको देने वाले ही आम आदमी हो सकते हैं? विभिन्न राजनैतिक दलों से धोखा खाने वाले लोग क्या आम आदमी नहीं हैं? क्या आम आदमी इतना नादान है कि इन सब नेताओं के झूठे बहकावों में आकर ही अपने मताधिकार का प्रयोग करता है? अभी हाल ही में दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुए कुछ नेताओं का मानना है कि केवल ये लोग ही आम आदमी के प्रतिनिधि हैं तथा इनके हितों के संरक्षक हो सकते हैं. तो क्या जिस दल ने इनसे ज्यादा विधान सभा क्षेत्रों में विजय प्राप्त की है, वहाँ पर आम आदमी नहीं थे? क्या दिल्ली की नई सरकार गैर-आम आदमी हलकों में विकास का कोई कार्य नहीं होने देगी? ऐसी ही बहुत सी शंकाएं हम सब के मस्तिष्क में कौंध रही हैं. आइये, देखते हैं कि वर्तमान राजनैतिक दल-दल में आम आदमी की क्या स्थिति है!

आम आदमी को किसी के जीतने या हारने से कोई सरोकार नहीं है. वह तो सिर्फ इतना चाहता है कि जो भी नेता उनसे वोट मांगने आए, कोई झूठे वायदे न करे. लोगों की भलाई के लिए यथासंभव काम करे. प्रदेश में क़ानून एवं व्यवस्था बनी रहे ताकि सब लोग भय-मुक्त हों. सरकार बिना किसी लाग-लपेट अथवा भ्रष्टाचार के सब वर्गों हेतु कार्य करे. आम आदमी किसी एक दल का जर-खरीद गुलाम नहीं है. राजनैतिक दलों में कमोबेश सभी वर्गों के आम आदमी मिलते हैं. आम आदमी का भला चाहने वाले लोग सभी दलों में हो सकते हैं. कोई भी राजनीतिज्ञ स्वयं को आम आदमी का ठेकेदार नहीं कह सकता. आम आदमी की जीवन पद्धति आम तौर पर सबको मालूम होती है क्योंकि ये लोग न तो बंगलों में रह सकते हैं और न ही बड़ी-बड़ी गाडियां खरीद सकते हैं.

ध्यातव्य है कि चुनाव लड़ने से पहले सभी उम्मीदवार आमआदमी कहलाते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद ये खासहो जाते हैं. अब तक दिल्ली के वोटरों ने भी इन तथाकथित आम आदमियों की असलियत देख ली होगी. ऐसा देखा गया है कि- चुनाव से पहले इनकी घोषणा के अनुसार सभी दल भ्रष्ट हैं तथा ये लोग न किसी को समर्थन देंगे और न ही लेंगे. ये लोग लाल बत्ती वाली गाडी व सरकारी बँगला नहीं लेंगे. सरकार बनाते ही भ्रष्ट नेताओं को जेल में डाल देंगे क्योंकि इनके पास सभी के खिलाफ पर्याप्त सबूत तैयार हैं.चुनाव के बाद सरकारी बंगले के लिए हाँ कर दी, लोगों के विरोध के बाद अब ये छोटे घर की तलाश करने लगे हैं. तथाकथित भ्रष्ट दल के विरुद्ध ये लोग विपक्ष से सबूत मांग रहे हैं ताकि उनके विरुद्ध कार्यवाही की जा सके. कार्यवाही तो होती हुई नहीं लग रही है क्योंकि जिन लोगों के विरुद्ध कार्यवाही करनी है उन्हीं के समर्थन पर सरकार टिकी है. यह चिंतन का विषय हो सकता है कि जब अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री बंगलों में रह सकते हैं और बड़ी गाड़ियों में बैठ सकते हैं तो आम आदमी सरकार के प्रतिनिधि ऐसा क्यों नहीं कर सकते! ऐसा इसलिए है कि ‘आप’ ने चुनाव पूर्व आम आदमी से वायदा किया था कि हम बंगलों व लाल बत्ती वाली गाड़ियों का प्रयोग नहीं करेंगे. लाल बत्ती वाली गाड़ी तो कानूनन इस्तेमाल नहीं कर सकते परन्तु ये लोग वी.आई.पी. नंबर की बड़ी गाडियां प्रयोग करने लगे हैं. अब यह ‘आप’ को तय करना है कि क्या यह आम आदमी से चुनाव पूर्व किए गए वायदों का उल्लंघन है?

यह चिंतनीय है कि जिन भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध चुनाव लड़ा, उन्हीं के समर्थन से आपने सरकार बनाई है. आपके ऊंचे आदर्श और ईमान की पोल खुल गई लगती है क्योंकि जिस आम आदमी के वोटों से आपने चुनाव जीता, अब उसी को पूरी तरह भुला दिया है. दिल्ली की जनता ने जिस राजनैतिक दल को सत्ता से बाहर किया था, ‘आप’ ने उसे परोक्ष रूप से अपनी बगल में बैठने की जगह दे दी है ताकि आप उनके विरुद्ध कोई भी निर्णय न ले सकें. यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित रहेगा कि आम आदमी के लिए काम करने वाले किसी पर कोई एहसान नहीं करते और न ही गाहे-बगाहे प्रेस और मीडिया में अपनी सादगी का ढिंढोरा पीटते हैं. देश में इनसे भी बढ़ कर सादगी पसंद एवं ईमानदार नेता हैं, जिन्हें आप सब लोग अच्छी तरह जानते हैं. ऐसे नेताओं का यहाँ उल्लेख करना शायद उचित नहीं होगा क्योंकि ईमानदार लोग भी कमोबेश सभी दलों में हो सकते हैं. फिर ‘आप’ के द्वारा फ़िज़ूल का दिखावा और झूठी शान क्यों? लोगों को इस नए दल से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं थी परन्तु यह राजनैतिक दल भी अन्य दलों की भांति आम आदमी को अपनी दल-दल के अंदर फांसने में कामयाब हो गया है.

अगर देखा जाए तो देश के सभी राजनैतिक दल भ्रष्ट लोगों से समर्थन लेकर सरकार बना रहे हैं जिसमें आपभी शामिल हो गए हैं. अब आम आदमी को आपका कोई भी व्यक्ति ईमानदार अथवा सच्चा नेता दिखाई नहीं देता. अतः उसे चुनाव में केवल उस उम्मीदवार को अपना मत देना है जो उसके हितों की भली-भांति रक्षा कर सके. देश में चुनावी मौसम पांच बरस में एक बार बनता है जबकि आम आदमी रोज नए सपने देखता है. हमारे सत्ता-लोलुप एवं बे-ईमान राजनीतिज्ञों के कारण उनका सपना हर बार टूट जाता है. आम आदमी तो राजनैतिक दल-दल में ही फंस कर रह जाता है जबकि आम आदमियों के तथा-कथित नेता अपने वायदों के खिलाफ बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं तथा बंगलों में निवास करते हैं. पुराने वायदे तो भुला ही दिए, अब आपलोकसभा चुनावों में भी आम आदमी को लुभाने के लिए नए वायदों की बरसात कर सकते हैं. यह तो आम आदमी ही तय करेगा कि इनके वायदे कितने लुभावने हो सकते हैं!

स्पष्टतः सभी दलों के सदस्य ईमानदार या बे-ईमान हो सकते हैं. कोई भी राजनैतिक दल भ्रष्ट या ईमानदार नहीं होता. यह तो उस दल के सदस्यों की ईमानदारी अथवा भ्रष्ट आचरण पर ही निर्भर करता है. जो दल लगातार बे-ईमान एवं भ्रष्ट लोगों को संरक्षण प्रदान करता है वह अपनी छवि खराब कर लेता है. वर्तमान परिस्थितियों में कुछ ऐसा ही परिदृश्य उभर का सामने आ रहा है. प्रायः देखा गया है कि विभिन्न राजनैतिक दल केवल उन्हीं लोगों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट देते हैं जो उन्हें विजय दिला सके. इस प्रक्रिया में आम आदमी का कभी नंबर नहीं आता. आजकल केवल ऊंचे रसूख वाले अथवा अपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग ही चुनाव लड़ सकते हैं क्योंकि इनके पास न केवल बाहुबल होता है, अपितु धन बल भी बहुतायत में मिलता है. यह भी देखा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर स्थानों पर अमीर लोग ही चुनाव जीत सकते हैं. चुनाव में भारी धन राशि खर्च होती है जिसे चुनाव के बाद ये लोग भ्रष्ट तरीकों द्वारा सरकारी खजाने से वापिस लूट लेते हैं.

अब समय आ गया है जब आम आदमी को शिक्षित होना पडेगा ताकि स्वयं को आम आदमी के तथाकथित नेता बताने वाले ये लोग इन्हें गुमराह न कर सकें. इन्हें अपनी वोट का मोल पहचानना पडेगा. नेताओं के झूठे दावों व वायदों पर फिर से विचार करना होगा तथा अपने मत का प्रयोग बड़ी समझदारी से करना होगा. आम आदमी को सोचना चाहिए कि अच्छा या बुरा केवल उम्मीदवार ही होता है उसकी पार्टी नहीं. बुरा व्यक्ति किसी भी परिवार एवं पार्टी में हो सकता है. आवश्यकता इस बात की है कि बुरे व्यक्तियों से समर्थन लेने की बजाय इन्हें तुरंत क़ानून के हवाले किया जाए ताकि बुराई पर अंकुश लग सके. जब सभी दलों से बुरे लोगों का सफाया हो जाएगा तो हमारी राजनीति में ईमानदारी एवं सच्चाई स्वतः दिखाई देगी.

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

क्या बैंकों को ए.टी.एम. सुरक्षा शुल्क वसूलने का हक़ है?


बैंकों द्वारा प्रस्ताविक ए.टी.एम. सुरक्षा शुल्क की वसूली किसी भी प्रकार से जायज़ नहीं ठहराई जा सकती. ऐसा प्रतीत होता है कि इस मुद्दे पर सरकार भी अधिक गंभीर नहीं है. सम्भव है सरकार को जनता से अधिक कर वसूली करने के लिए देश में कुछ अधिक ही उर्वरा ज़मीन बनती दिखाई दे रही है. क्या यह बैंक और सरकार के असफल हो रहे कार्य-कलापों की एक जीती-जागती मिसाल नहीं है? जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों रूपए हड़प लेने के बाद भी किसी देश की सरकार अपने नागरिकों को बुनियादी सुरक्षा ही न उपलब्ध करा पाए तो ऐसी सरकार का औचित्य ही क्या है?
अगर सरकार ने प्रस्तावित शुल्क वसूलना शुरू कर दिया तो क्या वह लोगों से पुलिस शुल्क की भी माँग करेगी? क्योंकि हर जिला मुख्यालय में जनता की सेवा एवं सुरक्षा हेतु पुलिस तैनात है. हमें कोई हैरानी नहीं होगी कि एक दिन ये सरकार सीमावर्ती जिलों में रहने वालों से सीमा सुरक्षा शुल्क की भी माँग करने लगे. फिर तो रेलें भी जेब-कतरों व लुटेरों से आपको सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा शुल्क की माँग रख सकती हैं. सम्भव है कि बैंक भी आपसे कहने लगें कि वे आपका पैसा बैंक में सुरक्षित रखते हैं, जिसपर बैंक धन खर्च कर रहा है. इसलिए आप हमसे व्याज की माँग नहीं कर सकते. आखिर लोकर पर भी तो आपको शुल्क चुकाना ही पड़ता है न! ज़रा सोचिए, अगर ऐसा हुआ तो बैंकों में धन कौन रखेगा? कुछ देशों में तो अपना धन बैंक में सुरक्षित रखने के लिए भी बैंकों को घूस देनी पड़ती है. क्या ऐसा ही चलन हमारे यहाँ नहीं आने की कोशिश करेगा? ध्यातव्य है कि एक गलत परम्परा पूर्णतया गलत नियमों की नींव रखती है. अतः मन में ऐसे बुरे विचारों को आने से पहले ही शमन कर देना चाहिए.
      आइए, इस समस्या को बैंकों के स्तर पर सुलझाने की कोशिश करते हैं. ज्ञातव्य है कि देश के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए साकार ने बरसों पहले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था. ये एक अच्छा कदम तो था परन्तु इसके वांछित परिणाम मिलने की बजाए बैंकों को घाटा होने लगा. कारण, सरकार की लोक लुभावन योजनाएं. इन योजनाओं से सरकार को वोट तो मिले किन्तु राजस्व घाटा बढ़ता गया. बैंकों के क़र्ज़ लोगों ने लौटाने बंद कर दिए. इन सब कारणों से बैंकों पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा. कुछ बैंक तो वित्तीय अनुशासन-हीनता के चलते घाटे में आ गए जबकि कुछ बैंक सरकारी नीतियों के कारण क़र्ज़ के बोझ तले दब गए. फिर से निजी बैंकों का दौर आया. आजकल ये बैंक खूब मुनाफ़ा कमा रहे हैं.
कई निजी बैंकों में तो कर्मचारियों को दस-दस घंटे से अधिक काम करना पड़ता है जिसकी कोई सुनवाई नहीं करता. इन बैंकों को जब भी कोई अवसर मिलता है, अपना आर्थिक बोझ ग्राहकों पर लादने की कोशिश करते हैं. कई बैंकों ने ‘न्यूनतम’ राशि जमा करने की कड़ी शर्तें लागू की हैं. कुछ ऐसे बैंक भी हैं जहां आम आदमी का प्रवेश ही वर्जित है! अगर किसी को ड्राफ्ट बनवाना हो तो इसके लिए मोटी फीस देनी होती है, फिर भी बैंक ड्राफ्ट इश्यू करने में अक्सर नखरे दिखाते हैं. कई बैंक पास-बुक इश्यू ही नहीं करते. कुछ सेवाएं ऐसी हैं जो ग्राहकों को बिना मांगे बैंक से मिलनी चाहिएं परन्तु बैंक कुछ भी सुनाने को तैयार नहीं हैं. ऐसा लगता है कि आम आदमी बैंक तथा सरकार रूपी चक्की के दो पाटों के बीच में पिस कर रह गया है. अभी हाल ही में बैंक ग्राहकों को उनकी अधिशेष जमाराशि की जानकारी एस.एम.एस द्वारा बताने के लिए भी साठ रूपए प्रति वर्ष तक वसूलने लगा है. क्या बैक अपने ग्राहकों को ये जानकारी देकर उन पर एहसान कर रहा है? जब ग्राहक बैंकों में आते थे तो बैंक का अधिक रूपया खर्च होता था जबकि आजकल ग्राहक अधिकतर कार्य आधुनिक साधनों जैसे कम्प्ययूटर व टेल्लर मशीनों से करने लगा है जिससे बैंकों का आर्थिक बोझ काफी कम हो गया है.
ये निजी बैंक सिद्धांततः ऐसे  लोगों को क़र्ज़ देते हैं जिनको इसकी आवश्यकता नहीं होती, परन्तु इन ग्राहकों में क़र्ज़ वापिस लौटाने की क्षमता सबसे अच्छी होती है. अब आप ही अनुमान लगा लें की ऐसे बैंकों से देश का क्या उद्धार होने वाला है. अगर देखा जाए तो बैंक का कार्य है कि वह उन लोगों से रुपया लेकर अपने पास सुरक्षित रखे जिन्हें अभी इसकी आवश्यकता नहीं है. बैंक कुछ ऐसे लोगों को ऋण वितरित करता है जिन्हें व्यापार आदि के लिए धन की आवश्यकता होती है. बैंकों को क्रेडिट कार्ड तथा अन्य बैंकर सेवाओं से भी अतिरिक्त आय होती है. आजकल तो बैंक बीमा पालिसी व सोना जैसी चीज़ें भी बेचने लगे हैं. इस लेन-देन से ही बैंक के सभी खर्चे निकलते हैं तथा आमदनी भी होती है. यह सोचने का विषय ही कि आजकल बैंक वह सब काम करता है जिससे उसे मोटी आमदनी हो. जब कोई खर्च करने की बात आती है तो ये एक दम पीछे हट जाते हैं. बैंकों का यह रवैय्या कहाँ तक उचित है?
पहले तो बैंक ने अपने कर्मचारियों को कम करने के लिए टेक्नोलोजी का सहारा लिया तथा ए.टी.एम. के माध्यम से रुपयों की निकासी शुरू की. जब देखा कि इसमें लूट-मार होने लगी, तो झट से सुरक्षा शुल्क लगाने की माँग कर डाली. अब बैंकों ने नया सुर अलापना शुरू कर दिया है कि हम अपने खर्चे पर सुरक्षा गार्ड क्यों रखें. परन्तु सवाल तो यह भी है कि जनता इसका खर्च क्यों दे? अगर कल कोई पब्लिक स्थानों पर लूट-पाट करेगा तो क्या इसे रोकने के लिए जनता से अतिरिक्त कर वसूला जाएगा? आखिर मौजूदा प्रकरण में बैंकों ने अपने कर्मचारियों की संख्या घटा कर ही अधिक लाभ अर्जित किया है. अगर बैंकों ने इन मशीनों के कारण अधिक धन कमाया है तो सरकार को भी लाभ हुआ है क्योंकि बैंक भी इनको भारी-भरकम कारपोरेट टैक्स देते हैं. अतः देखा जाए तो सुरक्षा की जिम्मेवारी सरकार की ही बनती है.
जनता से इस प्रकार का खर्च वसूल करना अनुचित है क्योंकि वह तो पहले से ही इस सरकार को नाना प्रकार के टैक्स देती आ रही है. आप घर से बाहर निकलते हैं तो आपको यात्रा कर चुकाना होता है. अपनी गाड़ी से जाने पर तेल का खर्च, उस पर टैक्स का खर्च. सड़क पर चले तो टोल टैक्स. कपडे धुलवाए तो सर्विस टैक्स. बच्चे कोचिंग से पढाए तो उस पर सेवा कर. खाने-पीने का सामान होटल से लिया तो उस पर भी कर. कुछ ज्यादा कमा लिया तो इनकम टैक्स. कहने का अर्थ है कि आज गरीब से गरीब व्यक्ति भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इस सरकार को ढेरों रूपए कर के रूप में चुकाता है. क्या इसके बदले में देश की सरकार अपने नागरिकों को उचित सुरक्षा भी नहीं दे सकती? यह न केवल निंदनीय है अपितु शर्मनाक भी है! आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारे नागरिक शिक्षित एवं जागरूक बनें ताकि कोई भी सरकार उनका शोषण न कर सके. अतः हमें अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सदैव सचेत रहना होगा. 

सोमवार, 30 सितंबर 2013

सांसारिक रेलगाड़ी और हमारा समाज


यद्यपि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथापि संसार में इसका कोई भी काम किसी अन्य व्यक्ति के कारण नहीं अटकता. ये संसार इसी प्रकार अनवरत चलता ही रहता है. संसार की तुलना आप एक ऐसी रेलगाड़ी से कर सकते हैं जिसमें विभिन्न गंतव्य स्थानों के लिए प्रस्थान करने वाले यात्री सवार होते हैं.
संसार रूपी इस रेलगाड़ी का अंतिम स्टेशन तो एक ही है किन्तु कुछ लोगों की यात्रा समय से पहले ही पूरी हो जाती है जिसे आप असामयिक मृत्यु भी कह सकते हैं. कुछ यात्री अपने सद्कर्मों से ज्यादा लंबा सफर करने में सक्षम हो सकते हैं और लंबी उम्र कों प्राप्त होते हैं जबकि अन्य लोग इस सुविधा से वंचित रहते हैं. कौन सा मुसाफिर कहाँ उतरेगा, अर्थात मृत्यु कों प्राप्त होगा, ये कोई नहीं जानता.  हालांकि रास्ते से कुछ नए मुसाफिर भी सवार हो सकते हैं जिनकी तुलना आप नवजात शिशु से कर सकते हैं. सफर के दौरान लोग एक दूसरे से बातचीत भी कर सकते हैं.
अगर किसी को कोई सहयात्री अच्छा लगे तो वह प्रेम सम्बन्ध भी बना सकता है, जो आपसी विश्वास पर निर्भर करता है. जो लोग परस्पर सम्बन्ध नहीं बना पाते, वे इसके लिए अपने अभिभावकों की सहायता ले सकते हैं. सांसारिक रेलगाड़ी में कई प्रकार के ताने-बाने विकसित होते रहते हैं जो अपनी कतिपय आवश्यकताओं के अनुरूप इसकी व्याख्या करते हैं. कुछ लोग माता-पिता हो सकते हैं तो कुछ पति-पत्नी या फिर भाई बहिन आदि. पहले पति-पत्नी के इस बंधन कों वैवाहिक बंधन कहा जाता था, आजकल कुछ लोग इसे लिव-इन कहना ज्यादा उपयुक्त मानने लगे हैं. जो बंधन अपेक्षाकृत कम विकसित होता है उसे आप भावनात्मक संबंधों का नाम भी दे सकते हैं.
कई बार पिता-पुत्र या माता-पुत्र के बीच अविश्वास बढ़ने से रिश्ते कमज़ोर पड़ जाते हैं तथा सामाजिक सम्बन्ध होने पर भी इनका कोई अर्थ नहीं रहता. कुछ यात्री आपसी सम्बन्ध बनाने में कोई विश्वास नहीं रखते क्योंकि उन्हें स्वयं पर ही अधिक भरोसा होता है. ऐसे लोग शादी करने की बजाय एकाकी जीवन जीने में अधिक विश्वास रखते हैं. कई लोग ऐसे हैं जो अपने जीवन के लंबे सफर को बहुत उबाऊ अनुभव करते हैं. उन्हें स्वयं के लिए एक उपयुक्त जीवन साथी की तलाश रहती है जो शादी-विवाह के बंधन द्वारा ही प्राप्त हो सकता है.
आजकल युवकों द्वारा शादी करना या न करना भी इसी प्रकार से ही देखा जा सकता है. ये सब हमारे देश में पाश्चात्य सभ्यता के बढते हुए प्रभाव के कारण हो रहा है. मनुष्य अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सांसारिक वस्तुओं से करने लगा है तथा भावनात्मक सम्बन्ध कहीं पीछे छूट गए हैं. लोग आपसी प्रेम और विश्वास पर आधारित संबंधों कों बोझ समझने लगे हैं हैं जो उचित नहीं है.
ज़रा सोचिए, अगर लोग आपस में पति-पत्नी न होते तो परिवार कैसे बनता? किस प्रकार हम अपनी विरासत आने वाली पीढ़ियों कों सौंप पाते? हमें अपनी गलतियों से सबक कैसे मिलता, अगर कोई हमारा भला चाहने वाला सम्बन्धी ही नहीं होता? समाज, मोहल्ला, गाँव, शहर, महानगर और देश किस प्रकार अस्तित्व में आते? हम अपना काम बाँट कर कैसे कर पाते, अगर सभी अपने ही स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते?
अब आप स्वयं ही यह निर्णय कर सकते हैं कि आप चाहे लड़के हैं या लडकियां...आपको विवाह की आवश्यकता क्यों है! आने वाली पीढ़ियों का भविष्य आप सबकी सोच पर निर्भर करेगा. आप अपने अल्प-कालिक हितों के लिए दीर्घकालिक दुष्परिणामों की संकल्पना भी नहीं कर सकते. अतः शादी करके आप सब एक सुनहरे कल हेतु भावी पीढ़ी का निर्माण करें ताकि लोग वस्तुओं से अधिक आपसी रिश्तों कों महत्व दें. सुख-दुःख में एक दुसरे के भागीदार बनें. बिना-शादी विवाह के कोई भी सम्बन्ध विश्वसनीय नहीं हो सकता.

मनुष्य एक जीता-जागता प्राणी है न कि एक मशीन जिसे न थकावट होती है और न ही दूसरों कों खाली बैठे देख कर ईर्ष्या! जगत में केवल मानव ही एक सर्वोत्तम प्राणी है जिसमें सभी प्रकार की संवेदनाएं एवं अनुभूतियां पाई जाती हैं. हम सब का यह परम कर्तव्य है कि हम शादी-विवाह की इस परम्परा को बनाए रखें ताकि हम न केवल अपने सुख-दुःख सांझे कर सकें अपितु अपने देश के लिए एक बेहतर कल का सपना भी देख सकें!

रविवार, 29 सितंबर 2013

एक अध्यापक की सेवानिवृति

बहुत बरस तक न जाने
कितने शिष्यों को हमने पढ़ाया
निःस्वार्थ भाव से प्रेरित कर
जीवन पथ पर आगे बढ़ाया.
खुशी है मुझको मेरा जीवन
कुछ आपके काम भी आया
आपके स्नेह और विश्वास ने
मुझे इसके योग्य बनाया.
आज है मौका लेखे-जोखे का
क्या किया और क्या हो न पाया
इतना तो संतोष है लेकिन
स्कूल तुम्हारा मेरे मन भाया.
आभारी हूँ सबके सहयोग की
अब सेवा-निवृति का दिन आया
मैं भी कुछ कर पाऊँ घर पर
वक्त आराम करने का आया!
कहीं पर भी रहें हम तुम
रहोगे मेरे बन कर तुम
जरूरत हो तुम्हें जब भी
चले आएँगे फ़ौरन हम!
न भूलोगे कभी हमको
न भूलेंगे कभी हम भी
रहेंगे याद बन कर हम

भुला नहीं पाएंगे हम तुम! - अश्विनी रॉय ‘सहर’