My expression in words and photography

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

आतंकवाद

आतंक
इसका चेहरा बड़ा भयानक
जैसे हो कोई खलनायक
दुनिया भर में इस का जाल
कई देशों में इनकी ढाल.

आतंकवाद की कोई न सीमा
सब का चैन है इसने छीना
इसने कितनों के घर जलाए
आई मुसीबत बिना बुलाए.

हवाई जहाज़ अपहरण कराए
मासूमों के सपने चुराए
इसका नहीं कोई भी मजहब
आतंक फैलाना इसका मकसद.

सब मिलकर आवाज उठाएँ
दुनिया भर से इसे मिटाएँ
जब कोई संरक्षक न होगा
तब कैसे ये भक्षक होगा ?

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

माया ने ऐसा भरमाया

माया
माया ने ऐसा भरमाया
आँख खुली तो समझ में आया
कौन है अपना कौन पराया
माया ने ऐसा भरमाया.

अपने घर में भी थी रोटी
अच्छी लगती थी ऊँची कोठी
लालच ने तब जोर लगाया
और हम से स्वदेश छुडाया.
माया ने ऐसा भरमाया
आँख खुली तो समझ में आया
कौन है अपना कौन पराया.

धन दौलत अब राज करेगा
कल ना किया सो आज करेगा
इसने अपनों से दूर कराया
कुछ ऐसा भ्रम-जाल फैलाया.
माया ने ऐसा भरमाया
आँख खुली तो समझ में आया
कौन है अपना कौन पराया.

स्वार्थ में इसने अंधा बनाया
अंतर्मन से लज्जित करवाया
इसने हमको कपट सिखाया
मित्रों ने फिर दगाबाज़ बताया.
माया ने ऐसा भरमाया
आँख खुली तो समझ में आया
कौन है अपना कौन पराया.

माया महाठगिनी हम जानी
पर हम ने की थी मनमानी
इसी को अपना मीत बनाया
जो चाहा सो करके दिखाया.
माया ने ऐसा भरमाया
आँख खुली तो समझ में आया
कौन है अपना कौन पराया.
माया ने ऐसा भरमाया.

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

एक पेड़

पेड़ और हम
मेरे घर के सामने
खड़ा है एक पेड़
देखने में सुन्दर
हरा भरा और शान्त
न जाने
कब से खड़ा है
इसने
हमारे पुरखों को
ज़रूर देखा होगा
शायद वो सब भी
खेले होंगे
इसकी छाया में

सब कुछ
बदल गया है आज
यहाँ पर रहने वाले लोग
इस पेड़ के पत्ते और डाली
अगर कुछ नहीं बदला तो
वह है इसकी छाया
मुफ्त में बाँटता है सबको
और देता है सुकून
चाहे मौसम सुहाना हो
या तपता हुआ जून
कितने बदल गए हैं
हम लोग
अपने पड़ोसियों को
कभी नहीं मिलते
बिना मतलब के
कोई बात नहीं करते
शायद
एक दूसरे को देख
खुश भी न होते हों

हम को भी
पेड़ जैसा बना दो न
हे सर्वशक्तिमान ईश्वर !
मिलजुल कर रहें
सब खुश
एक ऐसा दो हमें वर
बाँटें सबको प्राण वायु
और मिटा दें
धरती का प्रदूषण
फिर निर्मल बने
यह वातावरण
एक दूजे को देख
यूं मुस्कुराएँ
अगली पीढ़ी भी
हमें न भूल पाए !

खून सफ़ेद हो गया है

रिश्ते
कहते हैं
रिश्तों में
दरार आ रही है
आजकल
रिश्ते टूट रहे हैं
भाई को भाई से
बहिन को भाई से
बच्चों को माँ बाप से
प्यार नहीं रहा
कहते हैं
खून सफ़ेद हो गया है
सबका
क्या वास्तव में ऐसा है
बिल्कुल नहीं
खून का रंग तो
लाल ही है
चाहे जब देख लो
तो क्या खून की
गरमी कम हुई है
ऐसा भी नहीं
तो फिर
क्या माजरा है ये सब
शायद दिल में
कुछ खोट है
हमारी सोच में
कोई पाप है
जो हर शय
खोटी लगती है
गंगा जल में
नहाने से तो
धुलता है
केवल तन
फिर भला कैसे
निर्मल होगा मन
जब तक मन का
पाप नहीं धुलेगा
तब तक नहीं होगा
ये मन उजला
और लगेगा कि
खून सफ़ेद है
क्योंकि
सोच पर चढ़ा है
स्वार्थ का चश्मा
जो दिखाता है
सब कुछ सफ़ेद
लाल खून भी
सफ़ेद...

सोमवार, 29 नवंबर 2010

हिन्दी

आजकल हिन्दी में बहुत सी भाषाओं के शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं. इन देशज, विदेशज, तत्सम और तद्भव शब्दों में शायद उर्दू भाषा के शब्द बहुत अधिक हैं जिन्हें सब लोग आसानी से समझ लेते हैं. उल्लेखनीय है कि उर्दू वर्णमाला में “अलिफ़” पहला तथा “ये” अंतिम अक्षर होता है. उर्दू शब्दों का बढ़ता हुआ उपयोग हिन्दी भाषा की अदभुत संप्रेषणीयता एवं स्वीकार्यता से ही संभव हो पाया है. इसी भाव से प्रेरित होकर मैंने यह कविता लिखी है जो आज आपके समक्ष प्रस्तुत है.

हिन्दी हैं हम
यूं तो
कौमी एकता में
हिन्दी का
किरदार नुमाया है
लेकिन उर्दू ने
अलिफ़ से ये तक
अपना साथ निभाया है
देखो !
हिन्दी ने कितना बड़ा
दिलो जिगर पाया है
इसने न जाने कितने
उर्दू लफ़्ज़ों को अपनाया है
हर मुश्किल बोलचाल में
इसने आसान की है
मुल्क में तरक्की की राह
हमवार की है
इसके इस्तेमाल से
हिन्दी में नई रवानी है
जो जुबाने हिंद की
खूबसूरत कहानी है
कहते हैं
हिन्दी से
हिन्दुस्तान की
पहचान होती है
दुनिया में ये हकीकत
हर ज़ुबाँ से
बयान होती है
यूं तो
हमारे मुल्क में
कई ज़ुबानें बोलते हैं
मगर
भाई चारे की खातिर
सब हिन्दी बोलते हैं
बाहरी मुल्कों से बेशक
हम अपनी बात
अंग्रेजी में करते हैं
जनाब !
हिन्दी हैं
हम वतन हैं
हिन्दुस्तान में रहते हैं.

शनिवार, 27 नवंबर 2010

नई सुबह

एक लड़का
मैंने देखा
एक लड़का
जो गा रहा था
और बजा रहा था
सारंगी पर वे धुनें
जो थी जमाने के लिए
चला जा रहा था बस
अपनी ही धुन में
वह सबका
मनोरंजन करता हुआ
मुसीबत का मारा
लाचार बेबस
पैबंद लगे थैले में
ढो रहा था
शायद अपनी गरीबी
बढ़ता जा रहा था
आगे की ओर कहीं
अनजान पथ पर वह

आखिर क्यों होता है
ये सब
जमाने ने बनाया
गरीब इसको
होता है सबका
मनोरंजन क्यों इससे
मिलता है बदले में जो
रख लेता है वह उसको
न जाने कब लौटेंगे
वो दिन
जब गायेगा वह गीत
अपने लिए
और रहेगा जमाने में
फिर ऐसे
मुस्कुराती हुई
आती हो कोई
नई सुबह जैसे !

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

एक कविता

सब का सपना
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है
जब होगा सब के पास
रोटी कपडा और मकान
जियो और जीने दो पर
नहीं उठेगा सवाल
जैसा अधिकार होगा
वैसा ही कर्तव्य अपना है
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है

जब ना लड़ेगा कोई
धर्म या जाति के नाम पर
होगा आदर मानवता का
समानता के आधार पर
वसुधैव कुटुम्बकम की
उक्ति को साकार करना है
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है

बंटेगी जब नहीं धरती
अलग देशों के नाम से
बनेंगे नागरिक सारे
धरा के अपने आप से
समूची दुनिया को एक
शांतिप्रिय स्थल बनना है
यह मेरा ही नहीं
हम सब का सपना है

रविवार, 21 नवंबर 2010

दो लघु कविताएँ

पति और पत्नी
पति हमेशा पड़ता था
अपनी पत्नी पर भारी
बोला मेरी तनख्वाह से
फिर भी कम है
तुम्हारी मेहनत सारी
पत्नी बोली
भूल गए क्या
सुबह-सवेरे उठकर के जो
चाय मैं तुम्हें पिलाती
ऑफिस जाते समय टिफिन
जो अपने साथ ले जाते
लौट के तुम
जब वापिस आते
घर आँगन को सुन्दर पाते
पति हो चाहे कितना भारी
फिर भी रहता है आभारी
पति में छोटी इ की मात्रा
पत्नी में बड़ी ई है आती
फिर भी दोनों में कौन बड़ा है
समझ तुम्हें यह क्यों न आती !


थैली पोलीथीन की
अरे भाई
तूने यह
पोलीथीन की थैली
यहाँ क्यों गिराई
पर्यावरण को
शुद्ध रखने की बात
मेरे मन को भाई
पोलीथीन बहिष्कार जानकर
यह थैली
मैंने यहाँ गिराई.

शनिवार, 20 नवंबर 2010

एक कविता

अंतर्द्वंद
रहता हूँ मैं
अनजान जगह पर
ऐसा लगता है जैसे
कोई पेड़ उखाड कर
उगा दिया हो
एक अजनबी और
अनजान सी जगह पर
फिर भी लहलहाता हूँ मैं
बांटता हूँ दुःख-सुख लोगों के
यात्रा पर निकलते हैं जो दूर
थक कर बैठ जाते हैं
मेरी छाया में
और सोचते हैं
आगे बढ़ने की मंजिल पर
दूर करता हूँ मैं
इन सब की थकान
फिर सोचता हूँ कि
मैं कोई अजनबी
अनजान पथ पर नहीं
सब कुछ देखा–देखा सा है
मैं बोल नहीं सकता तो क्या
सुनता तो हूँ सब की बात
बांटता हूँ
सब में खुशियों के पल
बुझती हो जैसे प्यास
बिना पिए जल
सुनकर लोगों की करुण व्यथा
भूल जाता हूँ
मैं अपनी वेदना
पाकर प्रेरणा इन सब से फिर
खड़ा रहता हूँ
मैं एकदम अडिग
जैसे कभी उखड़ा ही न था !

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

बच्चों के लिए एक कविता

सबसे बड़ी सीख
चला जा रहा था मैं एक दिन
करने गांव की सैर
हुई दोपहर जंगल में फिर
नहीं जान की खैर
थोड़ी देर में आया हाथी
नहीं था मेरा कोई साथी
पहले तो कुछ दिल घबराया
बाद में फिर आगे बढ़ पाया
थोडा चलने पर रीछ मिला
उसने तो मुझ को देखा नहीं
पर मैंने उसको देख लिया
याद आई फिर एक कहानी
दो मित्रों की वही पुरानी
एक मित्र चढ़ गया पेड़ पर
दूजा गया लेट धरती पर
आया रीछ और गया सूंघ कर
दे गया सब को सन्देश नया
विश्वासघाती से बच कर रहना
नहीं कोई सीख इससे बढ़िया.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

शाने-हिंद

हिन्दी
भारत की एक जुबान है
यह मेरे देश की शान है
सब हिन्दी में बातें करें
अब हिन्दी में ही लिखा करें.

प्राचीनतम यहाँ सभ्यता
विविधता में जहां एकता
दुनियां में इस का नाम है
यह मेरा देश महान है.
भारत की एक जुबान है
यह मेरे देश की शान है.

हम यूं बोलते कई बोलियाँ
फिर भी दूरियाँ हैं दरमियाँ
लोगों को अपने ये जोड़ती
यही एकता की मिसाल है.
भारत की एक जुबान है
यह मेरे देश की शान है.

आजाद हम और देश आज़ाद
मिलकर कहें सब जिंदाबाद
हिन्दी में सब की आन है
हिन्दी से सब की शान है.
भारत की एक जुबान है
यह मेरे देश की शान है.

गूंजेगी अब यह चारों ओर
आएगी लेकर नई सी भोर
हर जगह चर्चा ये आम है
अब हिन्दी सुबहो-शाम है.
भारत की एक जुबान है
यह मेरे देश की शान है.

हिन्दी दिलों को जोड़ती
मुल्कों की सरहदें तोड़ती
हिन्दी से अदभुत शान है
जो हिन्द की पहचान है.
भारत की एक जुबान है
यह मेरे देश की शान है.

आओ हिन्दी में बातें करें
अब हिन्दी में ही लिखा करें.