आजकल देश में राजनैतिक दल कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे हैं. हमारे यहाँ स्वयं को
तथा-कथित अगड़ों के नेता, पिछडों के नेता, दलितों के नेता, अल्प-संख्यकों के नेता कहने वाले तो
पहले से ही मौजूद थे, अब आम आदमी के नेता भी आ गए हैं! हम तो
आज तक यह भी समझ नहीं पाए कि आम आदमी है कौन? क्या टोपी
पहनने वाला व्यक्ति ही आम आदमी है? क्या अगडे, पिछड़े, दलित अथवा अल्प-संख्यक आम आदमी नहीं हो सकते?
कभी-कभी शक होता है कि क्या हम आम आदमी हैं? तो
क्या अपना मत “आम आदमी पार्टी” को देने
वाले ही आम आदमी हो सकते हैं? विभिन्न राजनैतिक दलों से धोखा
खाने वाले लोग क्या आम आदमी नहीं हैं? क्या आम आदमी इतना
नादान है कि इन सब नेताओं के झूठे बहकावों में आकर ही अपने मताधिकार का प्रयोग
करता है? अभी हाल ही में दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुए कुछ
नेताओं का मानना है कि केवल ये लोग ही आम आदमी के प्रतिनिधि हैं तथा इनके हितों के
संरक्षक हो सकते हैं. तो क्या जिस दल ने इनसे ज्यादा विधान सभा क्षेत्रों में विजय
प्राप्त की है, वहाँ पर आम आदमी नहीं थे? क्या दिल्ली की नई सरकार गैर-आम आदमी हलकों में विकास का कोई कार्य नहीं
होने देगी? ऐसी ही बहुत सी शंकाएं हम सब के मस्तिष्क में
कौंध रही हैं. आइये, देखते हैं कि वर्तमान राजनैतिक दल-दल
में आम आदमी की क्या स्थिति है!
आम आदमी को किसी के जीतने या हारने से कोई सरोकार नहीं है. वह तो सिर्फ इतना चाहता है कि जो भी नेता उनसे वोट मांगने आए, कोई झूठे वायदे न करे. लोगों की भलाई के लिए यथासंभव काम करे. प्रदेश में क़ानून एवं व्यवस्था बनी रहे ताकि सब लोग भय-मुक्त हों. सरकार बिना किसी लाग-लपेट अथवा भ्रष्टाचार के सब वर्गों हेतु कार्य करे. आम आदमी किसी एक दल का जर-खरीद गुलाम नहीं है. राजनैतिक दलों में कमोबेश सभी वर्गों के आम आदमी मिलते हैं. आम आदमी का भला चाहने वाले लोग सभी दलों में हो सकते हैं. कोई भी राजनीतिज्ञ स्वयं को आम आदमी का ठेकेदार नहीं कह सकता. आम आदमी की जीवन पद्धति आम तौर पर सबको मालूम होती है क्योंकि ये लोग न तो बंगलों में रह सकते हैं और न ही बड़ी-बड़ी गाडियां खरीद सकते हैं.
ध्यातव्य है कि चुनाव लड़ने से पहले सभी उम्मीदवार ‘आम’ आदमी कहलाते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद ये ‘खास’ हो जाते हैं. अब तक दिल्ली के वोटरों ने भी इन तथाकथित आम आदमियों की असलियत देख ली होगी. ऐसा देखा गया है कि- “चुनाव से पहले इनकी घोषणा के अनुसार सभी दल भ्रष्ट हैं तथा ये लोग न किसी को समर्थन देंगे और न ही लेंगे. ये लोग लाल बत्ती वाली गाडी व सरकारी बँगला नहीं लेंगे. सरकार बनाते ही भ्रष्ट नेताओं को जेल में डाल देंगे क्योंकि इनके पास सभी के खिलाफ पर्याप्त सबूत तैयार हैं.” चुनाव के बाद “सरकारी बंगले के लिए हाँ कर दी, लोगों के विरोध के बाद अब ये छोटे घर की तलाश करने लगे हैं. तथाकथित भ्रष्ट दल के विरुद्ध ये लोग विपक्ष से सबूत मांग रहे हैं ताकि उनके विरुद्ध कार्यवाही की जा सके. कार्यवाही तो होती हुई नहीं लग रही है क्योंकि जिन लोगों के विरुद्ध कार्यवाही करनी है उन्हीं के समर्थन पर सरकार टिकी है.” यह चिंतन का विषय हो सकता है कि जब अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री बंगलों में रह सकते हैं और बड़ी गाड़ियों में बैठ सकते हैं तो आम आदमी सरकार के प्रतिनिधि ऐसा क्यों नहीं कर सकते! ऐसा इसलिए है कि ‘आप’ ने चुनाव पूर्व आम आदमी से वायदा किया था कि हम बंगलों व लाल बत्ती वाली गाड़ियों का प्रयोग नहीं करेंगे. लाल बत्ती वाली गाड़ी तो कानूनन इस्तेमाल नहीं कर सकते परन्तु ये लोग वी.आई.पी. नंबर की बड़ी गाडियां प्रयोग करने लगे हैं. अब यह ‘आप’ को तय करना है कि क्या यह आम आदमी से चुनाव पूर्व किए गए वायदों का उल्लंघन है?
यह चिंतनीय है कि जिन भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध चुनाव लड़ा, उन्हीं के समर्थन से ‘आप’ ने सरकार बनाई है. ‘आप’ के ऊंचे आदर्श और ईमान की पोल खुल गई लगती है क्योंकि जिस आम आदमी के वोटों से ‘आप’ ने चुनाव जीता, अब उसी को पूरी तरह भुला दिया है. दिल्ली की जनता ने जिस राजनैतिक दल को सत्ता से बाहर किया था, ‘आप’ ने उसे परोक्ष रूप से अपनी बगल में बैठने की जगह दे दी है ताकि आप उनके विरुद्ध कोई भी निर्णय न ले सकें. यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित रहेगा कि आम आदमी के लिए काम करने वाले किसी पर कोई एहसान नहीं करते और न ही गाहे-बगाहे प्रेस और मीडिया में अपनी सादगी का ढिंढोरा पीटते हैं. देश में इनसे भी बढ़ कर सादगी पसंद एवं ईमानदार नेता हैं, जिन्हें आप सब लोग अच्छी तरह जानते हैं. ऐसे नेताओं का यहाँ उल्लेख करना शायद उचित नहीं होगा क्योंकि ईमानदार लोग भी कमोबेश सभी दलों में हो सकते हैं. फिर ‘आप’ के द्वारा फ़िज़ूल का दिखावा और झूठी शान क्यों? लोगों को इस नए दल से बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं थी परन्तु यह राजनैतिक दल भी अन्य दलों की भांति आम आदमी को अपनी दल-दल के अंदर फांसने में कामयाब हो गया है.
अगर देखा जाए तो देश के सभी राजनैतिक दल भ्रष्ट लोगों से समर्थन लेकर सरकार बना रहे हैं जिसमें ‘आप’ भी शामिल हो गए हैं. अब आम आदमी को ‘आप’ का कोई भी व्यक्ति ईमानदार अथवा सच्चा नेता दिखाई नहीं देता. अतः उसे चुनाव में केवल उस उम्मीदवार को अपना मत देना है जो उसके हितों की भली-भांति रक्षा कर सके. देश में चुनावी मौसम पांच बरस में एक बार बनता है जबकि आम आदमी रोज नए सपने देखता है. हमारे सत्ता-लोलुप एवं बे-ईमान राजनीतिज्ञों के कारण उनका सपना हर बार टूट जाता है. आम आदमी तो राजनैतिक दल-दल में ही फंस कर रह जाता है जबकि आम आदमियों के तथा-कथित नेता अपने वायदों के खिलाफ बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं तथा बंगलों में निवास करते हैं. पुराने वायदे तो भुला ही दिए, अब ‘आप’ लोकसभा चुनावों में भी आम आदमी को लुभाने के लिए नए वायदों की बरसात कर सकते हैं. यह तो आम आदमी ही तय करेगा कि इनके वायदे कितने लुभावने हो सकते हैं!
स्पष्टतः सभी दलों के सदस्य ईमानदार या बे-ईमान हो सकते हैं. कोई भी राजनैतिक दल भ्रष्ट या ईमानदार नहीं होता. यह तो उस दल के सदस्यों की ईमानदारी अथवा भ्रष्ट आचरण पर ही निर्भर करता है. जो दल लगातार बे-ईमान एवं भ्रष्ट लोगों को संरक्षण प्रदान करता है वह अपनी छवि खराब कर लेता है. वर्तमान परिस्थितियों में कुछ ऐसा ही परिदृश्य उभर का सामने आ रहा है. प्रायः देखा गया है कि विभिन्न राजनैतिक दल केवल उन्हीं लोगों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट देते हैं जो उन्हें विजय दिला सके. इस प्रक्रिया में आम आदमी का कभी नंबर नहीं आता. आजकल केवल ऊंचे रसूख वाले अथवा अपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग ही चुनाव लड़ सकते हैं क्योंकि इनके पास न केवल बाहुबल होता है, अपितु धन बल भी बहुतायत में मिलता है. यह भी देखा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर स्थानों पर अमीर लोग ही चुनाव जीत सकते हैं. चुनाव में भारी धन राशि खर्च होती है जिसे चुनाव के बाद ये लोग भ्रष्ट तरीकों द्वारा सरकारी खजाने से वापिस लूट लेते हैं.
अब समय आ गया है जब आम आदमी को शिक्षित होना पडेगा ताकि
स्वयं को आम आदमी के तथाकथित नेता बताने वाले ये लोग इन्हें गुमराह न कर सकें.
इन्हें अपनी वोट का मोल पहचानना पडेगा. नेताओं के झूठे दावों व वायदों पर फिर से
विचार करना होगा तथा अपने मत का प्रयोग बड़ी समझदारी से करना होगा. आम आदमी को
सोचना चाहिए कि अच्छा या बुरा केवल उम्मीदवार ही होता है उसकी पार्टी नहीं. बुरा
व्यक्ति किसी भी परिवार एवं पार्टी में हो सकता है. आवश्यकता इस बात की है कि बुरे
व्यक्तियों से समर्थन लेने की बजाय इन्हें तुरंत क़ानून के हवाले किया जाए ताकि
बुराई पर अंकुश लग सके. जब सभी दलों से बुरे लोगों का सफाया हो जाएगा तो हमारी
राजनीति में ईमानदारी एवं सच्चाई स्वतः दिखाई देगी.
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